मज़दूरों की आठ घंटे काम की मांग ने पूंजीवाद को हिला दिया था…

-अनुराग भारद्वाज

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस की जड़ें अमेरिका में हुए उस हादसे में छिपी हैं जिसे पूंजीवाद और समाजवाद के बीच पहली बड़ी भिड़ंत भी कहा जाता है।

दरअसल, एक मई 1886 अमेरिका के शिकागो में मज़दूर बड़ी संख्या में उठ खड़े हुए थे. मांग थी रोजाना काम के वक्त का दायरा आठ घंटे तक सीमित करना. यूं तो यह मांग समय-समय पर पहले भी उठती रही थी पर शिकागो, जो उस समय वामपंथी आंदोलनों का केंद्र था, में इसने सबसे ज़्यादा आक्रामक रूप ले लिया था.

मशहूर लेखक और प्रकाशक अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग ने अपनी क़िताब ‘मई दिवस का इतिहास’ में लिखा है – ‘हालांकि अमेरिका में अधिक तनख्वाह की मांग शुरूआती हड़तालों में सबसे ज़्यादा प्रचलित मांग थी, लेकिन जब भी मज़दूरों ने अपनी मांगों को सूत्रबद्ध किया, काम के घंटे कम करना और संगठित होने के अधिकारों से जुड़े प्रश्न केंद्र में रहे. जैसे-जैसे शोषण बढ़ता गया, मजदूरों को अमानवीय रूप से लंबे काम के दिन और भी बोझिल महसूस होने लगे. इसके साथ ही मजदूरों के काम के घंटों में आवश्यक कमी की मांग मज़बूत होती गयी…चौदह, सोलह, अट्ठारह घंटे काम करवाना तब आम बात थी.’

यह ज़बरदस्त हड़ताल थी. मज़दूरों की आवाज़ पर शहर के सारे औज़ार चलने बंद हो गए थे. इस हड़ताल ने अमेरिकी मज़दूर वर्ग की लड़ाई के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया था. फैक्ट्री मालिकों और पुलिस का प्रतिकार भी इतना ही ज़बरदस्त था. आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था. तीन और चार मई की घटनाएं जो ‘हे मार्केट कांड’ के नाम से जानी जाती हैं वे पहली मई की हड़ताल की ही परिणिति थीं.

तीन मई को ‘मेककर्मिक रीपर वर्क्स’ के मज़दूर एकजुट होकर आंदोलन कर रहे थे. तब पुलिस की गोलीबारी में छह या सात मज़दूर मारे गए. अगले दिन, यानी चार मई, हे मार्केट के मजदूरों ने इसके विरोध में एक सभा बुलाई. सभा समाप्ति की ओर ही थी जब गफ़लत के माहौल में किसी ने भीड़ के बीच में बम फ़ेंक दिया. चार मज़दूर और सात पुलिसकर्मी मारे गए. इसी घटना के प्रतीकस्वरूप पहली मई को ‘मई दिवस या ‘अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस’ कहा जाता है.

ये एक ग़ैर-मामूली हादसा था जिसके बाद अमेरिकी समाज ने एक नया मोड़ ले लिया. दरअसल, यह पूंजीवाद और समाजवाद के बीच पहली सबसे बड़ी भिड़ंत थी. 1880-90 का दशक अमेरिकी उद्योग और घरेलू बाज़ार के विकास के नज़रिए से सर्वाधिक सक्रिय दशक था. पर 1884-85 के बीच में एक मंदी का साल भी आया था. इस दौर में बेरोज़गारी और जनता की बढ़ी हुई तकलीफ़ों ने छोटे कार्य दिवस के आंदोलन को गति दी.

यह कुछ अचरज की बात नहीं थी. आइंस्टीन ने 1934 में एम्स्टर्डम में दिए गए अपने एक भाषण में कुछ इसी प्रकार का ज़िक्र किया है जो उनकी क़िताब’ आइडियाज़ एंड ओपिनियन्स’ में कुछ इस तरह लिखा गया है; ‘अगर हमें बेरोज़गारी की समस्या पर लगाम लगानी है तो हमें ज़रूरी काम के घंटों में कमी करनी होगी जिससे अधिक से अधिक लोगों को काम मिल सके.’ ‘8 घंटे काम’ की मांग अब हर तरफ उठने लगी थी. (साभार)

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