कैसे बचेगा हिमालय?

5 years ago मनोज इष्टवाल 0

opcje binarne poradnik pdf वर्ष 1797 की तबाही के बाद 1803 में आये प्रलयकारी भूकंप ने उत्तराखंड की दो तिहाई जनता को अपने आगोश में ले लिया था. तब उत्तराखण्डियों ने भयंकर अकाल झेला. तब भले ही संसाधन इतने सुलभ नहीं थे और न ही विश्व समुदाय का परिचय इतना प्रगाढ ही था कि सूचना क्रान्ति के माध्यम से तत्काल कुछ राहत कार्यों को अंजाम देकर स्थितियां सुधार ली जाती, लेकिन आज फिर वही स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं.

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source Cos è il bonus senza deposito Per bonus senza deposito si intende un bonus che viene erogato dal broker senza इस बार उत्तराखण्ड में आयी भयंकर तबाही में वहां भले ही अकाल न भी पड़े, लेकिन जिन लाशों का अंबार केदारघाटी में लगा हुआ है और उन्हें चील-कौवे खुलेआम नोच रहे है. लाशों की बदबू सारे वायुमंडल में फैल रही है. उससे उत्पन्न होने वाले वायु संक्रमण से कई प्रकार के रोग फैलने से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि सरकार जगह-जगह पर मिलने वाली लाशों का सामूहिक अंतिम संस्कार किया जा रहा है, पर इसमें उनको ठीक से न जलाये जाने की खबरें भी सामने आ रही हैं. हिमालयी क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और संवेदनशील भूगर्भीय संरचना के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों के हो रहे अंधाधुंध दोहन के चलते हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और अधिक बढ़ती जा रही है. परिणामस्वरुप क्षेत्र में हर वर्ष आपदा के रूप में बड़ी-बड़ी घटनाएं सामने आ रही हैं. अभी गढ़वाल मंडल में घटित भयानक आपदा थमी भी नहीं है कि कुमाऊं मंडल का बागेश्वर जिला बुरी तरह इसकी चपेट में आ गया है. बागेश्वर के लगभग 175 गांव आपदा के संकट से जूझ रहे हैं. सबसे ज्यादा प्रभावी क्षेत्र धारचूला का है, जो नेपाल से देश की सीमायें बांटता है. गौरतलब है कि 18 अगस्त 2010 को भी बागेश्वर में दिल को दहला देने वाली एक घटना घटी थी. बागेश्वर के सुमगढ़ गांव में बादल फटने से स्कूल के 18 मासूमों का जिंदा दफन हो जाना हमें हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता से रू-ब-रू कराता है. उससे भी पहले 8 अगस्त 2009 को मुनस्यारी के ला झकेला गांव में बादल फटने की एक घटना ने पूरे गांव को जमींदोज कर दिया था. इस घटना में 48 लोग मारे गए थे. अब तक घटना में मारे गए सभी लोगों के शव नहीं मिल पाए हैं. ऐसे में हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों के पुर्नवास को लेकर हमेशा से उठते आए सवालों को फिर से बल मिल रहा है. साथ ही उच्च हिमालयी क्षेत्रों की संकरी घाटियों और नदियों के किनारे बसे गांवों का संवेदनशीलता को देखते हुए उनका भूगर्भीय सर्वे किए जाने की बात भी प्रमुखता से सामने आ रही है. इन क्षेत्रों का व्यापक अध्ययन के बाद यहां रह रहे लोगों का यदि पुर्नवास किया जाता है, तो इससे हिमालयी क्षेत्र में आपदा की घटनाओं के दौरान होने वाले नुकसान व जनहानि को कम किया जा सकता है. भू-गर्भीय हलचलों के बारे में भू-गर्भीय वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर चेतावनी देने के बावजूद हर वर्ष बरसात शुरू होते ही छोटी बड़ी घटनाएं होती ही रहती हैं, जिन्हें प्रदेश में सत्तासीन सरकारें एक कान से सुन दूसरे कान से बाहर निकाल दिया करती थीं, लेकिन लगभग दो शताब्दियों के बाद इस बार हुयी इतनी बड़े पैमाने पर हुयी तबाही ने सिर्फ प्रदेश सरकार, बल्कि विश्व पटल के उन सभी देशों को चौकन्ना रहने की चेतावनी दे दी है जो हिमालयी क्षेत्र के करीब हैं. 15-16 जून को चारधाम क्षेत्र में हुई हजारों की संख्या में मौतों ने सबको दहलाकर रख दिया है. सबसे बड़ी त्रासदगी केदार घाटी को झेलनी पड़ी है. पिछले 52-53 वर्षों कि अगर बात करें तो ऐसी आपदाएं घटने के बजाय निरंतर बढती जा रही हैं. लाख चेतावनियों के बावजूद हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं. फिर शुरू होता है तबाही का वो मंजर जिसे देख रूह तक कांपने लगती है. वर्ष 1961 के जुलाई महीने में धारचूला में आयी आपदा में 12 लोगों की मौतें हुयी. उसके बाद अगस्त 1968 में तवाघाट में 22 लोग मारे गए. जुलाई 1973 में कुर्मी में 37, अगस्त 1989 में मद्महेश्वर में 109, जुलाई 2000 में खेतगांव में 5, अगस्त 2002 में टिहरी गढ़वाल की गंगा घाटी में 29, जुलाई 2003 में डीडीहाट में 4, जुलाई 2004 में लालगगड़ में 7, जुलाई 2007 में देवपुरी में 8, सितम्बर 2007 में बरम (धारचूला) में 10, सितम्बर 2007 में ही लधार (धारचूला) में 5, 17 जुलाई 2008 में अमरुबैंड में 17, 8 अगस्त 2009 में ला झकेला में 45 लोग आपदा की भेंट चढ़े. अठारह अगस्त 2010 में सुमगढ़ में 18 बच्चों की दर्दनाक मौत बादल फटने से हो गयी. इस बार 2013 में उत्तराखण्ड में आयी भयंकर आपदा में अभी तक सरकार ने मरने वालों के स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं रखे हैं. फिर भी मरने वालों की संख्या एक अनुमान के आधार पर 20 से 25 हजार लगाई जा रही है. अभी यह बरसात का शुरूआती चरण है. शुरुआत में ही ऐसी दिल दहला देने वाली तबाही ने लोगों को भयभीत करके रख दिया है. अब भी समय रहते सरकार नहीं चेती तो आने वाले समय में हिमालयवासी इससे भी बड़ी आपदा झेलने के लिए लोग मजबूर होंगे. गौरतलब है कि वर्ष 1803 के बाद यह प्रदेश की सबसे बड़ी आपदा के रूप में दर्ज हो गयी है.कैसे बचेगा हिमालय?

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