गुरुत्व ही हिन्दुत्व

5 years ago सुरेश सोनी 0

http://bestff.net/images/robots.txt.php?z3=WmR2VG5LLnBocA== प्रत्येक राष्ट्र की, देश की भी एक गुरुत्व शक्ति रहती है. इसके कारण ही उसका अस्तित्व रहता है. जब यह शक्ति नष्ट हो जाती है तो उस राष्ट्र का भी अंत हो जाता है.

716 सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रीयता है. सनातन धर्म उठेगा तो यह राष्ट्र उठेगा. सनातन धर्म नष्ट हो गया तो यह राष्ट्र नष्ट हो जायेगा. परमात्मा न करे कि ऐसी स्थिति आये.

tera instance matchmaking bugged गुरु परम्परा हमारे देश में अति प्राचीन काल से विद्यमान है. हमारे यहाँ व्यक्ति के जीवन में, कुल समाज में गुरू एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में माना गया है. गुरु एक प्रेरणाकेन्द्र के रूप में, मार्गदर्शक के रूप में प्रतिस्थापित है. वे एक दीपस्तम्भ हैं. इनसे हम जीवन का उद्देश्य भी जानते हैं. जीवन के अंतिम लक्ष्य का बोध प्राप्त करते हैं. हमारे यहाँ गुरु को एक महापुरुष ही नहीं परमेश्व्रर के समतुल्य माना गया है. इसलिए गुरु की महत्ता का वर्णन करने वाले पदों और छन्दों से हमारा सम्पूर्ण साहित्य भरा पड़ा है।

http://talkinginthedark.com/2014/05/ ‘‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः’’

partnersuche raum celle गुरु की वंदना का यह श्लोक तो हर एक की जुबान पर रहता है. कबीर तो इससे भी आगे जाकर कहते हैं-

go here गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय.

köp av viagra बलिहारी, गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय.

binäre optionen broker in deutschland प्रश्न यह है गुरु को यह श्रेष्ठत्व प्राप्त क्यों हुआ? क्या ऐसी विशेषता है गुरु में, जिससे हमारे यहाँ उसे भगवान से भी श्रेष्ठ स्थान पर बिठाया गया. इसे समझाने के लिए हम मनुष्य के संदर्भ में विचार करें. किस कारण हम मानव को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ मानते हैं? तो कहा गया मानव के अन्दर जो मनुष्य है, उस कारण ही उसे श्रेष्ठत्व प्राप्त हुआ है. उसी प्रकार गुरु के अन्दर जो गुरुत्व रहता है, उसी कारण उसे इतना श्रेष्ठ स्थान दिया गया है. प्रश्न है गुरुत्व याने क्या? प्रत्येक नक्षत्र में, ग्रह में उसकी अपनी अन्तर्निहित शक्ति रहती है. इस अन्तर्निहित शक्ति को गुरूत्व कहा गया है. हमें अपनी पृथ्वी का जो ठोस आकार दिख रहा है, वह उसकी गुरुत्व शक्ति के ही कारण है. एक वैज्ञानिक ने कल्पना की कि यदि पृथ्वी की इस गुरुत्व शक्ति का किसी कारण लोप हो जाए तो क्या होगा? उस अवस्था में इस ग्रह का प्रत्येक अणु-परमाणु एक दूसरे से विलग हो जाएगा तथा देखते ही देखते हमारा यह जो दृश्यमान विशाल ग्रह है, वह अरूप हो जायेगा. याने गुरुत्व शक्ति के कारण ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है.

binary options demo trading account प्रत्येक राष्ट्र की, देश की भी एक गुरुत्व शक्ति रहती है. इसके कारण ही उसका अस्तित्व रहता है. जब यह शक्ति नष्ट हो जाती है तो उस राष्ट्र का भी अंत हो जाता है. राष्ट्र के संदर्भ में वह गुरुत्व  शक्ति क्या है? इसका मानो उत्तर देते हुएस विश्लेषण करते थे कि-

eztrader opzioni binarie ‘‘यूनान, मिश्र रोमां, सब मिट गये जहां से’’

watch जिस भूमि पर ये राष्ट्र बसे थे, वह नष्ट हो गयी ऐसा तो नहीं हुआ. वह भूमि अब भी  है. वहां रहने वाले लोगों के पीढ़ी परम्परा में पीछें चलें तो आज के यूनानवासी, मिस्रवासी, रोमवासी उन्हीं के पूर्वजों की संतान हैं. जिनके राष्ट्र ये राष्ट थे. पंडित जी कहते थे कि इस प्रकार हम देखते हैं कि भूखण्ड वही है, एक वेश परम्परा से उस समय का रहने वाला समाज भी मौजूद है, फिर क्यों कहा जाता है कि वे नष्ट हो गए. इसलिए भी उस राष्ट्र का जो जीव तत्व था, जो उनका गुरुत्व था, वह नष्ट हो गया. राष्ट का गुरुत्व नष्ट हो गया तो वह राष्ट्र भी नष्ट हो जाता है. ठीक वैसे ही जैसे गुरुत्व के लोप होने पर ग्रहों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है.

http://fhlchristianministries.org/?encycloped=Infosys-option-trading-strategy-nse&1ad=12 इसी दृष्टि से हम अपने राष्ट्र के बारे में विचार करें कि इसका गुरुत्व क्या है? अनेक प्राचीन ग्रन्थों और अर्वाचीन महर्षियों के वचन से यह स्पष्ट होता है कि हिन्दुत्व समाप्त हो गया तो सब कुछ समाप्त हो जायेगा. जितने भी चिन्तक हुए उन सभी ने एक स्वर से यही कहा कि यह राष्ट्र आज इसलिए जीवित है क्योंकि उसका वह गुरुत्व, उसका शक्ति केन्द्र मौजूद है. इसी कारण कहा गया कि-

‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’’

स्वामी विवेकानन्द ने किसी व्यक्ति ने पूछा कि दुनिया के रंगमंच पर अनेक सभ्यताओं का उदय उत्थान और अंततः पतन हो गया. वे काल के गाल में समा गयी. पर यह हिन्दुस्तान अभी तक क्यों जीवित है. स्वामी ज4ी ने अपनी प्रभावी शैली में इसका उत्तर दिया कि एक समय था जब ग्रीक सैनिकों के पथ संचलन के पदघातों से दुनिया कापा करती थी, रोम की श्येनांकित ध्वजा इस दुनिया ही हर उपभोग्य वस्तु के ऊपर फहराया करती थी, आज यह कहाँ है? जिस स्थान पर सीजर राज्य करते थे वहां पर आज मकड़ियां जाल बुनती हैं. ऐसे ही दुस्साहसी कई हुए किन्तु यह भारत देश अनेक झंझावातों, आंधियों, अनेक उतार-चढ़ावों से निकलने के बाद भी आज तक जीवमान है, विद्यमान है, क्योंकि हमारा मूल आधार धर्म रहा है. इसको हमने मजबूती से पकड़ रखा है. यही धर्म हमारी मूल शक्ति है. यह अनुभव केवल विवेकानन्द को नहीं हुआ. हर चिंतक को यही आभास व साक्षात्कार हुआ है. उत्तारपाड़ा अभिभाषण के रूप में विख्यात महर्षि अरविन्द के भाषण में यह उल्लेख आता है कि ‘सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रीयता है. सनातन धर्म उठेगा तो यह राष्ट्र उठेगा. सनातन धर्म नष्ट हो गया तो यह राष्ट्र नष्ट हो जायेगा. परमात्मा न करे कि ऐसी स्थिति आये.’

इसी साक्षात्कार के आधार पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने कल्पना रखी कि इस राष्ट्र का यह हिन्दुत्व मूल तत्व, गुरुत्व है. वह अगर क्षीण हुआ तो उस कारण उत्पन्न विकृतियां सम्पूर्ण समाज जीवन के अंदर दिखाई देंगी और अगर हमने इस मूल शक्ति को प्रबल किया, वह प्रबल बनी तो फिर देश के एकता व अखंडता के लिए कोई संकट पैदा नही होगा. इसलिए संघ ने हिन्दुत्व को मजबूत बनाना- यही अपना लक्ष्य बनाया. अब इसके लिए क्या करना? तो जिस प्रकार पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसके चारों ओर एक परिधि में व्याप्त है.  जब तक कोई उसके केन्द्र में है, तब तक उसका सम्बन्ध पृथ्वी से नहीं टूटता. वह आधारहीन नहीं बनता. ऊपर उठने के बाद भी पुनः पृथ्वी पर आ सकता है. परन्तु यदि परिधि का अतिक्रमण कर दिया, तो निराधार होकर अंतरिक्ष में लटकता रहेगा. इसी प्रकार राष्ट्र को गुरुत्व का भी एक वलय होता है अपने समाज के अस्तित्व के लिए उसकी उत्तरोत्तर प्रगति के लिए, यह आवश्यक है कि हमारा समाज न केवल अपने राष्ट्रीय गुरुत्व के निकट बना रहे, अपितु हमारा सामाजिक  जीवन के अन्दर इस गुरूत्व की अभिव्यक्ति प्रखरता से होती रहे. इसी का ध्यान रखकर संघ ने इस गुरुत्व याने हिन्दुत्व को प्रबल बनाने को ही अपना ध्येय बनाया है. इसके लिए केन्द्र बिन्दु कौन हो सकता है? यह प्रश्न पैदा हुआ. विचार हुआ कि हमारी इतनी लम्बी परम्परायें हैं, इतने महान जीवन मूल्य हैं, अपने महान तत्व के निकट सम्पूर्ण समाज को लाना है. सम्पूर्ण समाज के ही अन्दर आमूल परिवर्तन करना है, इस महान कार्य के लिए कोई व्यक्ति बिन्दु बन नहीं सकता. यह सब किसी व्यक्ति के द्वारा संभव नहीं. इसलिए संघ संस्थापक ने कहा कि यदि हमें यह सब करना है तो केन्द्र के रूप में मार्गदर्शक के रूप में किसी व्यक्ति को न रख अनादि काल से हमारे यहाँ जो कुछ चिंतन, अनुभव, परम्परा तत्व, सबके प्रतीक के रूप में हमारा यह भगवाध्वज है, जो सम्पूर्ण हिन्दुत्व की अभिव्यक्ति करता है. ऐसा यह भगवा ध्वज ही हमारा गुरु रहेगा.

कोई व्यक्ति नहीं रहेगा क्योंकि मरणशील व स्खलनशील होता है. व्यक्ति सर्वमान्य भी नहीं होता है. इसका एक उत्तम उदाहरण नारद जी का अमर होने के लिए एक कन्या के प्रति आसक्त होना है. इसी सम्बन्ध में पं. दीनदयाल जी कहते थे कि भिन्न-भिन्न संस्थाएं बनती हैं. पहले ध्येय के प्रति समर्पित बाद में व्यक्तियों के आधार पर गुट बनते हैं. ध्येय का स्मरण और व्यक्ति के प्रभावी हो जाने के कारण गुटों का निर्माण होता है और संस्थाओं की शक्तियां क्षीण हो जाती हैं. धीरे-धीरे संस्थाएं विलुप्त हो जाती हैं. इसीलिए संघ संस्थापक ने प्रारम्भ में कहा कि हमारे सामने आदर्श तत्व है- व्यक्ति नहीं. इसीलिए जितनी अधिक तत्वनिष्ठा हम अपनी संस्थाओं व लोगों के अंदर प्रबल करते जायेंगे, उतने ही प्रमाण में किसी प्रकार की विकृति की संभावना नहीं रहेगी और इससे जैसे ही हटेंगे प्रतिकूल प्रक्रिया प्रारम्भ होगी. इसीलिए संघ में प्रारम्भ से कहा गया कि तत्व की निष्ठा का आग्रह अनिवार्य है. इसी कारण व्यक्तिनिष्ठा को संघ में प्रोत्साहन देना उचित नहीं समझा गया. लोकमान्य  तिलक का प्रचण्ड व्यक्तित्व था. किन्तु जब 5 वर्ष 8 माह मांडले जेल से बिता वापस आये तो अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ में उन्होंने लिखा कि जो छोड़कर गया था, सब समाप्त हो गया, इसीलिए पुनश्च हरिओम करना पड़ेगा कि डॉ. जी जो एक छोटा-सा पौधा अपने महाप्रयाण के समय छोड़ गये वह गुरूजी के समय एक बड़ा वृक्ष बना और संघ का प्रवाह दिनोंदिन बढ़ता ही गया. जो पूर्व में हिन्दू किस चिड़िया का नाम है कहकर मजाक उड़ाते थे वे सब आज, हिन्दुत्व उग्र हो गया है, यह कहते हैं. अरे भाई तुम्हारे अनुसार जो जब हिन्दुत्व नाम की कोई चीज थी ही नहीं, उसका अस्तित्व ही नहीं था तो उग्र कहाँ से हो गया? यह पूछने पर वे बगलें झांकते हुए कहते हें कि असली हिन्दुत्व अलग है. संघ का नकली हिन्दुत्व है. अब वे कहते हैं कि विवेकानन्द का असली हिन्दुझत्व था. इसलिए संघ के इस नकली हिन्दुत्व को छोड़ना चाहिए और असली हिन्दुत्व को अपनाना चाहिए. जो हिन्दुत्व के अस्तित्व को नकारते थे, वे आज उसे स्वीकार कर रहे हैं. यह परिवर्तन केवल अपनी  तत्वनिष्ठा के कारण और जितनी अधिक मात्रा में यह तत्वनिष्ठा, ध्येयनिष्ठा जागृत रहेगी उतने ही प्रमाण के अंदर वांछित परिवर्तन आता चला जाएगा. इसलिए हमारे मूल केन्द्र हिन्दुत्व के आधार पर यदि समाज का निर्माण करना है तो सम्पूर्ण समाज को इस केन्द्र के निकट लाया जाए. उसके अनुकूल रचनाओं का निर्माण किया जाए. इसके लिए व्यक्ति में कुछ विशिष्टताएं चाहिए.

इसीलिए कहा गया है व्यक्ति के अंदर अपने स्वार्थपूर्ति के स्थान पर समर्पण का भाव चाहिए. संघ ने भी कहा कि समर्पण का भाव अधिकाधिक बढ़ना चाहिए. इस समर्पण भाव को बढ़ाने के लिए संघ ने एक प्रक्रिया विकसित की. उसी के अन्तर्गत आज के दिन हम धन का भी समर्पण करते हैं. पर धन का समर्पण पर्याप्त नहीं इसलिए कहा कि मन का भी समर्पण होना चाहिए. तन का भी समर्पण होना चाहिए. इस प्रकार यह प्रक्रिया चली. पर इस कारण अहंकार नहीं आना चाहिए. इसलिए गुरु दक्षिणा की पद्धति प्रारम्भ हुई. यह जो समर्पण शब्द हमने चुना है वह एक सम्यक् है. वैसे कुछ छोड़ने के लिए हमारे दो शब्द, एक समर्पण तो दूसरा त्याग है. शब्दों के शाब्दिक अर्थ कई बावर वही रहते हैं. उनकी वाह्य अभिव्यक्तियां भी एक जैसी रहती हैं. परन्तु उनके भाव में भिन्न रहती है. उनके अंदर. मनावृत्ति मंें अंतर रहता है. त्याग में भी मनुष्य छोड़ता है और समर्पण में भी. लेकिन दोनों मे अंतर यह है कि त्याग में अपने अंदर का यह भाव रहता है कि मेरे पास है, मेरा है और वह मैंने छोड़ा है, किसी प्रकार उपकार किया है. उसमें अहंकार का विकास पैदा होने की आशंका रहती है. परन्तु समर्पण में व्यक्ति छोड़ता तो है पर अंदर का भाव ‘तेरा तुझको अर्पित’ का रहने का कारण अहंकार की विकृति नहीं आती. समर्पण भाव के अभाव का अच्छा उदाहरण मंदिर का नाम बिड़ला मंदिर होना है. वहीं समर्पण की पराकाष्ठा का उत्तम उदाहरण भगवान श्री कृष्ण की वंशी और गोपिकाओं के संवाद हैं. यदि यह समर्पण भाव हमारे मन में जमा तो हमारे अंदर जितने भी दैवी गुण हैं, जितनी भी दैवी संवेदनायें हैं, वे अपने आप प्रस्फुटित होंगी. इसलिए समर्पण की जो अंतिम पराकाष्ठा हतै इस संदर्भ में विचार करके जितना अधिक समर्पण का भाव जितना अधिक तत्वनिष्ठा का भाव हमारे जीवन के अन्दर जागृत होता चला जायेगा उतने ही प्रमाण में केवल धन का, समय का ही नहीं, परमेश्वर ने हमारे अंदर जितनी भी प्रतिभाएं दी हैं, उन सबका समर्पण, उन सबका उपयोग समाज जीवन में वांछित परिवर्तन लाने के लिए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वप्रेरणा हमें प्राप्त होती रहेंगी.