तुर्की में बदलता राजनीति माहौल

4 years ago फकरे आलम 0

तुर्की के भारत में राजदूत और भारतीय पर्यटक मंत्री कुछ दिन पहले नई दिल्ली में दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध को और अधिक मजबूत करने के लिए पर्यटन के माध्यम से हाथ मिला रहे थे! तुर्की एक बार फिर से विश्व में मुस्लिम देशों की नेतृत्व के लिऐ तैयार हो गया था! मगर पश्चिमी देशों के द्वारा लगाये गये आग से अपने आप को बचा न सका! और परिवर्तन के नाम पर अरब देशों में लगाया गया आग अब तुर्की को भी अपने लपेटों में लेता दिखाई देता है। तुर्की, भारतीय उपमहाद्वीप में निवास करने वालों का सम्मान करता है। क्योंकि भारतीय मुसलमानों ने और भरतीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ गांधी जी का तुर्की को प्राप्त हआ सहयोग उन्हें आज तक स्मरण है। जिसके कारण भारत, पाकिस्तान और बंगला देशों से तुर्की जाने वालों का विशेष आदर सरकारी और गैर सरकारी स्तर भी किया जाता है। तुर्की का वर्तमान अस्तित्व मुस्तफा कमाल पाशा आतातुर्क से है। पूर्व महाशक्ति का अस्तित्व आज भी भारतीयों के दम खम से है। तुर्कों की वर्तमान, ब्रिटेन, फ्रांस और यूनान की प्रास्ता के पन्नों पर लिखा वर्तमान का इतिहास है। मुस्तफा कमाल की राजनीति सूझबूझ और रणनीति अनेकों यूरोपीय महाशक्ति की पराजय की गाथा है। मुस्तफा को अगर आतातुर्क अर्थात तुर्कों के पिता की उपाधि उनके आधुनिक निर्माता के रूप में देखा जाता मगर मेडिकल कॉलेज खोलने और प्रिंटिंग प्रेस को गैर इस्लामिक बताना दुर्भाग्यपूर्ण कदम था। तुर्की में भूचाल का प्रमुख कारण तुर्की में लोकतंत्र और इस्लामी कानून को लागू करने में विवाद है! तुर्की के सेना प्रमुख ने इस्लाम समर्थक को विद्रोही के रूप में सामने आने की आशंका जताई है। कट्टरपंथियों का विरोध तुर्की को प्राप्त होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और तर्की को यूरोपीय यूनियन में शामिल होने की राह में सबसे बड़ी रूकावट है। विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश करने और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में चलने के लिऐ तुर्की को कट्टरपंथी के मार्ग को छोड़ना होगा जिसे कट्टरपंथी सहजतापूर्वक स्वीकार नहीं कर सकते। 1960 में अमेरिकन प्रयास से तुर्की को नाटो की सदस्यता प्रदान की गई थी जो यूरोपीय देशों में धार्मिक देशों को शीत युद्ध में दिशा प्रदान करना था। 1963 में तुर्की ने अपने आप को यूरोपीय देशों की संघ में शामिल होने के लिए प्रार्थना पत्र दिए थे। आज भी तुर्की के लिये यूरोपीय संघ में प्रवेश के रास्ते में धर्म ही बाधा है। मानव अधिकार को तुर्कों पर आरोप के रूप में प्रयोग होता आया है। वैसे तुर्की का रहन सहन, सभ्यता एवं संस्कृति सभी यूरोपीय देशों से मिलती जुलती है। वर्तमान समय में यूरोपीय यूनियन में मुसलमानों की संख्या 2 करोड़ है। जो तुर्की की 7 करोड़ जनसंख्या मिलकर उनके असंतुलन न पैदा कर दे। अर्थात मुसलमानों की संख्या 3 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो जायेगी। जो यूरोप के सामाजिक, आर्थिक एवं संस्कृतिक स्थिति पर अवश्य ही प्रभाव डालेगा।

विश्व भर के देशों में फल-फूल रहे आतंकी और धार्मिक संगठनों की कार्यप्रणाली ने यूरोपीये देशों को डरा रखा है। तुर्की में लगभग 12 वर्षों के पश्चात् अशांति फैलती जा रहा है। तुर्की का इतिहास रहा है कि प्रत्येक तीन चार वर्ष के पश्चात् यहां पर आर्थिक, सामाजिक और सामरिक एवं धार्मिक परिवर्तन दिखाई पड़ते रहे हैं। साठ के दशक में जब तुर्की में विरोध और अशांति के पीछे ब्रिटेन, रूस, अमेरिका और इजराइल का हाथ माना जा रहा था। जबकि कमाल पाशा के उत्तराधिकारी और उनकी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी ने कमाल के नाम का राजनीति दुरूपयोग ही किया। वर्तमान अस्थिरता और अशांति का बीजारोपण लगभग बारह वर्ष पूर्व हो चुका था। नाटो और यूरोपीयन यूनियन इसके बिना अधूरा रहने लगा। तुर्की की सरकार ने अपने देशों में चल रहे व्यापार के अन्तर्गत राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की ब्याज दरों में कमी की है। जो अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के लाबी को अच्छा नहीं लगा। वर्तमान समय में तुर्की की सत्ता पर शासन करने वाली जस्टिस एण्ड डेमोक्रेटिक पार्टी ने 2002 से सात चुनाव करवा चुकी है और पार्टी लगातार अपना जनाधार बढ़ाते हुए सत्ता में मजबूत से मजबूत होती जा रही है। प्रधानमंत्री तैयब अरदगान के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने वाली रिपब्लिकन पार्टी ने आम चुनाव की चुनौती भी सरकार को दे डाली है। प्रधानमंत्री देश भर में लगातार समय-समय पर सर्वे करा कर अपनी स्थिति पर निगरानी बनाऐ रहते हैं। जिसे जून में 54 प्रतिशत जनता का समर्थन प्राप्त था। तुर्की के प्रधानमंत्री ने अपनी जनता से आह्वाहन किया है कि बर्तन बजाने के बजाए अपने हाथ में लैपटाप ले और काम करे। समय व्यर्थ न गवायें। तुर्की की अस्थिरता में इस्लाम विरोधी शक्ति सफल होते दिखाई पड़ रही है। जो अफगान में रूसी दखल अंदाजी के नाम से शुरू होकर, ईराक, लिबिया, शाम में न केवल राजनीति अस्थिरता पैदा गई, बल्कि बड़े स्तर पर आर्थिक क्षति और लाखों जाने अब तक ले चुकी है। ट्यूनेशिया और मिस्र भी प्रेरणा है। तुर्की न केवल यूरोपीय संघ और नाटो के करीब है बल्कि यह देश अमेरिका का विश्वासपात्र ओर मित्र और राष्ट्र है। सरकार देश की राजधानी स्तम्बूल में गेजी पार्क का निर्माण करवाना चाहती है। जनता इसका विरोध कर रही है। ऐतिहासिक महत्व के इस पार्क को जनता वर्तमान स्थिति में ही देखना चाहती है। ईराक पर कार्यवाही के समय तुर्की ने अमेरिका से बड़ी डील की थी। साथ में तुर्की एक शक्तिशाली आर्थिक मुस्लिम देश होने के नाते निशाने पर है। कुछ समय से तुर्की ने इजराइल पर राजनीति हमले बोले हैं और उनकी कार्यवाही का विरोध किया था और इजराईल पर राजनीति दबाव बढ़ा दिये थे। तुर्की की सरकार इस्लामी सरकार नहीं है और तुर्की के संविधान में धर्म के नाम पर चुनाव नहीं लड़ा जा सकता। वर्तमान सरकार का विरोध उनके हाथों में आ गया है। जिसके हाथों से सत्ता हमेशा-हमेशा के लिऐ चली गई है और तुर्की एक मजबूत प्रजातंत्र वाला देश है। जिसकी नींव 80 वर्ष पूर्व रखी गई थी। तुर्की की राजनीतिक इतिहास में कमाल आतातुर्क के बाद अगर किसी राजनीतिक व्यक्ति को सहृदय सम्मान दिया गया वह वर्तमान प्रधानमंत्री तैयब अरदगान है। तुर्की आज विश्व की सातवीं सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति है जो यूरोप में सबसे बड़ी सरदर्दी है। देखिऐ एक ओर विश्व का तुर्की विरोधी खेमा और एक और वर्तमान तुर्की का नेतृत्व करता तैयब अरदगान है। आगे देखिये विरोध का जनसैलाब तुर्की की राजनीति पर कितना प्रभाव डालता है। और अमेरिका एवं यूरोप की कूटनीति कितनी सफल रही है।