युवा संघर्ष की दास्तां

5 years ago शालिनी कुमारी 0

source फरहान अख्तर मिल्खा सिंह के किरदार में इस तरह डूब गये हैं कि एक बार को दर्शक भूल जाते हैं कि जिसे वो देख रहे हैं वो मिल्खा नहीं, फरहान अख्तर हैं. इसे शायद बतौर नायक निभाये गये फरहान के सबसे बेहतरीन किरदार में शामिल किया जाये…

here अथक परिश्रम, पूर्ण समर्पण और अथक प्रयास किसी को भी जमीन से आसमान तक पहुंचा सकते हैं. ये शब्द ‘फ्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह की जिंदगी के लिए अक्षरशः सत्य हैं. ‘पान सिंह तोमर’ फिल्म की अपार सफलता के बाद मानो बॉलीवुड में किसी खिलाड़ी के जीवन को रूपहले पर्दे पर उतारने की होड़ लग गयी है. इसी कड़ी में बनी है महान एथलीट मिल्खा सिंह पर फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’

follow राकेश ओमप्रकाश मेहरा के डायरेक्शन में बनी यह एक बेहतरीन फिल्म है. ‘भाग मिल्खा भाग’ एक सिख बच्चे, सैनिक और एथलीट के संघर्ष की कहानी को रूपहले पर्दे पर बखूबी जीवंत करती है. पूरी फिल्म जैसे फ्लैशबैक मोड में बयां की गयी है.

source url फिल्म की शुरुआत होती है रोम ओलंपिक से. इसमें एथलीट मिल्खा सिंह अपने रिकॉर्ड को कायम नहीं रख पाते और एकांतवास में चले जाते हैं. तभी इंडिया और पाकिस्तान के बीच सद्भावना गेम्स की घोषणा होती है और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु चाहते हैं कि इसमें मिल्खा सिंह भारत का प्रतिनिधित्व करें. और फिर सारा तंत्र लग जाता है मिल्खा सिंह के कोचों के साथ उन्हें सद्भावना गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कराने की बात मनवाने के लिए.

http://secon.se/?utm_campaign=SVENSK ENERGI CONSULT AB ट्रेन में ही मिल्खा सिंह की पूरी जिंदगी बयान होती दिखायी गयी है कि बंटवारे के समय पाकिस्तान से भारत आया बच्चा तमाम अभावों और तकलीफों के बीच कैसे सबके लिए एक मिसाल बन जाता है. पाकिस्तान के मुल्तान प्रांत में मिल्खा सिंह का जन्म हुआ था, जहां वो अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहते थे.

http://osrodekpiszkowice.pl/?yued=opcje-binarne-poradnik-chomikuj&74b=40 फिल्म के एक दृश्य में मिल्खा सिंह को बचपन में एक नदी तैर कर पार करके स्कूल जाते हुए दिखाया गया है, यह स्थिति आज भी हमारे देश के कई गांवों में बनी हुयी है. न जाने कितने बच्चे आज भी इन स्थितियों को झेलकर आगे बढ़ते हैं. इससे लगता है कि अभी भी दूरस्थ ग्रामीणों की स्थिति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं आया है.

click here एक कहावत है ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ जो मिल्खा सिंह पर बिल्कुल फिट बैठती है. बचपन से ही मिल्खा के पैरों में मानो पंख लगे हुए थे. भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त मिल्खा सिंह के परिवार के सामने प्रस्ताव रखा गया था कि या तो वे हिंदुस्तान की सरहद पार करके भारत चले जायें नहीं तो अपने जन्म स्थान यानी पाकिस्तान स्थित मुल्तान में रहना चाहते हैं तो इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें. मिल्खा का पूरा परिवार अपने धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हो जाता है. सिख बच्चा मिल्खा अपनी जान बचाने में इसलिए कामयाब हो पाता है क्योंकि उन्हें अपने पिता के अंतिम शब्द भाग मिल्खा भाग… याद रहते हैं.

follow site पाकिस्तान से भागकर आया मिल्खा भारतीय सरहद में बचे रिलीफ कैंप में अपनी बिछड़ी हुयी बड़ी बहन इसरी से मिलता है. यहीं से शुरू होती है एक बच्चे के संघर्ष की कहानी. मिल्खा सिंह की बड़ी बहन इसरी का किरदार अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने शिद्दत से निभाया था. उनका किरदार ‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म का बहुत ही अहम हिस्सा है.

http://winevault.ca/?perex=turbotax-option-trading बहनोई का दुर्व्यवहार, पूरे परिवार को खोने का दुख, बंटवारे के बाद मुल्क के बिगड़ते हालात और रिलीफ कैंप का संघर्ष भरा माहौल बचपन में मिल्खा सिंह को चोर-उचक्कों की संगति में डाल देता है. फिर आती है युवा मिल्खा सिंह की जिंदगी में बीरो यानी सोनम कपूर. बीरो की उसकी जिंदगी में आना जैसे मिल्खा की जिंदगी में बहार ले आता है और उसे खुद को साबित करने के लिए प्रेरित करता है.

http://iviti.co.uk/?vera=mercato-delle-opzioni&449=fb यहां एक बहुत ही मजेदार वाकया घटता है. मिल्खा अपनी प्रेमिका बीरो तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक बॉल बनाकर उसके अंदर उसे चिट लिखकर फेंकता है. दो अक्टूबर को छुट्टी वाले दिन ये बॉल बीरो को न मिलकर उसके पिता के हाथ लग जाती है. बाद में मिल्खा बीरो से वादा करता है कि उनके नाम पर भी एक दिन देशभर में छुट्टी मनायी जायेगी और ये बात सही साबित होती है. उसके बाद मिल्खा सिंह आर्मी में भर्ती हो जाते हैं, यहीं से शुरू होती है उनके फ्लाइंग सिख बनने की उड़ान.

http://floralpin.com/eriys/6063 आर्मी के सहयोग, दोनों कोचों की अथक कोशिश, मिल्खा सिंह का जुनून और खुद को बेहतर साबित करने का निरंतर प्रयास भारतीय खेल के इतिहास में एक स्वर्णीय पन्ना दर्ज कर देता है.

enter site पचास-साठ के दशक में कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स, ओलंपिक के अलावा और भी कई प्रतिस्पर्धाओं में मिल्खा सिंह पदकों और कीर्तिमानों की झड़ी लगा देते हैं. इतना ही नहीं 400 मीटर की दौर में विश्व कीर्तिमान स्थापित करते हैं.

इन कीर्तिमानों के साथ ही मिल्खा सिंह की निजी जिंदगी में चल रहे अंतर्द्वंद्वों और उनके परिवार की निर्मम तरीके से की गयी हत्या के कारण उनके मन पर लगे घाव को भी डायरेक्टर ने बखूबी पर्दे पर उतारा है.

फरहान अख्तर मिल्खा सिंह के किरदार में इस तरह डूब गये हैं कि एक बार को दर्शक भूल जाते हैं कि जिसे वो देख रहे हैं वो मिल्खा नहीं, फरहान अख्तर हैं. इसे शायद बतौर नायक निभाये गये फरहान के सबसे बेहतरीन किरदार में शामिल किया जाये. टिपिकल बॉलीवुड फिल्मों से हटकर बनायी गयी ये फिल्म दर्शकों को काफी पसंद आयेगी और शायद एक हद तक इंसपायर भी करे. फिल्म के अंत में भारत-पाकिस्तान सद्भावना खेलों में एक बार फिर मिल्खा भारत को गौरवान्वित करते हैं. तभी पाकिस्तान सरकार उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ के खिताब से नवाजती है और जवाहरलाल नेहरु उनके नाम पर एक दिन की राष्ट्रीय छुट्टी घोषित करते हैं.

प्रसून जोशी ने फिल्म की थीम के अनुसार ही बेहतरीन गीत-संगीत दिया है. ‘हवन करेंगे…’ गाना युवाओं की जुबान पर चढ़ा हुआ है. हालांकि कुछ गाने सुनने में इतने अच्छे नहीं लग रहे, मगर फिल्म में आये दृश्यों के अनुसार वे जरूरी लगते हैं. कुल मिलाकर ‘भाग मिल्खा भाग’ नेहरु के प्रधानमंत्रित्वकाल के एक युवा के संघर्ष की दास्तां है, जिसे डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने पर्दे पर बहुत ही करीने से पर्दे पर जीवंत किया है।