रोटी की गांरटी?

5 years ago बाबूलाल नागा 0

सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारे बिना व्यापक स्तर पर अनाज वितरण योजना को लागू कर पाना मुश्किल होगा. सवाल यह है कि जो सरकार अभी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में थोड़ा बहुत अनाज भी नहीं बांट पा रही है, वह अनाज वितरण कैसे कर पाएंगी. डर है कि यह योजना भी लूट का एक और जरिया न बन जाए. आज भी लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं.

यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘खाद्य सुरक्षा बिल’ पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. कहा जा रहा है कि इस कानून के लागू होने से देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध हो सकेगा. ग्रामीण इलाकों के 75 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों के 50 प्रतिशत लोगों को इसका लाभ मिलेगा. इस कानून में आम लोगों को दो हिस्सों में बांटा गया है. बीपीएल को प्राथमिकता वाले परिवारों में और एपीएल परिवारों को सामान्य परिवारों में रखा है. गरीबों को गेहंू 2 रुपए और चावल 3 रुपए किलो मिलेगा. इसमें गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को पोषक आहार उपलब्ध कराने का प्रावधान है. साथ ही उन्हें छह महीने तक एक हजार रुपए दिए प्रति महीने दिये जाएंगे. आठवीं कक्षा तक के बच्चों को भी भोजन दिया जाएगा. इस कानून को पूरा करने के लिए करीब छह करोड़ टन अनाज की जरूरत पडेगी.

जरूरतमंदों तक खाद्यान्न पहुंचाने की सरकार की ओर से उठाया यह एक अच्छा कदम है, लेकिन चिंताजनक बात यह है कि खाद्य सुरक्षा कानून के मसौदे में इतनी ज्यादा कमियां हैं कि उनके दम पर एक प्रभावी कानून की ओर बढ़ने की कल्पना भी करना मुश्किल है. सवाल है कि यह योजना कैसे लागू होगी, इसका लाभ किसे मिलेगा, अभी यह स्पष्ट नहीं है. इस विधेयक में राशन व्यवस्था का सार्वजनीकरण नहीं किया गया है. साथ ही एपीएल ,बीपीएल के अंतर को भी बनाकर रखा गया है. विधेयक द्वारा राशन व्यवस्था से मात्र अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है. अनाज की मात्रा की आपूर्ति भी प्राथमिक परिवारों के लिए आवश्यकता से आधी और सामान्य परिवारों के लिए एक चौथाई से भी कम है. साथ ही दालों एवं खाद्य तेल का इसमें कोई जिक्र नहीं किया गया है. खाद्यान्नों की कीमतों को मुख्य प्रावधान से अलग रखा गया है, जो अनुचित है. कीमतों का मुख्य प्रावधान में नहीं होने के कारण सरकार कीमतों में अपनी मनमर्जी से वृद्धि कर सकती है. विधेयक के तहत यह भी निर्धारित नहीं किया गया है कि प्राथमिक और सामान्य परिवारों का चयन किस प्रकार किया जाएगा. विधेयक यह भी खुलासा नहीं करता कि प्राथमिक एवं सामान्य परिवारों की संख्या का निर्धारण किस आधार पर किया गया है.

इस विधेयक में ’भोजन‘ से तात्पर्य पका हुआ खाना या खाने के लिए तैयार भोजन या घर ले जाने वाले राशन से है. इसका मतलब हुआ कि जहां जहां मुफ्त भोजन का प्रावधान रखा गया है, वहां कुछ भी दिया जा सकता है. इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में केंद्रीयकृत रसोई की व्यवस्था के उपयोग का भी प्रावधान कानून में रखा गया है. यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के इस सिद्वांत या दिशा निर्देशों के विरुद्ध है कि बच्चों के भोजन व्यवस्था में विकेंद्रीकरण होना चाहिए. दूसरी तरफ देश में लाखों टन अनाज बर्बाद हो रहा है. सड़ रहा है. गरीब भूखे मर रहे हैं. जहां एक तरफ कुछ लोगों को खाने को न के बराबर भोजन मिल पाता है, वहीं दूसरी तरफ अन्य लोगों के पास जरूरत से ज्यादा भोजन है. पूरी दुनिया में 125 करोड़ से अधिक लोग भूख से त्रस्त हैं, जिनमें से एक तिहाई भारतीय हैं.

हमारी प्रणाली में भ्रष्टाचार व कालाबाजारी का काफी बोलबाला है. यहां एक तिहाई राशन कार्ड फर्जी हैं. एक अनुमान के अनुसार 1 करोड़ 50 लाख गरीब परिवारों को अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी…

देश के कई राज्यों में सस्ते अनाज की योजनाएं लागू की गयीं, मगर सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयीं. सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत हो रही लूट को रोकने में कामयाब नहीं हो पा रही. सामाजिक कल्याण व गरीब हटाओ कार्यक्रम के उद्देश्य से प्रारंभ हुई यह प्रणाली अनेक अव्यवस्थाओं की शिकार हो गई है. ऐसे में सरकार से कुछ भी उम्मीद करना बेमानी होगा. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारे बिना व्यापक स्तर पर अनाज वितरण योजना को लागू कर पाना मुश्किल होगा. सवाल यह है कि जो सरकार अभी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में थोड़ा बहुत अनाज भी नहीं बांट पा रही है, वह अनाज वितरण कैसे कर पाएंगी. डर है कि यह योजना भी लूट का एक और जरिया न बन जाए. आज भी लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. दुनिया के भूखे लोगों में हर पांचवां व्यक्ति भारतीय है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश के इन 40 करोड़ भूखे लोगों की आशा है. उन तक खाद्यान्न पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है. खाद्य सुरक्षा योजना का लाभ भी इन भूखे लोगों तक पहुंचाना एक टेढ़ी खीर साबित होगी. दूसरी तरफ इस योजना को भ्रष्टाचार और कालाबाजारी की भेंट चढ़ने से भी बचाना होगा, क्योंकि आज सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ढांचा ध्वस्त हो चुका है. हमारी प्रणाली में भ्रष्टाचार व कालाबाजारी का काफी बोलबाला है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक तिहाई राशन कार्ड फर्जी हैं. कुछ राज्यों में फर्जी राशन कार्ड करीब आधे हैं, मगर उनके नाम का राशन नियमित रूप से उठ रहा है. अधिकारियों, जांच टीम, डीलर व इससे जुड़े अन्य ढांचों में जबरदस्त मिलीभगत है. अनाज की दुकानों पर महंगे दामों में अनाज मिलता है.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राजनीतिक दखल होता है. राशन की दुकानों के आवंटन में नेतागिरी पूरी तरह हावी है. लाइसेंस जारी करना या रद्द लाइसेंस फिर से जारी करना इन्हीं नेताओं के हाथ में होता है. एक अनुमान के अनुसार 1 करोड़ 50 लाख गरीब परिवारों को अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी. गोदाम की देखभाल करने वाले प्रति बोरी बीस रुपये उगाही करते हैं. ऐसा नहीं करने पर उन्हें सड़े हुए अनाज उपलब्ध कराए जाते हैं.एक बोरी में औसतन 52 किलोग्राम गेहूं होता है लेकिन बोरियों से गेहूं निकाल लिया जाता है. दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते इसमें अधिक से अधिक 45 किलो गेहूं रह जाता है. भारत में हर साल करीब 50 हजार करोड़ का अनाज सरकारी कुप्रबंधन के चलते पशुओं के खाने लायक भी नहीं बचता. इस सड़े अनाज को फेंकना पड़ता है. सरकार गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा कानून लेकर आई है. यह खाद्य सुरक्षा कानून किस तरह की शक्ल अख्तियार करेगा. देश के आने वाले कल पर उसका कितना असर पड़ पाएगा. इस कानून का लाभ गरीबों तक कितना पहुंच पाता है. यह तो आने वाला समय ही बतायेगा. सवा अरब आबादी वाले इस देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला यह कानून किफायती साबित हो, इसके लिए सबसे जरूरी है कि सरकार पहले सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करे. इस प्रणाली को ईमानदार और कारगर बनाने की जरूरत है, तभी हर गरीब का पेट भर पायेगा.

गरीब वोटरों को लुभाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून

अंततः केन्द्रीय मंत्रिमंड़ल ने विपक्षी दलों की तमाम आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को मंजूरी दे ही दी. इस अध्यादेश को राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गयी है. अब खाद्य सुरक्षा अध्यादेश कानून का रूप ले चुका है.

पिछले चार वर्षों के कार्यकाल के दौरान यूपीए सरकार ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया, इसलिए खाद्य सुरक्षा कानून पर सवार होकर 2014 के चुनाव में फतह की जुगत में कांग्रेस इसे ऐन-केन-प्रकारेण लाना चाहती थी. इसलिए खाद्य सुरक्षा कानून संसद के जरिए नहीं, बल्कि अध्यादेश के जरिए लाया गया, क्योंकि केन्द्र सरकार को भय था कि कहीं संसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने पर अस्वीकृत न हो जाए. विपक्षी पार्टियां जहां इसे यूपीए सरकार का चुनावी हथकंडा बता रही हैं, वहीं अर्थशास्त्रियों के अनुसार फिलवक्त इसे जमीनी स्तर पर लागू करना संभव नहीं हो पाएगा. अर्थशास्त्रियों के अनुसार खाद्य सब्सिडी के लिए 1.25 लाख करोड़ रूपए की आवश्यकता होगी, जबकि सरकारी घाटा क्रेडिट रेटिंग पर तलवार की तरह लटक रहा है.

सरकारी पक्ष का कहना है कि सरकार ने पिछले दो वर्षों में न केवल सात करोड़ टन खाद्यान्न जुटाया है, बल्कि अभी सरकारी गोदामों में 7.8 करोड़ टन अनाज मौजूद है. सरकारी आकलन के मुताबिक इसमें सिर्फ 6.2 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी. जब खाद्य सब्सिडी बढ़ाने की कोई खास जरूरत ही नहीं है तो फिर प्रश्न उठता है कि मौजूदा खाद्य सुरक्षा कानून में इसपर जोर क्यों डाला गया है. दरअसल सरकारी तंत्र के आंकड़े सही नहीं हैं. देश में खाद्यान्नों की पैदावार 25 करोड़ टन है, जबकि खाद्य सुरक्षा के लिए छह करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी. देश में अनाज रखने की समस्या है, हर साल लाखों टन अनाज खुले में सड़ जाता है. उच्चतम न्यायालय भी इस पर अपनी नाराजगी जता चुका है.

सरकार लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को त्रुटिरहित बताती है, जबकि क्रेडिट रेटिंग एजेंसी र्क्रिसिल के अनुसार झारखंड में 43.5 प्रतिशत, उतर प्रदेश में 35 प्रतिशत, बिहार में 16 प्रतिशत बीपीएल परिवारों ने ही रियायती दर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए चावल खरीदा. शेष परिवारों को लाभ नहीं मिल रहा है. ऐसी परिस्थिति में सभी गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जोड़े बिना खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ उन्हें कैसे प्राप्त हो सकता है ? गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़, ओडिशा तथा तमिलनाडु की सरकारों ने अपने-अपने राज्यों की गरीब और कुपोषित आबादी को भोजन का अधिकार खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पहले से ही दिया हुआ है. केन्द्र द्वारा पारित खाद्य सुरक्षा कानून उक्त राज्यों में कैसे लागू किया जाएगा. देश की 67 प्रतिशत आबादी के लिए हर महीने प्रति व्यक्ति पांच किलो गेहूं या चावल की व्यवस्था करने वाला नया खाद्य सुरक्षा कानून देश के लगभग 32 करोड़ लोगों को किस तरह खाद्य सुरक्षा प्रदान करेगा, जो एक वक्त भूखे पेट ही सोते हैं. फिलहाल देश की लगभग एक तिहाई आबादी भूखी और कुपोषित है. राष्ट्रीय पोषण से जुड़ी देश की कई संस्थाओं के आकलन के अनुसार एक वयस्क व्यक्ति को पर्याप्त पोषण के लिए प्रतिमाह 12.14 किलोग्राम अनाज के अलावा 1.5 किलो दाल व 800 ग्राम खाद्य तेल की आवश्यकता पड़ती है. ऐसे में केन्द्र सरकार उन्हें केवल 5 किलो गेहूं या चावल देकर खाद्य सुरक्षा के नाम पर महज खानापूर्ति नहीं करेगी.

यहां यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताने वाले देश के प्रधानमंत्री की पहली प्राथमिकता कुपोषण के खिलाफ जंग होनी चाहिए. भारत में बच्चों की बहुत बड़ी आबादी कुपोषण की शिकार है, परंतु कुपोषण के खिलाफ जंग का ऐलान न कर केन्द्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून लाना वोट बैंक की राजनीति से ज्यादा कुछ भी नहीं है. संसद में बहस से डरने वाली यूपीए सरकार ऐन-केन-प्रकारेण अध्यादेश के सहारे खाद्य सुरक्षा कानून का क्रियान्वयन कर भी सकेगी, यह संदेहात्मक लगता है.