हाशिये पर आदिवासी

5 years ago राजीव कुमार 0

संथाल हूल का महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जर्मनी के समकालीन चिंतक कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोटस आफ इंडियन हिस्द्री’ में जून 1855 के संथाल हूल को जनक्रांति की संज्ञा दी है. परंतु भारतीय इतिहासकारों ने आदिवासियों की उपेक्षा करते हुए इतिहास में इनको हाशिये में डाल दिया, परिणामस्वरूप आज सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव व इनकी दो सगी बहनें फूलो एवं झानो के योगदान को इतिहास के पन्नों में नहीं पढ़ा जा सकता है.

झरखंड में बिरसा मुंड़ा के जन्म से कई वर्ष पहले संथाल परगना के भगनाडीह गांव में चुनका मुर्मू के घर चार भाइयों  सिद्धू, कान्हू, चांद एवं भैरव तथा दो बहनें फूलो एवं झानो ने जन्म लिया. सिद्धू अपने चार भाइयों में सबसे बड़े थे. कान्हू के साथ मिलकर वर्ष 1853 से 1856 तक संथाल उन्होंने हूल अर्थात संथाल विपल्व, जो अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ लड़ा गया, का नेतृत्व किया.

इतिहासकारों ने संथाल विपल्व को मुक्ति आंदोलन का दर्जा दिया है. संथाल हूल या विपल्व कई अर्थों में समाजवाद के लिए पहली लड़ाई थी, जिसमें न सिर्फ संथाल जनजाति के लोग बल्कि समाज के हर शोषित वर्ग के लोग सिद्धू एवं कान्हू के नेतृत्व में आगे आए.

इस मुक्ति आंदोलन में बच्चे, बूढ़े, मर्द-औरत सभी ने बराबर हिस्सेदारी की. चारों भाइयों की दो बहनें फूलो और झानो घोड़े पर बैठ साल पत्ता लेकर गांव-गांव जाकर हूल का निमंत्रण देती थी और मौका मिलने पर अंग्रेज सिपाहियों को उठाकर ले आती थी और उनका कत्ल कर देती थी. आज भी इस मुक्ति आंदोलन की अमरगाथा झारखंड के जंगलों, पहाड़ों, कंदराओं तथा जन-जन के हृदय में व्याप्त है.सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में चलाया गया यह मुक्ति आंदोलन 30 जून 1855 से सितम्बर 1856 तक अविराम गति से संथाल परगना के भगनडीहा ग्राम से बंगाल स्थित मुर्शिदाबाद के छोर तक चलता रहा. इसमें अत्याचारी जमींदारों, महाजनों, अंग्रेज अफसरों, अंग्रेजों का साथ देने वाले भारतीय अफसरों, जमींदारों, राजा-रानी को कुचलते हुए इन लोगों की धन-सम्पदा पर कब्जा किया गया. यह धन-संपदा सिद्धू एवं कान्हू ने सारे गरीबों में बांट दिया था.भगनाडीह ग्राम में 30 जून 1855 को सिद्धू एवं कान्हू के नेतृत्व में एक आमसभा बुलाई गयी, जिसमें भगनाडीह ग्राम के जंगल तराई के लोग तो शामिल हुए ही थे, दुमका, देवघर, गोड्डा, पाकुड़ जामताड़ा, महेशपुर, कहलगांव, हजारीबाग, मानभू, वर्धमान, भागलपुर, पूर्णिया, सागरभांगा, उपरबांध आदि के सभी समुदायों के तकरीबन दस हजार लोगों ने भाग लिया.ठसमें सभी एकमत से जमींदारों, ठेकेदारों, महाजनों एवं अत्याचारी अंग्रेजों एवं भारतीय प्रशासकों के खिलाफ लड़ने तथा उनके सभी अत्याचारों से छुटकारा पाने के लिए दृढ़ संकल्प हुए तथा सर्वसम्मति से सिद्धू एवं कान्हू को अपना सर्वमान्य नेता चुना. अपने दोनों भाइयों को सहयोग देने के लिए सिद्धू एवं कान्हू के दो अन्य भाइयों चांद और भैरव भी इस जनसंघर्ष में कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और अपना सर्वस्व न्यौछावर किया. इस आम सभा में अनुशासन और नियम तय किए गए. अलग-अलग समूहों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गयीं. भारत में पांव जमाते अंग्रेज व्यापारियों को उखाड़ फेंकने का इस आम सभा में उपस्थित दस हजार लोगों पर उन्माद सा छा गया था. 30 जून 1855 में अंग्रेज अत्याचारियों के खिलाफ संघर्ष के जुनून का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष खेती नहीं करने का फैसला किया गया. ऐसा फैसला लेना मामूली बात नहीं थी.सिद्धू और कान्हू ने यह फैसला इस मकसद से लिया था कि आदिवासी लोग तो कंद-मूल खाकर रहे लेंगे, पर जब खेती ही नहीं होगी तो अंग्रेज और उनके मातहत रहने वाले बाबू क्या खायेंगे. गौरतलब है कि अनाज खाते तो सभी थे, पर उपजाते सिर्फ आदिवासी थे. हालांकि इस फैसले ने गरीब आदिवासियों को मरने का रास्ता दिखाया था, परंतु जिन्दगी के लिए लड़ने का वह उन्माद उन लोगों पर ऐसा छाया था कि यह फैसला भी सर्वसम्मति से आमसभा में पारित हो गया और खेती बंद कर दी गयी.

इतिहास गवाह है कि 1767 के मार्च में बढ़ते बंदूकधारी अंग्रेज फौजियों को रोकने के लिए धालमूमगढ़ के आदिवासियों ने अपने-अपने घर आग लगाकर फूंक दिये थे. उन्होंने तीर-धनुष और गौरिल्ला हमलों के बल पर 1767 से 1800 तक अंग्रेजों को अपने क्षेत्रों में घुसने नहीं दिया था. 30 जून 1855 को भगनाडीह ग्राम में आहूत आमसभा में लिया गया खेती नहीं करने का निर्णय भी अपना घर फूंकने जैसा ही था. वर्ष 1855 में अंग्रेज सरकार के कोलकाता से संथाल परगना के लोहपहाड़ तक रेलवे लाइन बिछाने के फैसले ने संथाल विपल्व की आग में घी डालने का काम किया. रेल लाइन बिछाने के क्रम में संथालों के बाप-दादाओं के भूखंडों को बिना मुआवजा दिए कब्जा लिया गया. हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि संथालों से छीन ली गयी.

रेलवे लाइनों में गरीबों को बेगार मजदूरी करवायी गयी तथा उन्हें जबरन कोलकाता भेज दिया गया. इतिहास में टामस और हेनस नामक ठेकेदारों का जिक्र आता है, जिन्होंने आदिवासियों पर अमानुषिक अत्याचार किए. बच्चे, बूढ़े तथा औरतों को भी नहीं बख्शा गया. लोगों के लिए अत्याचार सहन करना मुश्किल हो गया था. समुदाय के स्वाभिमान का प्रश्न आ खड़ा हुआ था. 30 जून 1855 को सभी एकमत थे कि अब और नहीं सहेंगे और उन्होंने तय किया कि इस साल धान नहीं, अत्याचारी अंग्रेजों और उनके समर्थकों के गर्दनों की फसल काटेंगे. इसी के बाद हूल अर्थात विपल्व शुरू हुआ. संथाल परगने की धरती लाशों से बिछ गयी, खून की नदियां बहने लगीं. तोपों और बंदूक की गूंज से संथाल परगना और उसके आसपास के इलाके कांप उठे. संथाल विपल्व की भयानकता और सफलता इस बात से लगायी जा सकती है कि अंग्रेजों के तकरीबन दो सौ साल के शासनकाल में केवल इसी आंदोलन को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया गया था, जिसके तहत अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों एवं उनके समस्त सहयोगियों को कुचलने के लिए अमानुषिक अत्याचार किए. इस घटना का जिक्र इतिहास के पन्नों में पूरी तरह नहीं मिलता है, परंतु अंग्रेजों द्वारा किये गये अमानुषिक अत्याचारों की झलक संथाली परम्पराओं, गीतों, कहानियों में आज भी झारखंड में जीवित है.संथाल विपल्व विश्व का पहला ऐसा आंदोलन था जिसमें औरतों ने भी समान भागीदारी निभाई थी. 30 जून 1855 के बाद से लेकर अक्टूबर माह के अंत तक चले आंदोलन में पूरे क्षेत्रों में फैले करीब सभी गांवों पर आंदोलनकारियों का अधिकार हो चुका था. इस दौरान महेशपुर के सम्मुख हुयी भिड़ंत में सिद्धू, कान्हू तथा भैरव घायल हो गए, जिसमें सिद्धू के जख्म गंभीर थे. कान्हू और भैरव जड़ी-बूटी के पारम्परिक उपचार से ठीक होकर फिर आंदोलन में कूद पड़े. सिद्धू को ठीक होने में कुछ ज्यादा वक्त लगा, मगर इसी बीच एक विश्वासघाती ने अंग्रेजों को सूचना दे दी और सिद्धू को पकड़वा दिया. यह संथाल विपल्व को पहला झटका था. दूसरा झटका जामताड़ा में लगा, जब उपरबांधा के सरदार घटवाल ने धोखे से कान्हू को जनवरी 1856 में अंग्रेजी सेना के हवाले कर दिया. सिद्धू को अंग्रेज पहले ही फांसी दे चुके थे. आनन-फानन में एक झूठा मुकदमा चलवाकर कान्हू को भी फांसी पर लटका दिया गया. हालांकि सिद्धू, कान्हू व उनके दो अन्य भाई चांद और भैरव इस संथाल विपल्व में शहीद हो गये थे, मगर अंग्रेज इस आंदोलन को पूर्णत कुचल नहीं पाए. भारत का यह दूसरा महान विपल्व था. वर्ष 1831 का कोल विपल्व भारत का प्रथम महान विपल्व था तथा 1857 का सैनिक विद्रोह भारत का तीसरा महान विपल्व था.

वर्ष 1855 के संथाल विपल्व में अंतर्निहित शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने विपल्व की शक्ति कम करने के लिए बिना मांगे भारत में सबसे पहला आदिवासी नाम का प्रमंडल ‘संथाल परगना’ का निर्माण किया तथा संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम बनाया. इसमें कोई दोराय नहीं कि भारत का प्रथम राष्द्रीय आंदोलन कहा जाने वाला 1857 का सैनिक विद्रोह बहुत कुछ संथाल विपल्व के पदचिन्हों पर चला और आगे इसी तरह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता रहा. संथाल हूल का महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जर्मनी के समकालीन चिंतक कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोटस आफ इंडियन हिस्द्री’ में जून 1855 के संथाल हूल को जनक्रांति की संज्ञा दी है. परंतु भारतीय इतिहासकारों ने आदिवासियों की उपेक्षा करते हुए इतिहास में इनको हाशिये में डाल दिया, परिणामस्वरूप आज सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव व इनकी दो सगी बहनें फूलो एवं झानो के योगदान को इतिहास के पन्नों में नहीं पढ़ा जा सकता है. झारखंड के बच्चों को इन महानायकों एवं नायिकाओं के संबंध में पढ़ाया ही नहीं जाता है. हूल विपल्व आज भी अप्रासंगिक है, क्योंकि जिस उद्देश्य से सिद्धू और कान्हू ने विपल्व की शुरुआत की थी, वह आज 158 वर्षों बाद भी झारखंड के आदिवासियों को हासिल नहीं हो पाया है. झारखंड राज्य गठन के बाद आज तक मुख्यमंत्री समेत कई अन्य महत्वपूर्ण विभागों में आदिवासी नेतृत्व रहा, परंतु आदिवासियों का शोषण निरंतर जारी है. राज्य में जहां अबुआ दिशोम का नारा हाशिये पर चला गया, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक और वैचारिक शून्यता के कारण जल, जंगल, जमीन को लेकर आज भी आदिवासी संघर्षरत हैं.