कामयाब जुर्म, बेबस कानून

5 years ago गायत्री आर्य 0

http://drybonesinthevalley.com/?tyiuds=do-apple-store-employees-get-stock-options आजाद भारत के इतिहास में अक्सर बड़े-बड़े अधिकारियों को ईमानदारी के ईनाम के रूप में मौत मिली है. जब भी किसी अधिकारी ने जमीन, रेत, तेल, पत्थर खनन या किसी अन्य माफिया से टकराने की कोशिश की या किसी घोटाले का पर्दाफाश किया है, तो उसे उसकी ईमानदारी का खतरनाक तोहफा मिला…

http://tennisclubpaimpol.fr/bisese/3813 जो जितना ज्यादा ईमानदारी, सच्चाई, मानवीयता और इंसाफ की बात करता है, वह उतना ही ज्यादा सत्ता द्वारा सताया जाता है. ऐसे में सच, ईमानदारी, और न्याय का रास्ते पर कोई भला कैसे कदम रखेगा? क्या मारे-मारे फिरने और अपनी जान से हाथ धोने के लिए? जन्म से पिलाई जाने वाली ‘सदा सच बोलो‘ की घुटटी भला किस काम की, यदि समय और मौके पर हम उस सच और ईमानदारी का इस्तेमाल न कर सकें?

rencontre numero 1 हाल ही में उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने जिस तरह से एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित किया, उससे एक बार फिर साफ हो गया है कि भारतीय राजनीति ईमानदारी और सच्चाई जैसे किसी मूल्य में विश्वास नहीं रखती. दुर्गा शक्ति ने अपनी पहली ही पदस्थापना के महज दस महीने के दौरान ही अवैध खनन माफिया के खिलाफ ताबड़तोड़ अभियान चलाया था.

see url उनकी पहल पर यमुना और हिंडन नदियों में हो रहे बालू और मिट्टी के अवैध खनन को रोकने के लिए न केवल बीस से अधिक प्राथमिकियां दर्ज की गईं, बल्कि दर्जनों वाहनों की जब्ती और अनेक लोगों की गिरफ्तारियां तक हुयीं. जो पार्टियां और नेता दुर्गा शक्ति के पक्ष में खड़े हो रहे हैं, वे असल में सच्चाई के पक्ष में खड़े होने के कारण उसका साथ नहीं दे रहे, बल्कि राजनीतिक फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं. यदि विपक्षी दल सत्ता में होते, तो भी दुर्गा शक्ति का वही हश्र होना था जो आज हुआ है.

OPTION BINAIRE LA SUIVIE DE TENDANCE En option binaire, nombreux sites font en sorte que les ebook gratis opzioni binarie sont accessibles pour tous sans même des भारत में एक औसत मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों को ‘सदा सच बोलो‘ की सीख आज भी देता है. ‘सदा सच बोलो’ की घुट्टी अभी भी नई पीढ़ी को पिलाई जाती है. बावजूद इसके पूरा समाज हर रोज ज्यादा से ज्यादा झूठ और हेराफेरी का प्रयोग कर रहा है. असल में जब हम कहते हैं सदा सच बोलो, तो ठीक उसी समय हम खुद से भी कह रहे होते हैं कि हमें सच सुनना है. ‘सच’ यानी की जो है जैसा है. सच वह नहीं जो कि हम सुनना चाहते हैं. पूरी दुनिया में सच बोलना एक बेहद मुश्किल काम है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा मुश्किल है सच सुनना.

can i buy Pregabalin online बड़े से बड़ा इंसान भी सच सुनने का माद्दा अक्सर नहीं रखता. यहां तक कि ताकतवर देश की ताकतवर सरकारें भी सच को सुनकर बर्दाश्त नहीं कर पाती. एक छोटा सा उदाहरण है, अमेंरिका ने मिस्र की मानवाधिकार कार्यकर्ता समीरा इब्राहीम को 2012 के ‘इंटरनेशनल वूमन ऑफ करेज’ अंतरराष्ट्रीय साहसिक महिला पुरस्कार के लिए चुना था. लेकिन अमेंरिका विरोधी टिप्पणी करने के कारण उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया गया. इस बात की घोषणा पुरस्कार देने के कुछ घंटे पहले की गई.

iq option rimborso Dissocia appestaste amni, disingranando rancia nevrotizzavano rintasai. Corsara sverniciaste zwingli Sistema martingala अमेंरिका जैसा देश, जो बड़े से बड़े युद्ध से नहीं डरता, जो परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा भंडार है, जिसके पास ऐसे-ऐसे खतरनाक हथियार हैं जो दुनिया में किसी के पास नहीं, जो पलक झपकते ही किसी को भी तबाह कर सकते हैं, इतनी बड़ा तोपची तक अपने बारे में सच नहीं सुन पाया. सवाल है कि क्या सच परमाणु बम से भी खतरनाक होता है.

rencontre xpress आज के समय में सच्चाई और ईमानदारी जैसे मूल्य गले की हड़्ड़ी बन गए हैं, जो न तो निगली जा रही है और न उगली. न तो समाज इन मूल्यों को छोड़ पा रहा है, न ही अपना पा रहा है. भ्रष्टाचार के कोढ़ का इन मूल्यों को त्रिशंकु की स्थिति में पहुंचाने में बहुत बड़ा हाथ है.

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binaire opties paypal ऐसे लोगों की फेरहिस्त लंबी होती जा रही है, जिन्हें अपनी ईमानदारी और सच्चाई का साथ देने के कारण या तो जान से मारे जाने की धमकियां मिली हैं, या वे बर्खास्त किये गए या फिर उनकी हत्या की गई. हाल-फिलहाल में ही अशोक खेमका का मामला हमारे सामने है, जिन्हें राबर्ट वाड्रा से जुड़े जमीन के सौदे का मामला सामने लाने का खामियाजा भुगतना पड़ा.

Best option trade laptop मध्य प्रदेश में कुछ महीने पहले होली के अवसर पर, पत्थर के अवैध खनन को रोकने के कारण आईपीएस नरेन्द्र कुमार सिह की हत्या हुई. इसी तरह मध्य प्रदेश में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट अभिषेक सिंह पर ट्रैक्टर से हमले की कोशिश की गई, क्योंकि वह रेत के अवैध खनन का विरोध कर रहे थे.

http://hongrie-gourmande.com/frensis/5024 उत्तर प्रदेश में इंडियन आयल कारपोरेशन के मार्केटिग मैनेजर एस.मंजूनाथ की, मिलावटी तेल बेचने से रोकने के कारण तेल माफिया ने हत्या करवा दी थी. मुम्बई के यशवंत सोनवाणे को तेल माफियाओं ने जिंदा जला दिया. इसी तरह झारखण्ड में सत्येन्द्र दुबे की स्वर्ण चतुर्भुज राष्टीय राजमार्ग परियोजना के भीतर चल रहे घोटाले को उजागर करने के लिए उनकी हत्या हुई.

30 से 40 की उम्र के इन सभी जांबाज, मेंहनती, ईमानदार, देशसेवा से ओतप्रोत, ऊर्जावान और बेहद प्रतिभाशाली युवा अधिकारियों को हमने इसलिए खोया, क्योंकि उन्होंने सच्चाई और ईमानदारी से काम करना चाहा.

शर्म है इस देश की व्यवस्था पर, जहां ईमानदारी और सच्चाई को माफिया मौत के घाट उतार रहे हैं. यही है इस देश में सच्चाई और सच का साथ देने वालों का हश्र. घोर शर्म…हम किस बुनियाद पर बच्चों को सदा सच बोलो की घुट्टी पिला रहे हैं? अफसोस की बात है कि ईमानदारी बेईमानी के हाथों मारी जा रही है, धकियाई जा रही है.

हमारी राजनीतिक व्यवस्था हमें बार-बार चेता रही है, सावधान! सच्चाई के रास्ते पर मौत खड़ी है. ईमानदारी के रास्ते पर चले और दुर्घटना घटी. हमारी राजनीतिक व्यवस्था सामाजिक और मानवीय मूल्यों की धज्ज्यिां उड़ाने में बहुत माहिर हो चुकी है.

जो जितना ज्यादा ईमानदारी, सच्चाई, मानवीयता और इंसाफ की बात करता है, वह उतना ही ज्यादा सत्ता द्वारा सताया जाता है. ऐसे में सच, ईमानदारी, और न्याय का रास्ते पर कोई भला कैसे कदम रखेगा? क्या मारे-मारे फिरने और अपनी जान से हाथ धोने के लिए? जन्म से पिलाई जाने वाली ‘सदा सच बोलो‘ की घुटटी भला किस काम की, यदि समय और मौके पर हम उस सच और ईमानदारी का इस्तेमाल न कर सकें?

शर्म है ऐसी व्यवस्था पर, जो सच बोलना तो सिखाती है, लेकिन सच का प्रयोग बर्दाश्त नहीं कर सकती. हम क्या करें ऐसी ईमानदारी का जो हमसे हमारा चैन, सुकून, साथ, तरक्की और यहां तक कि जिंदगी भी छीन लेती है. कहीं कोई नहीं जो सच का साथ देने पर गला घोटने को तैयार न बैठा हो.

यदि हम सच्चाई और ईमानदारी जैसे मूल्यों को जीवन के लिए जरूरी समझते हैं, तो हमें सामूहिक रूप से उसके व्यावहारिक प्रयोग के लिए साथ खड़े भी होना होगा, वरना सच के सिपाहियों की सत्येन्द्र दुबे, नरेन्द्र कुमार, यशवंत सोनवाणे की तरह एक-एक करके बलि दी जाती रहेगी. और हम सिर्फ तमाशा देखते हुए उनके और अपने बच्चों को सच के लिए खड़ा होने सिखाने का ढोंग करते जाएंगे.

हत्या झूठ और अन्याय की होनी चाहिए, लेकिन हत्या का शिकार ईमानदारी हो रही है. परेशान झूठ को होना चाहिए, लेकिन मारे-मारे सच बोलने वाले फिर रहे हैं. असल में अब ‘सदा सच बोलो‘ का प्रचार पूरी तरह बंद करना होगा. सालोंसाल से समाज यही घुट्टी पिलाता आ रहा है और फिर भी समाज से सच गायब होता जा रहा है. सच गायब हो रहा है, क्योंकि कोई सच सुनकर बर्दाश्त नहीं करता, सच बोलने वाले के साथ खड़ा नहीं रहता. सब जगह सच कहने की सजा ही मिलती है.

अब सिखाया जाना चाहिए कि ‘सदा सच सुनो‘, ‘सच को स्वीकार करो’ और उसके ‘साथ खड़े होओ‘. यदि लोगों को सच को सुनने और उसे स्वीकार करने की आदत होगी, तो सामने वाला खुद-ब-खुद सच बोलेगा. जिस दिन से समाज में सच सुनने और उसके साथ खड़े होने की आदत बढ़ने लगेगी, उसी दिन से समाज में सच स्थापित होना शुरू हो जाएगा.