गज़ल

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फूल पर थे काँटे का पहरा

पथ चुभाने के काबिल नहीं है

वो नौका क्या पार लगाये

जब खुदा की ही चाहत नहीं है।।1।।

 

खिलते फूलों को क्या देखते हो

जिसमें रौनक ही कोई नहीं है,

उस पत्थर को क्या पूजते हो,

जिसमें अपनी ही चाहत नहीं है।।2।।

 

ये ख्वाब नहीं है सच्चाई

जिन्दगी के समक्ष मौत आयी

आँखों में झलकते इन गमों की कसम

ये जिन्दगी नहीं है बेवफाई।।3।।

 

जिन्दगी खुशियों की है सोहरत नहीं,

ये गमों की कहानी है,

ये आंखें और ये आँसू,

हर किसी की निशानी है।।4।।

 

जिन्दगी भी वही तड़फड़ाये

जो गमों के दौर में आ जाये,

आंखें भी वही हैं तरसती

जो अपनों से दूर हो जाये।।5।।

 

नीलम मौर्य

सुपुत्री- स्व0 अशोक मौर्य

कक्षा-11

राहुल सांकृत्यायन जन इण्टर कालेज

लछिरामपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.)