घिरती कांग्रेस?

5 years ago अरविन्द जयतिलक 0

कांग्रेस का भी एक बड़ा खेमा तेलंगाना विरोध और संयुक्त आंध्र के समर्थन में डट गया है. कई सांसदों और विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया है. तटीय आंध्र से आने वाले केंद्रीय सरकार के मंत्री पल्लम राजू, पुरंदेश्वरी और चिरंजीवी समेत आंध्र के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी भी बंटवारे के खिलाफ हैं…

यूपीए समन्वय समिति और कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा तेलंगाना राज्य के गठन पर सैद्धांतिक मुहर लगाए जाने के बाद तेलंगाना समर्थकों और विरोधियों के बीच सियासी मोर्चाबंदी तेज हो गयी है. तेलंगाना समर्थक विजय की दुंदुभि बजा रहे हैं, वहीं तटीय आंध्र और रायल सीमा से विरोध की आग सुलग रही है.

आंध्र प्रदेश कांग्रेस का भी एक बड़ा खेमा तेलंगाना विरोध और संयुक्त आंध्र के समर्थन में डट गया है. अलग-अलग दलों के कई सांसद और विधायकों ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. तटीय आंध्र से आने वाले केंद्रीय सरकार के मंत्री पल्लम राजू, डी पुरंदेश्वरी और चिरंजीवी समेत आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी भी बंटवारे के खिलाफ हैं, लेकिन कांग्रेस हाईकमान के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े.

अब उन्हें यह चिंता खाए जा रही है कि आमचुनाव में जनता का सामना कैसे करेंगे. संभव है कि आमचुनाव से पहले मंत्री पद से इस्तीफा देकर जनता की सहानुभूति लूटने की कोशिश करें. कांग्रेस इसके लिए हरी झंडी दिखा सकती है, लेकिन असल चुनौती सीमांध्र और तेलंगाना के बीच पसरती नफरत की आग बुझाने की है, जो फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है. वजह साफ है. तटीय आंध्र और रायल सीमा के लोग इस फैसले को मानने को तैयार नहीं हैं और संवेदनाओं का उफान चरम पर पहुंच चुका है.

समझना होगा कि विरोध सिर्फ तेलंगाना के गठन को लेकर ही नहीं, बल्कि विभाजन के स्वरूप पर भी है. दरअसल, फार्मूले के तहत तेलंगाना में जिन 10 जिलों को सम्मिलित करने का प्रस्ताव हैं, उसमें हैदराबाद भी शामिल है और इसे ही लेकर सबसे बड़ा विवाद है. हालांकि सरकार ने वितण्डा से बचने के लिए 10 वर्षों के लिए हैदराबाद को दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी घोषित कर दिया है, लेकिन अहम सवाल यह है कि मौजूदा समय में हैदराबाद की बागडोर किसके हाथ में होगी? क्या उसका स्वरुप दिल्ली और पांडिचेरी की तरह होगा?

बहरहाल, केंद्र सरकार निर्णय जो भी हो लेकिन हैदराबाद पर सियासत थमने वाली नहीं है. समझना होगा कि हैदराबाद तेलंगाना के बीचोंबीच स्थित है और तेलंगाना उसकी बागडोर अपने हाथ लेने की मांग कर सकता है. लेकिन यह तटीय आंध्र और रायल सीमा की जनता को कबूल नहीं होगा. इसलिए कि हैदराबाद से उनका भी ऐतिहासिक और भावनात्मक लगाव है. हैदराबाद के आकर्षण का एक पक्ष उसकी आर्थिक समृद्धि है.

उल्लेखनीय है कि आंध्र प्रदेश का 45 फीसद राजस्व अकेले हैदराबाद देता है. लाखों छात्रों के लिए जॉब अपार्च्युनिटी का सेंटर भी है. इस शहर में गूगल, माइक्रोसाफ्ट और डेल जैसी मानी-जानी साफ्टवेयर कंपनियां हैं. ऐसे में देर-सबेर केंद्रीय सत्ता को हैदराबाद पर दोटूक फैसला लेना होगा. अन्यथा यह विवाद तेलंगाना और संयुक्त आंध्र दोनों को झुलसाता रहेगा.

हैदराबाद विवाद के अलावा कुछ और भी समस्याएं हैं, जिनका निदान जरूरी है. जैसे कृष्णा और गोदावरी नदी जल का बंटवारा. बता दें कि कृष्णा और गोदावरी का 70 फीसद बहाव तेलंगाना में है. सवाल यह कि क्या तेलंगाना आंध्र को जरूरत भर पानी देगा ? कहना मुश्किल है, इसलिए कि दक्षिण के राज्यों में पानी पर सियासत कोई नई रवायत नही है. अच्छा होगा कि केंद्र सरकार यथाशीघ्र जल बंटवारे का भी रोडमैप तैयार कर ले. इसके अलावा लोगों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है.

यह तथ्य है कि रायलसीमा और तटीय आंध्र के लाखों लोग तेलंगाना में व्यवसाय करते हैं. उनका वहां भारी निवेश है. उन्हें डर है कि तेलंगाना के अस्तित्व में आने के बाद उन्हें वहां से खदेड़ा जा सकता है. तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के चंद्रशेखर राव ने इसका संकेत दे भी दिया है. उन्होंने कहा है कि तटीय आंध्र के लोगों को तेलंगाना छोड़ देना चाहिए. यह उचित नहीं है. लेकिन सौ फीसद सच है कि आने वाले दिनों में यह मसला और जोर पकड़ेगा.यह देशहित में नहीं होगा.

अगर हालात बदतर होते हैं तो इसके लिए केंद्र की यूपीए सरकार जिम्मेदार होगी. इसलिए कि ठोस रोडमैप तैयार किए बिना ही उसने तेलंगाना गठन का फैसला कर लिया. उचित रहता कि सभी मसलों पर विचार-विमर्श के बाद ही यह निर्णय लेती. कहते हैं न कि राजनीति मौके की मोहताज होती है, लेकिन अहम सवाल यह कि क्या इस कवायद से कांग्रेस को लाभ मिलेगा? क्या तेलंगाना और तटीय आंध्र की जनता कांग्रेस का समर्थन करेगी?

समझना होगा कि आंध्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं है. यह सही है कि विभाजन के बाद भी दोनों राज्यों में उसकी ही सरकार बनेगी, लेकिन 2014 के लक्ष्य को हासिल करना उसके लिए आसान नहीं होगा. इसलिए कि तेलंगाना गठन को लेकर तटीय आंध्र और रायलसीमा की जनता बेहद नाराज है और वह आमचुनाव में उसे मजा चखा सकती है. तेलंगाना विरोधी वे राजनीतिक दल भी आमचुनाव में कांग्रेस को खलनायक सिद्ध करने की कोशिश करेंगे.

वैसे भी कांग्रेस के पास वाईएस राजशेखर रेड्डी की तरह कोई सर्वमान्य नेता नहीं है, जो सबको साथ लेकर चले. गौरतलब है कि 2004 के आमचुनाव में वाईएस राजशेखर रेड्डी टीआरएस के सहयोग से लोकसभा की अधिकांश सीटें जीतने में कामयाब रहे. इस जीत ने केंद्र में कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की राह आसान कर दी. 2009 में भी कांग्रेस मैदान मारने में सफल रही. टीआरएस के मुखिया चंद्रशेखर राव मंत्री बने, लेकिन कांग्रेस ने तेलंगाना के मुद्दे को बड़ी आसानी से बर्फखाने में डाल दिया. लिहाजा चंद्रशेखर राव ने नाराज होकर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

जब 2009 में दस दिवसीय उपवास के दौरान उन्हें तेलंगाना के लोगों का व्यापक समर्थन मिला, तो कांग्रेस के कान खड़े हो गए. उसने तुरंत ऐलान कर दिया कि वह तेलंगाना के गठन के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन तटीय आंध्र और रायलसीमा से उठने वाले विरोध के स्वर से डरकर उसे श्रीकृष्ण समिति का गठन करना पड़ा. इस समिति ने कई अहम सुझाव दिए, पर बात नहीं बनी.

चूंकि तेलंगाना गठन में कांग्रेस को सियासी फायदा नजर आ रहा था, लिहाजा उस पर मुहर लगा दी. उधर, टीआरएस मुखिया चंद्रशेखर राव ने भी भरोसा दिया था कि अगर यूपीए सरकार तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूर करती है, तो उनकी पार्टी कांग्रेस में विलय कर लेगी. कांग्रेस का उत्साहित होना स्वाभाविक था, लेकिन सियासत में कथनी और करनी में भेद होता है.

अब टीआरएस विलय के बजाए अपनी राजनीतिक जमीन पुख्ता करने में जुट गयी है. उसकी कोशिश अब आमचुनाव से पहले कांग्रेस से सीटों का सम्मानजनक बंटवारा करना है. ऐसे में यह कहना कि कांग्रेस ने तेलंगाना का गठन कर मैदान मार लिया है, यह सही नहीं है.

सच तो यह है कि तेलंगाना राज्य के गठन के फैसले के बाद कांग्रेस चौतरफा घिर गयी है. बोडोलैंण्ड और गोरखालैंड राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी है. आने वाले दिनों में विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखण्ड और पूर्वांचल राज्य की मांग भी तेज हो सकती है. इस समस्या से निपटना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. संभव है कि वह दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग का एलान कर दे. (साभार)