दलदल में अमर्त्य सेन

5 years ago अरविन्द जयतिलक 0

http://heatherbestel.com/category/uncategorized/page/8/ कितना अच्छा होता कि यूपीए सरकार और कांग्रेस के नुमाइंदे अमर्त्य सेन के कंधे पर बंदूक रख मोदी को टारगेट करने के बजाए सेन के अर्थज्ञान का लाभ उठाते, लेकिन यहां सबकुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है. अर्थशास्त्र के ज्ञानी सांप्रदायिकता पर भाषण दे रहे हैं और जाति और वंशवाद की राजनीति करने वाले धर्मनिरपेक्षता का पैमाना गढ़ रहे हैं…

tips for when you first start dating दुनिया के श्रेष्ठतम अर्थशास्त्रियों में शुमार और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में अपनी नापसंदगी जाहिर कर खुद को सवालों के चक्रव्यूह में फंसा दिया है. अभी तक भाजपा और शिवसेना ही उनके ईमान पर सवाल खड़ा कर रही थी, अब देश के अर्थशास्त्रियों ने भी उन पर मखमल में पत्थर लपेटकर फेंकने शुरू कर दिए हैं.

http://90daygreatbody.com/?kuid=forex-robot-free&84e=49 देश के जाने-माने अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने उनकी सोच पर चोट करते हुए कहा है कि मोदी की रीति-नीति से परिचित हुए बगैर उन्हें वोट न देने की बात करना मूर्खतापूर्ण है. उनका आरोप है कि सेन मोदी को खारिज कर संप्रग की वकालत कर रहे हैं.

http://www.beaujolais-challenge.com/?nikolsa=00225-rencontre&ad3=ce दूसरी ओर डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने उन पर हमला बोलते हुए कहा है कि उन्होंने इंग्लैंड में हिंदुओं के स्कूलों के खिलाफ भाषण दिया, जिसकी वजह से उन्हें राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सेन से भारत रत्न छीन लेने की मांग करनी पड़ी. फिल्मकार अशोक पंडित ने जानना चाहा है कि सेन अल्पसंख्यकों के प्रति चिंता जता रहे हैं, क्या वे कश्मीरी पंडितों के बारे में भी आवाज उठाएंगे?

source url अन्ना की सहयोगी किरण बेदी ने भी ट्विट किया है कि सेन सरकार, भ्रष्टाचार और गरीबी के अंतरसंबंधों पर प्रकाश डालें. कुछ इसी तरह के तीखे सवालों के गोले फेसबुक के जरिए भी सेन पर दागे जा रहे हैं.

http://web-impressions.net/fister/999 लेकिन ऐसा नहीं है कि इस जुबानी महाभारत में अमर्त्य सेन अकेले हैं. कांग्रेस और वामदलों की फौज उनके साथ है. ज्यों ही भाजपा सांसद चंदन मित्रा ने सेन से भारत रत्न लौटा देने की मांग की, दोनों दलों के सिपहसालार उन पर टूट पड़े. सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भाजपा को फासिस्ट कह डाला.

मौका ताड़ अमर्त्य सेन ने भी राग अलाप दिया कि अगर वाजपेयी कहें तो भारत रत्न लौटाने को तैयार हैं. गौरतलब है कि भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अमर्त्य सेन को भारत रत्न से नवाजा था. अब सेन समर्थकों का कहना है कि आखिर उनकी व्यक्तिगत नापसंदगी को इतना तूल क्यों दिया जा रहा है?

http://diebrueder.ch/piskodral/5939 क्या उन्हें राजनीति पर बोलने या व्यक्तिगत विचार रखने का अधिकार नहीं है? उनसे भारत रत्न लौटाने की मांग कहां तक उचित है? आखिर मोदी के बारे में उनकी राय कैसे अलोकतांत्रिक है? बेशक इन सवालों में दम है और उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन यहां सवाल सिर्फ सेन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मोदी की नीतिगत आलोचना तक सीमित नहीं है, सवाल उन धारणाओं का भी है जिसमें मोदी के प्रति उनकी घृणा स्पष्ट झलकती है.

binäre optionen automatikhandel सेन ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में पसंद नहीं हैं, क्योंकि उनकी साख धर्मनिरपेक्ष नहीं है. यह भी कहा कि अल्पसंख्यकों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए उन्होंने पर्याप्त काम नहीं किया. अब सवाल यह कि क्या सेन ने सही कहा है? बेशक वे मोदी को नापसंद करते हैं, तो इससे किसी को ऐतराज नहीं हो सकता.

esempio di opzioni digitali on line मोदी की नीतियों की आलोचना भी गैरवाजिब नहीं है, लेकिन यह कहना कि मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं और उन्होंने अल्पसंख्यकों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए कुछ नहीं किया, यह जरूर आपत्तिजनक और हैरान करने वाला है. सेन की सोच बताती है कि वे उन्हीं लोगों के विचारों से प्रभावित हैं जो तुष्टीकरण को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय मानते हैं.

sheridan options trader यह तथ्य है कि मोदी के एक दशक के शासन में गुजरात में एक भी दंगा नहीं हुआ और आज की तारीख में यहां के अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति बिहार और पश्चिम बंगाल समेत देश के अन्य सभी राज्यों से बेहतर है. गुजरात के मुसलमान अपने को सर्वाधिक सुरक्षित महसूस करने की उद्घोषणा कई बार कर चुके हैं.
पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने मोदी का समर्थन भी किया. यह तथ्य प्रमाणित करता हैं कि मोदी धर्मनिरपेक्ष हैं और अल्पसंख्यकों को लेकर उनके मन में किसी तरह का दुराग्रह नहीं है., लेकिन विचित्र है कि इसके बावजूद भी उन्हें बार-बार सांप्रदायिकता की शूली पर लटकाकर उनसे धर्मनिरपेक्ष होने का प्रमाण मांगा जा रहा है?

agence rencontre femmes roumaines आखिर क्यों? क्या यह उनके साथ ज्यादती और गुजरात की जनता का अपमान नहीं है? जहां तक 2002 के गुजरात दंगे का सवाल है, तो उस आधार पर भी मोदी को सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता. इसलिए कि देश में इससे भी भीषण दंगे हुए हैं और हजारों लोग मारे गए हैं. लेकिन क्या अमर्त्य सेन जैसे लोग कभी इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सांप्रदायिक कहने की हिम्मत दिखाए हैं? अगर नहीं तो फिर गुजरात दंगे की आड़ में मोदी को सांप्रदायिक कहने का क्या मतलब है?

धर्मनिरपेक्ष होने के दो पैरामीटर नहीं हो सकते. उचित होता कि अमर्त्य सेन जैसा महान अर्थशास्त्री मोदी को धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर कसने के बजाए भारत की बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर चढ़ाने में अपने ज्ञान का इस्तेमाल करता. कितना अच्छा होता कि यूपीए सरकार और कांग्रेस के नुमाइंदे अमर्त्य सेन के कंधे पर बंदूक रख मोदी को टारगेट करने के बजाए सेन के अर्थज्ञान का लाभ उठाते. लेकिन यहां सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है. अर्थशास्त्र के ज्ञानी सांप्रदायिकता पर भाषण दे रहे हैं और जाति और वंशवाद की राजनीति करने वाले धर्मनिरपेक्षता का पैमाना गढ़ रहे हैं.

motilium copii online ऐसे में सवाल तो उठेगा ही कि जब बदहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की वैश्विक आलोचना हो रही है, रेटिंग एजेंसियां लगातार सरकार की नाकामी पर सवाल दाग रही हैं, निवेशक अपनी पूंजी बाजार से खींच रहे हैं और महंगाई छलांग लगा रही है, तो अमर्त्य सेन इस पर टिप्पणी करने के बजाए मोदी की धर्मनिरपेक्षता पर वितंडा खड़ा क्यों कर रहे हैं? एक श्रेष्ठ अर्थशास्त्री होने के नाते उनका धर्म है कि वे अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए मंत्र सुझाएं. लेकिन उनकी चुप्पी हैरान करने वाली है.

pariet prescription वामपंथी विचारधारा से ऊर्जा पाने वाले अमर्त्य सेन तब भी चुप रहे जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार सिंगूर और नंदीग्राम में किसानों के खून से होली खेल रही थी. आखिर क्यों? एक हिटलरशाही सरकार का समर्थन आखिर किस तरह की धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक शूरवीरता का प्रमाण है? मोदी को कठघरे में खड़ा करने वाले अमर्त्य सेन को हिंसक माओवादियों के कुकृत्यों से भी परहेज नहीं है. उन्होंने आज तक एक बार भी उनकी आलोचना नहीं की है. हद तो तब हो गयी जब वे माओवादी समर्थक विनायक सेन के पक्ष में अभियान चलाते देखे गए. क्या ऐसे में अमर्त्य सेन की विवादास्पद टिप्पणी पर सवाल नहीं उठना चाहिए?

ranitidine 150 mg biogaran सच तो यह है कि अमर्त्य सेन में सच को स्वीकारने का माद्दा ही नहीं है. दुर्भाग्य है कि देश में ऐसे ही लोगों को बौद्धिक और महान बता इनके सिर सेक्यूलर होने का ताज रखा जा रहा है. यह एक खतरनाक स्थिति है. छद्म धर्मनिरपेक्षता कभी भी देश व समाज के हित में नहीं होता. अमर्त्य सेन ने साक्षात्कार में यह भी कहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के पास बड़ा दृष्टिकोण है और वे शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दे रहे हैं.

दूसरी ओर उन्होंने गुजरात मॉडल से असहमति जताते हुए गुजरात में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ किए जाने की बात कही है. बेशक मोदी सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरीन काम नहीं किया है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए. यह अधिकार अमर्त्य सेन को भी है, लेकिन गुजरात मॉडल की तुलना बिहार मॉडल से करना एक अलग किस्म की राजनीतिक सड़ांध पैदा करती है.

दोराय नहीं कि नीतीश ने बिहार में बेहतरीन काम किया है और उसकी सराहना होनी चाहिए. लेकिन जिस अंदाज में अमर्त्य सेन ने बिहार की शिक्षा और स्वास्थ्य को उम्दा बताकर मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश की है यह उन जैसे व्यक्तित्व को शोभा नहीं देता. बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य कितना उम्दा है उसकी बानगी मिल चुकी है.
अभी पिछले दिनों ही सारण जिले में 23 बच्चे मीड मील खाकर मौत के मुंह में चले गए. अगर बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होती तो कई बच्चों की जान बच सकती थी. सवाल अब यह कि क्या अमर्त्य सेन के दावे में दम है? या किसी के इशारे पर मोदी को खलनायक साबित करने की कोशिश कर रहे हैं?