भटकते युवा

5 years ago राजीव कुमार 0

demo iq opzioni पैसे को युवा पीढ़ी भगवान मान बैठी है, जिसे हासिल करने के लिए मेहनत और दूरदृष्टि के बजाए आत्मकेंद्रित सोच एवं अल्पकालिक चिंतन का रास्ता अपनाया जा रहा है. सफलता का अपना मापदंड युवा पीढ़ियों ने बना रखा है. अगर उस मापदंड पर खरे नहीं उतरे, तो सबसे आसान रास्ता है जान देना.

http://fhlchristianministries.org/?encycloped=Successful-options-trading-websites&777=37 भारत की 54 फीसदी आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है. यहां 35 वर्ष से कम उम्र की आबादी 65 फीसदी है, मगर सवाल है कि क्या यहां की सरकार वाकई युवाओं को लेकर गंभीर है?

http://ramshergill.com/womens/vision/ गौरतलब है कि सरकार ने पंचवर्षीय योजना 2012-17 के तहत नेशनल यूथ पॉलिसी 2012 पिछले वर्ष पेश की थी, जिसे विजन -2030 के मद्देनजर पेश किया गया था. इसमें युवाओं के अधिकार व जिम्मेवारी समेत कई अन्य विषयों का उल्लेख किया गया है, मगर नीति निर्धारण में युवाओं की भूमिका नगण्य रही है.

http://jojofane.com/?njd=op%C3%A7%C3%B5es-binarias-demo-account&d77=b2 इसका ज्वलंत उदाहरण है योजना आयोग द्वारा गठित 41 सदस्यीय परिचालन समिति. यह युवा मामले एवं खेलों के संबंध में गठित की गई थी तथा इसके साथ-साथ 38 सदस्यीय कार्यकारी समूह वयस्क एवं युवा विकास के संबंध में गठित की गयी थी, परंतु इन दोनों समितियों के कुल 79 सदस्यों में से एक भी युवा नहीं थे. युवाओं को अपने दृदृष्टिकोण रखने के लिए उक्त समितियों में कोई जगह नहीं दी गयी.

internet conocer gente आज देश के युवाओं और नीति निर्धारकों की आयु सीमा के बीच चार दशकों का फर्क है. क्या यह फर्क एक मुख्य कारण नहीं है जिससे युवाओं का एक बड़ा वर्ग आगे नहीं आ पाता. देश के नीति निर्धारक उन्हें दक्ष नागरिक बनाने में विफल साबित हो रहा है? सरकार की सबसे बड़ी विफलता यह है कि जिस देश में सारी प्राचीन मान्यताएं टूट गयी हैं, उस देश में नयी मान्यताएं अब भी नहीं बनायी गयी है.

binäre optionen gewerbeanmeldung सरकार के युवा मामलों के लिए कार्यरत संगठन नेशनल सोशल सर्विस (एनएसएस) और नेहरू युवा केन्द्र संगठन (एनवाईकेएस) आज के दौर के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं. इतना ही नहीं सरकार इन दोनों संगठनों के क्रियाकलापों के लिए जारी फंडों में कटौती भी कर रही है.

dating diversions compatibility आज देश के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि हम युवा शक्ति का सदुपयोग कैसे करें. सिर्फ आईआईटी एवं आईआईएम जैसे तकनीकी एवं प्रबंधकीय संस्थानों के भरोसे युवा देश के सक्रिय नागरिक नहीं बन सकते. भ्रष्टाचार के गर्त में डूबे इस देश के युवाओं की बेचौनी और आक्रोश को हम दिल्ली गैंगरेप घटना के दौरान देख चुके हैं.

source url युवाओं की भीड़ साहसिक कार्य करने का जज्बा तो कई बार अवश्य दिखाती है, परंतु भीड़ का रास्ता हर बार इंसाफ की मंजिल की ओर नहीं जाता. भीड़ की मानसिकता एक आदिम व्यवस्था की ओर ले जाती है जिसकी ओर हमारा समाज लौटता दिख रहा है और ऐसा सरकार के युवाओं के प्रति ढुलमुल रवैये की वजह से है. सवाल है कि क्या युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक रुख देना देश के नीति नियंताओं की पहली प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए. क्या युवा मामलों के नीति-निर्धारण में युवाओं को भागीदार नहीं बनाया जाना चाहिए.

binäre optionen aktuell सबसे युवा देश में युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दिए जाने के लिए कोई नीति का नहीं होना आने वाले दिनों में घातक साबित हो सकता है, क्योंकि आज का युवा तकनीक का गुलाम बनता जा रहा है. भोग और विलासिता में डूबा आज का युवा वर्ग अपनी जड़ों से कटा हुआ है. प्रत्येक वर्ष दो लाख छात्र एमबीए पढ़कर तथा पचपन हजार बीटेक इंजीनियरिंग कर बाजार में बेरोजगार घूम रहे हैं.

http://ramblingroseboutique.com/?prertwe=netgear-neotv-hookup&e71=2d आज देश में अनुमानतः पंद्रह से पच्चीस फीसदी कालेज ग्रेजुएट को ही रोजगार मिलता है. शेष सड़क पर बेरोजगार घूमते नजर आ रहे हैं. सोशल मीडिया मानीटरिंग एजेंसी के अनुसार अप्रैल 2013 तक देश में 64 मिलियन फेसबुक यूजर बन चुके हैं, जिनमें से अधिकांश की उम्र 18 से 34 वर्ष के बीच है.

इतनी बड़ी तादाद में बेरोजगार युवाओं का मुख्य शगल साइबर अपराध, नशा, नेटसर्फिंग, लवमैंकीग, बिना विवाह के लीव इन रिलेशनशिप में रहना, नेट पर आभासी रिश्ते बनाना आदि बनता जा रहा है. सरकार अगर युवाओं को एसेट नहीं बना सकती, तो वो दिन दूर नहीं जब युवाओं की भीड़ सरकार की लायबिलीटी बन जाएगी.

cialis 10 mg bestellen कफ शिरप, डेनडराइट टियूब आदि को आज के स्कूल और कालेज के युवा नशे के लिए इस्तेमाल करने लगे है. कई शहरों के स्कूलों और कॉलेजों के आसपास से बोरे के बोरे डेनडराइट टियूब बरामद किए जा रहे हैं. स्पीड के दीवाने इस युवा वर्ग ने बाइकर्स गैंग बना लिये हैं. कई शहरों में, अभी हाल में दिल्ली में ऐसे ही एक बाइकर्स पुलिस के हाथों मारे भी गए हैं.

cardizem 60 mg आभासी दुनिया में रहने वाली यह पीढ़ी बगैर शादी के लिव इन रिलेशनशिप की दुनिया में प्रवेश कर चुकी है, जो समाज की सभी मान्यताओं को तोड़ चुकी है. चैटिंग और सर्फिंग करती इस युवा पीढ़ी के हाथों से अगर लैपटाप और मोबाइल फोन छीन लिए जाएं, तो वे आत्महत्या करने से तक तनिक देर नहीं लगायेगी.

celebrex 200mg cap देश में हर घंटे जैसे बलात्कार की घटनायें हो रही हैं, वैसे ही हर घंटे युवाओं द्वारा आत्महत्या भी की जा रही है. स्पष्ट है कि युवाओं की जिंदगी यांत्रिक होती जा रही है. समाज में फैले अपराध खासकर साइबर अपराध, हिंसा, साजिश, भ्रष्टाचार में जाने-अनजाने ये युवा संलिप्त होते जा रहे हैं.

मुफ्त में मिली आजादी और आधुनिकता ने उन्हें जिंदगी को मजाक समझने में बहुत बड़ा योगदान दिया है. धैर्य और अनुशासन की कमी के कारण प्रतिभावान युवा पीढ़ी आज एक ऐसे दुनिया में विचरण कर रही है, जो हकीकत से कोसों दूर है. व्यक्तिगत सोच और आत्मकेंद्रित चिंतन ने युवा पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर रही है.

पैसे को युवा पीढ़ी भगवान मान बैठी है, जिसे हासिल करने के लिए मेहनत और दूरदृष्टि के बजाए आत्मकेंद्रित सोच एवं अल्पकालिक चिंतन का रास्ता अपनाया जा रहा है. सफलता का अपना मापदंड युवा पीढ़ियों ने बना रखा है. अगर उस मापदंड पर खरे नहीं उतरे, तो सबसे आसान रास्ता है जान देना.

अप्रैल 2013 तक देश में 64 मिलियन फेसबुक यूजर बन चुके हैं, जिनमें से अधिकांश 18 से 34 वर्ष के बीच हैं. इनमें से बड़ी तादाद में बेरोजगार युवा शामिल हैं. बेरोजगार युवाओं का मुख्य शगल साइबर अपराध, नशा, बिना विवाह के लिव इन रिलेशनशिप में रहना, नेट पर आभासी रिश्ते बनाना आदि बन रहा है…

सवाल है कि आखिर क्यों युवा पीढ़ी जिंदगी को इतनी आसानी से खत्म कर रही है. क्या जीवन का उनकी नजर में कोई मोल नहीं है या वे उसकी कीमत नहीं समझते. उनके जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना और तथाकथित सफलता के सोपान तय करना भर है.

सरकार सनातन तरीके से हर वर्ष 12 अगस्त को युवा दिवस मनाती है. राजनीति में जिन युवाओं से बड़ी उम्मीद थी वे कहां हैं. 15वीें लोकसभा के गठन में 40 वर्ष से कम उम्र के 79 सांसद चुन कर आए, जिन्हें चार करोड़ तीस लाख युवा मतदाताओं ने अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था, पर क्या भूमिका निभायी इन युवा सांसदों ने.
अखिलेश यादव, जो अभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री है, ने कभी लोकसभा में अपना मुंह तक नहीं खोला. उनकी पत्नी डिंपल यादव, जो 2012 में लोकसभा पहुंची, ने भी अब तक एक शब्द नहीं बोला है. इसी तरह 15वीें लोकसभा में 36 युवा सांसदों ने एक भी सवाल नहीं पूछा है.

वर्ष 2009 के बाद अनेक ऐसे युवा सांसद चुनकर आए जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार और अपराध के गंभीर मामले दर्ज हुए थे. कई दलों के युवा सांसदों पर तो हत्या का प्रयास, हत्या के लिए अपहरण, हत्या करने, महिलाओं की अस्मत लूटने, डकैती,, सरकारी अधिकारियों को काम करने से रोकने, अश्लील हरकत करने, उत्तेजक भाषण देने, तनाव फैलाने और गरीबों को डराने-धमकाने जैसे गंभीर आरोप लगे हुए है.

ऐसी आपराधिक युवा पीढ़ी जब राजनीति में है, तो देश की 65 फीसदी युवा पीढ़ी का अराजनीतिक रहना स्वाभाविक है. ये अराजनीतिक पीढ़ी अपने राजनीतिक युवा पीढ़ी से किसी बात में कम नहीं हैं. इनका आदर्श है अमेरिका में बसना, किसी भी तरीके से अकूत संपदा अर्जित करना, जीवन का चरम भोग-विलास प्राप्त करना. कुछेक अपवाद मिल सकते हैं, जिससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

देश में हर घंटे जैसे बलात्कार की घटनायें हो रही हैं, वैसे ही हर घंटे युवाओं द्वारा आत्महत्या भी की जा रही है. स्पष्ट है कि युवाओं की जिंदगी यांत्रिक होती जा रही है. समाज में फैले अपराध खासकर साइबर अपराध, हिंसा, साजिश, भ्रष्टाचार में जाने-अनजाने ये युवा संलिप्त होते जा रहे हैं.

युवा का अर्थ होता है यथास्थिति से विद्रोह करने वाला, जो भी गलत है और हो रहा है उसके विरोध में खड़ा होने वाला, बगावत करने वाला. जैसा कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, स्वामी विवेकानंद, जयप्रकाश नारायण, लोहिया ने किया था. मगर आज के युवाओं में कोई विवेकानंद, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद नहीं बन पाया है, जबकि देश की हालत गुलामी के दिनों से भी बदतर है.

जिंदगी को मजाक समझते युवा?

आखिर क्यों युवा पीढ़ी जिंदगी को इतनी आसानी से खत्म कर रही है. क्या जीवन का उनके नजर में कोई मोल नहीं है. क्या जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना और तथाकथित सफलता के सोपान का तय करना भर है…

नीरा सिन्हा

follow धैर्य और अनुशासन की कमी के कारण आज की प्रतिभावान युवा पीढ़ी आज एक ऐसे दुनिया में विचरण कर रही है, जो हकीकत से कोसों दूर है. व्यक्तिगत सोच और आत्मकेंद्रित चिंतन से युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित हो रही है.

स्पीड, अपराध, नशा, नेटसर्फिंग, लव मैंकिंग, नेट के आभासी रिश्ते युवाओं के प्रमुख शगल बनते जा रहे हैं. सोशल मीडिया मानीटरिंग एजेंसी के अनुसार अप्रैल 2013 तक देश में 64 मिलियन फेसबुक यूजर हो चुके हैं, जिसमें से अधिकांश की उम्र 18 से 34 वर्ष बतायी गयी है.

स्पष्ट है कि युवाओं की जिंदगी यांत्रिक होती जा रही है. समाज में फैले अपराध खासकर साइबर अपराध, हिंसा, साजिश, भ्रष्टाचार में जाने-अनजाने संलिप्त होते जा रही है आज की युवा पीढ़ी. इसका मुख्य कारण है उनकी परवरिश और उनकी शिक्षा.

माता-पिता अपने एकल परिवार में इतने आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं कि बच्चों को भी समय नहीं दे पाते हैं और खिलौनों के बजाय मोबाइल फोन, लैपटॉप, डेस्कटॉप, वीडियो गेम दे देते हैं, जिनसे खेलते हुए बच्चों का बालपन खत्म हो रहा है. जब वही बच्चा स्कूल और कालेज में पहुंचता है, तो कमाऊ शिक्षा लेकर बाहर निकलता है. ज्ञान की पूंजी उनके पास नहीं होती. हालांकि सूचनाओं को एकत्रित कर वे खुद को ज्ञानी से कम नहीं समझते, लिहाजा धनार्जन उनके जीवन का लक्ष्य बन जाता है.

पैसे को युवा पीढ़ी भगवान मान बैठी हैं, जिसे हासिल करने के लिए मेहनत और दूरदृष्टि के बजाए आत्मकेंद्रित सोच एवं अल्पकालिक चिंतन का रास्ता अपना लेते हैं. सफलता का अपना मापदंड युवा पीढि़यों ने बना रखा है, अगर उस मापदंड पर खरे नहीं उतरे, तो सबसे आसान रास्ता है जान देना.

परीक्षा और प्रतियोगिता में अगर नंबर कम आ गए तो बस कर ली आत्महत्या. मां-बाप ने डांटा, तो कर ली आत्महत्या. मुंहमांगी चीजें अगर खरीद कर नहीं दी गयी, तो कर ली आत्महत्या. देर रात से घर के बाहर रहने पर डांट पड़ी, तो कर ली आत्महत्या. प्रेमी या प्रेमिका नहीं मिल पाये तो भी आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर लिया जाता है.

समझने वाली बात है कि आखिर क्यों युवा पीढ़ी जिंदगी को इतनी आसानी से खत्म कर रही है. क्या जीवन का उनके नजर में कोई मोल नहीं है. क्या जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना और तथाकथित सफलता के सोपान का तय करना भर है.

छः अगस्त को बोकारो में दो युवाओं, एक छात्र और एक छात्रा ने अलग-अलग घटनाओं में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. पहली घटना सेक्टर-दो, ए आवास संख्या 02-262 में घटी. यहां काली प्रसाद सोरेन के 13 वर्षीय पुत्र अरविंद सोरेन ने अपने पिता के एटीएम से रुपये निकाले. बाद में पिता की डांट और जेल जाने के डर से अरविंद ने कमरे में जाकर अपनी बहन के दुपट्टे से लटक आत्महत्या कर ली. अरविंद 9वीं कक्षा का विद्यार्थी था. आत्महत्या करने के पहले उसने एक सुसाइड नोट भी लिखा था.

दूसरी घटना सेक्टर-छह, डी आवास संख्या 2307 की है. यहां पीसी बाउरी की 18 वर्षीय पुत्री लक्खी कुमारी ने दुपट्टे से फांसी लगा आत्महत्या कर ली. लक्खी बोकारो कालेज के बीए पार्ट वन की छात्रा थी. बताया गया कि 6 अगस्त को उसका रिजल्ट निकला था. रिजल्ट उसके अनुसार ठीक नहीं था. इसी बात से दुखी लक्खी ने घर का मेन दरवाजा बंद कर दिया, टीवी का साउंड बढ़ा दिया और दुपट्टे के सहारे फांसी लगा ली.

लक्खी की एक बहन उस वक्त बाथरूम में नहा रही थी. बाथरूम से बाहर आने के बाद बहन ने फंदे में लटकी अपनी बहन को देखा, तो जोर-जोर से चीखने लगी, जिससे आस-पड़ोस के लोग आए और लक्खी का नीेचे उतारा गया, मगर तब तक उसकी मौत हो चुकी थी.

उक्त दोनों दुर्घटनायें युवा पीढ़ी के दिग्भ्रमित होने की दांस्ता कह रही हैं. हमारे समाज में जाने-अनजाने हर दिन कुछ ऐसा किया जा रहा है, जिससे युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं और उनको सबसे आसान रास्ता आत्महत्या का लग रहा है. पलायन कर रहे हैं, क्योंकि उनमें धैर्य की कमी है.

मीडिया के साथ-साथ हमारा समाज भी युवाओं की इस दशा के लिए एक हद तक जिम्मेदार है. समाज में विभिन्न जातिसमूहों द्वारा सफल युवाओं को इतना महिमामंडित किया जा रहा है कि असफल युवा हीनभावना से ग्रसित हो रहे हैं. विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने पर युवाओं को अखबार की सुर्खियां बना दिया जाता है और टीवी पर इंटरव्यू दिखाए जाते है?

सफलता को महिमामंडित करने का प्रचलन गलत है, क्योंकि आज के युवा पीढ़ी में सोचने-समझने की सलाहियत नहीं है. वे नहीं समझते कि असफलता ही सफलता की सीढ़ी है, अगर ऐसा समझते या उनके अभिभावक, अध्यापक उन्हें ऐसा समझाते तो प्रतिदिन अखबारों में युवकों एवं युवतियों के आत्महत्या सुर्खियां न बनती.

देश के शिक्षा प्रणाली के सुधरने की आशा करना बेकार है, इसलिए अभिभावकों को ही अपने बच्चों को सही दिशा देनी होगी. उनमें धैर्य, सहनशीलता, ज्ञान की अलख जलानी होगी, तभी हमारी युवा पीढ़ी भारत का गौरवपूर्ण भविष्य बन पायेगी. युवा पीढ़ी को समझना होगा कि जीवन एक बार ही मिलता है और यह अनमोल है. जिंदगी को मजाक समझने के बजाय उसकी कीमत समझे.