मैं रूपया हूँ…

5 years ago एम सांकृत्यायन 0

मैं रूपया हूँ. जब मैं लुढ़कता हूँ तो डॉलर खूब इतराता है. एक बार फिर डॉलर शान से खड़ा है. मैं पहले इतना बीमार कभी नहीं था. 1947 में जब भारत आजाद हुआ, उस वक्त मैं भी डॉलर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता था. उस दौर में मेरा यानी भारतीय रूपए का मूल्य अमेरिकी डॉलर के बराबर हुआ करता था. लेकिन आज डॉलर की हैसियत मेरे मुकाबले 70 गुना बढ़ गई है. इसका अर्थ यह हुआ कि मेरे मूल्य में पिछले 66 वर्षों में डॉलर की तुलना में 70 गुना गिरावट हुई है. स्वतंत्रता के बाद से मेरी कीमत लगतार घटती रही है. हाल के महीनों में तो पूरे एशिया में सबसे ज्यादा अवमूल्यन मेरा ही हुआ है. हालात यह है कि आज मुझे दुनिया भर में सबसे तेजी से क्षरण होने वाली मुद्राओं में शामिल किया जाता है. 66 साल पहले आजादी के वक्त देश पर कोई विदेशी कर्ज नहीं था. आजादी के बाद भारत के वर्ल्ड बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य बनने के बाद यह सिलसिला टूटना शुरू हो गया. इन दोनों संस्थाओं में सदस्य देश सहयोग राशि जमा करते रहे और फिर जरूरत पड़ने पर कर्ज भी लेते रहे. भारत भी इस दौड़ में शामिल हो चुका था. 1947 से 1952 तक दोनों संस्थाओं में इसने अरबों डॉलर सहयोग राशि जमा की. 1952 में ही पंचवर्षीय योजना के कार्यान्वयन के लिए भारत को कर्जे की जरूरत पड़ी. अरबों रूपये अंशदान के रूप में डकार चुके इन दोनों संस्थाओं ने भारत को कर्ज देने के एवज में रूपए के अवमूल्यन करने की शर्त रखी. भारत ने अपने रूपए की कीमत, जो उस समय अमेरिका के डॉलर के बराबर हुआ करता था, उसे गिरा दिया. फिर लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं के समय भारत ने कर्ज लिया और शर्त स्वरूप रूपए की कीमत कम होती रही.

कर्ज ही है असली मर्ज
वर्ष 1991 में जब महज़ 83.08 अरब डॉलर विदेशी कर्ज के कारण सोना गिरवी रखने की नौबत आ गयी थी तो आज 390 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज के बोझ तले अर्थ-व्यवस्था की स्थिति कैसी होगी, इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है. वर्ष 2004 में 112.06 अरब डॉलर के कर्ज की तुलना में मार्च 2013 तक विदेशी कर्ज में तीन गुना से भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी हो चुकी है. देश के कुल विदेशी कर्ज का 60 प्रतिशत हिस्सा डॉलर में लिया गया है, जिसे डॉलर में ही वापस करना है. एक डॉलर कर्ज की कीमत अगर कल तक 40 रूपए थी तो आज उसी के लिए हमें 70 रूपए चुकाने होंगे.

 

एक तरह से सरकार ने मेरे गिरने और उठने की कमान अमेरिका जैसे ताकतवर देशों के हाथों में सौंप दी. मेरी कीमत 1948 से 1966 के बीच 4.79 रूपए प्रति डॉलर हो गई. चीन के साथ 1962 में और पाकिस्तान के साथ 1965 में हुए युद्धों के भार से भारत का बजट घाटा बढ़ने से आर्थिक संकट गहराने लगा. इससे बाध्य होकर सरकार ने 1966 में पहली बार मेरा अवमूल्यन किया और डॉलर की कीमत 7.57 रूपए तय की गई. मेरा सम्बन्ध 1971 में ब्रिटिश मुद्रा से खत्म कर दिया गया और उसे सीधे तौर पर अमेरिकी मुद्रा से जोड़ दिया गया. भारतीय रूपए की कीमत 1975 में तीन मुद्राओं-अमेरिकी डॉलर, जापानी येन और जर्मन मार्क के साथ संयुक्त कर दी गई. उस समय एक डॉलर की कीमत 8.39 रूपए थी.

रूपया गिरने का प्रमुख कारण
लोकसभा में खाद्य सुरक्षा बिल पास होने के बाद रूपया गिरने के प्रमुख कारण हैं-
1. बढ़ते चालू खाते के घाटे के कारण आपूर्ति की जगह डॉलर की मांग में बढ़ोत्तरी हुई है तथा निर्यात और आयात के बीच बढ़ते अन्तर के कारण यह घाटा बढ़ा है.
2. कभी भारतीय रिजर्व बैंक तरलता पर अंकुश लगाने की बात करता है तो कभी बाजार में डॉलर झोंकने की बात करता है. सरकार भी अनिर्णय की स्थिति में है. जिसका नकारात्मक असर रूपए पर पड़ा है. और आगामी चुनाव के चलते राजनीतिक अस्थिरता ने भय के माहौल को जन्म दिया है.
3. हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा भण्डार में गिरावट आयी है. इसलिए रूपए को संभालने के लिए आर.बी.आई. ज्यादा डॉलर को बेचने के लिए हस्तक्षेप नहीं कर रहा है.
4. देश का सकल घरेलू उत्पाद 2012-13 में पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा गिरकर 5 प्रतिशत तक पहुंच गया है. नतीजतन कमजोर आर्थिक वृद्धि के चले विदेशी निवेशकों का भारत के प्रति भरोसा टूटा है.
5. पिछले कई वर्षों से चालू खाते के बजट का वित्त विदेशी मुद्रा में हो रहा है. ऐसे में विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजारों से पैसा लगाने के कारण रूपया कमजोर हो रहा है.
6. अमेरिकी बाजारों के धीरे-धीरे संभलने से बाकी देशोें में पैसा लगाने वाले निवेशक वहां से पैसा निकालकर वापस अमेरिकी बाजार में निवेश कर रहे हैं, जिससे रूपया कमजोर हुआ है.
7. रिजर्व बैंक और सरकार के पूंजी के प्रवाह पर अस्थायी प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा का दाव बाजार में उलटा पड़ गया. इससे न केवल विदेश से निवेश करने वाली भारतीय कंपनियां हतोत्साहित हुईं. बल्कि यहां से पैसा ले जाने वाली विदेशी फर्मों पर भी बुरा असर पड़ा है.
8. मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी के कारोबार ने रूपए पर अतिरिक्त दबाव डाला है.
9. ब्राजील, इण्डोनेशिया, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसी उभरती अर्थ-व्यवस्थाओं के मुद्रा की हालत भी रूपए की तरह पतली है. केवल चीन बेहतर स्थिति में है.
10. अमेरिका वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज को हटा सकता है. इससे वित्तीय बाजारों में तरलता पर अंकुश लगेगा. लिहाजा भारत समेत विकासशील देशों में आने वाले फंड पर ब्रेक लग सकता है.

1985 में फिर मेरी कीमत गिरकर 12 रूपए प्रति डॉलर हो गई. सिलसिला यहीं पर खत्म नहीं हुआ. भारत के सामने 1991 में भुगतान संतुलन का एक गंभीर संकट पैदा हो गया और वह अपनी मुद्रा में तीव्र गिरावट के लिए बाध्य है. देश उस समय महंगाई, कम वृद्धि-दर और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहा था. विदेशी मुद्रा तीन हफ्तों के आयात के लिए भी पर्याप्त नहीं थी. इन परिस्थितयों से उबरने के लिए सरकार ने एक बार फिर मेरा अवमूल्यन कर दिया था. अब मेरी कीमत 17.90 रूपए प्रति डॉलर तय की गई.
यह वही दौर था जब वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण जैसे जुमले दुनिया भर में अपना पैर पसार रहे थे. वास्तव में ये शब्द वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी वैश्विक संस्थाओं के गढ़े हुए हैं. भारत भी इन जुमलों से अछूता न रह सका. सन् 1991 में उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की आवाज भारत की फिज़ाओं में गूंजने लगी. तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह इसके अगुआ बने. वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के जाल में भारत उलझने लगा. बाद में आयात शुल्क खत्म कर दिया गया और हमारे स्टॉक एक्सचेंज के दरवाजे भी विदेशी निवेश के लिए खोल दिये गये. विदेशी निवेश की यहां बाढ़ सी आने लगी और हमारा स्टॉक मार्केट, घरेलू बाजार की तरह धीरे-धीरे विदेशियों के कब्जे में जाने लगा. चारों तरफ विदेशी शराब, विदेशी बैंक, विदेशी ठंडा और विदेशी मॉल नजर आने लगे. विडंबना यह है कि इसी को हम विकास मान रहे थे. जबकि भीतर से लगातार बिगड़ती मेरी हालत के बारे में किसी को ख्याल नहीं आया.
वर्ष 1993 स्वतंत्र भारत की मुद्रा के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है. इस वर्ष मुझको बाजार के हिसाब से परिवर्तनीय घोषित कर दिया गया. मेरी कीमत अब मुद्रा बाजार के हिसाब से तय होने लगी. इसके बावजूद यह प्रावधान था कि मेरी कीमत अत्यधिक अस्थिर होने पर भारतीय रिजर्व बैंक दखल देगा. 1993 में डॉलर की कीमत 31.37 रूपए थी. 2001 से 2010 के दौरान डॉलर की कीमत 40 से 50 रूपए के बीच बनी रही. मेरा मूल्य सबसे ऊपर 2007 में रहा, जब डॉलर की कीमत 39 रूपए थी. 2008 की वैश्विक मंदी के समय से भारतीय रूपए की कीमत में गिरावट का दौर शुरू हुआ. पिछले कुछ समय से बढ़ती महंगाई, व्यापार और निवेश से जुड़े आंकड़ों के प्रभाव से मेरी स्थिति अत्यधिक कमजोर हो गई है. प्रधानमंत्री फिर शॉर्टकट ढूंढ रहे हैं, वित्तमंत्री हाथ-पांव मार रहे हैं. लेकिन मेरे मर्ज की दवा कहीं नजर नहीं आ रही. (साभार)