कल्याण की तरह आडवानी को मार रहे राजनाथ

5 years ago संजय तिवारी 0

forex bank öppettider uppsala सबकुछ बहुत जल्दी में हुआ। इतनी जल्दी में जिनके जरिये सब हुआ उन्हें भी अंदाज नहीं लगा। संघ के साथ भाजपा नेताओं की दो दिन की दिल्ली में बैठक। बैठक के बाद मीडिया में इन खबरों का ज्वार कि नरेन्द्र मोदी का नाम पीएम इन वेटिंग के रूप में जल्द से जल्द स्वीकार कर लिया जाएगा। अभी यह सब खबरनवीसी चल ही रही थी कि मीडिया ने तारीख का भी ऐलान कर दिया। जिस तारीख का ऐलान हुआ उस तारीख को भी सबकुछ बहुत जल्दी जल्दी में निपटाया गया। नरेन्द्र मोदी खुद बहुत जल्दी में भाजपा कार्यालय आये उतनी ही जल्दी में वहां से चले गये। जिस संसदीय समिति की बैठक का बहाना बनाया गया उसकी कोई मैराथन बैठक हुई हो ऐसा भी नहीं है। खुद राजनाथ सिंह साढ़े पांच बजे भाजपा दफ्तर पहुंचे और साढ़े छह बजे मोदी के नाम की विधिवत घोषणा मीडिया के सामने कर दी गई। आखिर राजनाथ सिंह ने मोदी के लिए यह जल्दबाजी क्यों दिखाई?

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binäre optionen fundamentalanalyse जवाब कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है। एक लाइन का जवाब है- राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से जैसे कल्याण सिंह को मारा वैसे ही केन्द्र में वे आडवाणी को मार रहे हैं। वे ऐसा क्यों करेंगे? क्योंकि आडवाणी के अवसान का फायदा मोदी से ज्यादा राजनाथ सिंह को मिलेगा। आइये थोड़ा राजनाथ सिंह की राजनीति को समझते हैं।

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http://curemito.org/estorke/1630 इसी साल के आखिर तक चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए सत्ता के प्रबल आसार हैं। अगर इन तीन राज्यों में भाजपा सत्ता में आती है या फिर बनी रहती तो केन्द्र में मोदी की बजाय आडवाणी एक कद्दावर नेता के रूप में ज्यादा मजबूत हो जाते। वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और यहां तक कि रमण सिंह खुद मोदी की बजाय आडवाणी के नेतृत्व में काम करना ज्यादा पसंद करते। यह बात राजनाथ सिंह भी जानते हैं, मोदी भी और संघ के वे आला अधिकारी भी जो भाजपा की राजनीति को संचालित करते हैं। इसलिए जो करना था तत्काल करना था और मोदी ने पार्टी के भीतर भी साफ कर दिया था कि अभी नहीं तो फिर तो कभी नहीं।

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trading on line calcolo delta e kilovar इसलिए कुछ ही महीने पहले तक राजनाथ सिंह मोदी की बजाय आडवाणी को सर्वोपरि बता रहे थे लेकिन नागपुर की कुछ यात्राओं और दिल्ली की बैठकों में राजनाथ सिंह को साफ संकेत मिल गया कि हिन्दुत्व के ही एजेण्डे पर आगे बढ़ना है तो उन्होंने तत्काल पाला बदलकर मोदी की माला जपनी शुरू कर दी। क्योंकि संघ आनेवाले लोकसभा चुनाव में जिस प्रखर हिन्दुत्व को सामने रखना चाहता है, आडवाणी उससे आगे जा चुके हैं और अपनी इसी सेकुलर खामी की वजह से आडवाणी संघ के भीतर नापसंद भी किये जाने लगे हैं। ऐसे में राजनाथ सिंह के लिए संघ और आडवाणी में से किसी एक को चुनना था और उन्होंने चुना ‘संघम शरणम गच्छामि’ कर दिया। और संघ की शरण में जाने का मतलब है कि मोदी का नाम पीएम पद के लिए प्रस्तावित करना।

http://agencijapragma.com/?kiopoa=migliori-broker-italiani-opzioni-digitali&076=85 गोवा की बैठक के दौरान ही राजनाथ सिंह सार्वजनिक रूप से आडवाणी को बहुत आदर से संबोधित कर रहे थे लेकिन हकीकत यह थी कि वे भीतर ही भीतर आडवाणी को अपमानित भी कर रहे थे और मध्यस्थ भी बने हुए थे। राजनाथ सिंह के रुख से आडवाणी आहत तो थे लेकिन सार्वजनिक रूप से बहुत कुछ बोल नहीं सकते थे। सार्वजनिक रूप से यही संदेश जा रहा था कि आडवाणी मोदी का विरोध कर रहे हैं लेकिन तब भी और अब भी हकीकत यह है कि आडवाणी राजनाथ सिंह की राजनीति का विरोध कर रहे हैं। और राजनाथ सिंह की राजनीति क्या है?

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