चारा से ‘बे’चारा

5 years ago एम सांकृत्यायन 0

sonar conocer chico भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा लालू प्रसाद यादव ऐसे व्यक्ति है जिनकी हर बात काफी दिलचस्प और गुदगुदाने वाली होती है. जो अक्सर मीडिया को सुर्खियां देती है. दोस्त हो या दुश्मन सभी के दिलों में कौतुहल उत्पन्न करने वाला वह शख्स आज खुद सुर्खियों में है. अपनी करनी का फल भोग रहा है. कहतें हैं जिसको राबड़ी उपलब्ध हो वह चारा खा ही नहीं सकता है किन्तु लालू के इस भूल ने उन्हें ‘चारा से बेचारा’ बना दिया है…

12 year olds dating yahoo भोला-भाला गंवार जैसा दिखने वाला एक व्यक्ति जिसका गोल-गोल     चेहरा, कटोराकट सफेद बाल, चेहरे पर मासूमियत और भोलापन, ऑखों में कुछ शरारत, मन में कुछ कर गुजरने की चाहत, विरोधियों को धूल चटाने का जज्बा और जुबान, हर समय नया शगूफा छोड़ने वाला, एक-एक शब्द सोचकर बोलने वाला, अपने व्यक्तित्व का पूरा फायदा उठाने वाला, खुद को गरीबों का रहनुमा बताने वाला, बिहार को बर्बाद करने वाला, अपनी खासियत से दुनियां में मशहूर, पड़ोसी पाकिस्तानी भी राजनीति में जिसकी बात करना और सुनना पसन्द करते हैं, जिसे भारतीय राजनीति का इतिहास नजरन्दाज नहीं कर सकता हो ऐसे शख्स का नाम लालू प्रसाद यादव है.

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sg forex trading जुलाई, 1997 में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के नाम से नयी पार्टी बना ली। गिरफ्तारी तय हो जाने के बाद लालू ने मुख्यमन्त्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमन्त्री बनाने का फैसला किया। जब राबड़ी के विश्वास मत हासिल करने में समस्या आयी तो कांग्रेस और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने उनको समर्थन दे दिया। 1998 में केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी। दो साल बाद विधानसभा का चुनाव हुआ तो राजद अल्पमत में आ गया। सात दिनों के लिये नीतीश कुमार की सरकार बनी परन्तु वह चल नहीं पायी। एक बार राबड़ी देवी फिर मुख्यमन्त्री बनीं। कांग्रेस के 22 विधायक उनकी सरकार में मन्त्री बने। 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद एक बार फिर किंग मेकर की भूमिका में आये और रेलमन्त्री बने। लेकिन अगले ही साल 2005 में बिहार से राजद सरकार की विदाई हो गयी और 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी (राजद) के केवल चार सांसद ही जीत सके। इसका अंजाम यह हुआ कि लालू को केन्द्र सरकार में जगह नहीं मिली। समय-समय पर लालू को बचाने वाली कांग्रेस भी इस बार उन्हें नहीं बचा नहीं पायी। दागी जन प्रतिनिधियों को बचाने वाला अध्यादेश खटाई में पड़ गया और इस तरह लालू का राजनीतिक भविष्य अधर में लटक गया। लगभग सत्रह साल तक चले इस ऐतिहासिक मुकदमें में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट के न्यायाधीश प्रवास कुमार सिंह ने लालू प्रसाद यादव को वीडियो कान्फ्रेन्सिंग के जरिये 3 अक्तूबर 2013 को पाँच साल की कैद व पच्चीस लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनायी।

demo trading बिहार प्रान्त के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गॉंव में एक सामान्य यादव परिवार में 11 जून 1948 को जन्म लिया बालक ‘लालू’ इतना चालू होगा. यह अकल्पनीय था. लालू प्रसाद यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत एक छात्र नेता के रूप में जयप्रकाश नारायण (जे.पी.) के आन्दोलन से किया था. उस समय वह तत्कालीन राजनेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के काफी करीबी थे. वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद लोकसभा का चुनाव हुआ.

29 वर्ष की आयु में जनता की पार्टी के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर लालू लोकसभा पहुंचे. उस समय वह सबसे युवा सांसदों में से एक थे. इसके बाद वर्ष 1980 से 1989 तक वे दो बार विधानसभा के सदस्य और विपक्ष के नेता रहे. लालू प्रसाद यादव ने सत्ता के गलियारों तक पहुंचने में लम्बा सफर तय किया. बिहार मुस्लिम मतदाता पांरपरिक तौर पर कांग्रेस के साथ रहता था. किन्तु 1989 में भागलपुर हुये दंगों ने मुस्लिम मतदाताओं को बड़ी संख्या में लालू प्रसाद यादव से जोड़ दिया. जिसके परिणाम स्वरूप वह बिहार की राजनीति में एक अहम ताकत बनकर उभरे. इस दौरान माई (एम.वाई.अर्थात मुस्लिम-यादव) फैक्टर ने उन्हंे काफी लोकप्रियता प्रदान किया.

इस प्रकार लालू प्रसाद यादव ने 10 मार्च 1990 को पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लिया. वह 1990 से 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. वर्ष 1995 में भारी बहुमत से जीतकर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने किन्तु उनकी मुश्किलें 1996 में उस वक्त बढ़ गयी जब बिहार पुलिस ने एक बड़ा घोटाला उजागर किया. जिसमें राज्य के बड़े-बड़े सफेदपोश नेताओं एवं अधिकारियों पर आरोप लगा. मीडिया ने इस घोटाले को ‘चारा घोटाला’ का नाम दिया और जिसमें जानवारों का चारा खरीदनें के लिए करोड़ों रूपये की हेराफेरी का तथ्य प्रकाश में आया था.

विपक्षी दलों के दबाव एवं सीबीआई द्वारा लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किये जाने के कारण 24 जुलाई 1997 को उन्होनें मुख्यमंत्री पद से त्याग पत्र दे दिया और दूसरे ही दिन 25 जुलाई 1997 को अपनी पत्नी रावड़ी देवी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दिया जो बिहार प्रान्त की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनी इस दौरान 1997 में जनता दल का विभाजन हो गया और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी अर्थात राजद) तथा जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू अर्थात जदयू) नामक दो दल बन गये. लालू प्रसाद राजद के अध्यक्ष व सुप्रीमो बने तथा अप्रत्यक्ष रूप से बिहार के सत्ता की कमान अपने हाथ में रखे रहे. इस बीच चारा घोटाला मामलें में कई महीनों तक जेल में भी रहे किन्तु वर्ष 2005 तक बिहार की सत्ता राजद के हाथ में ही रही. वर्ष 2005 के चुनाव में हारने के बाद राजद सत्ता से बाहर हो गयी. इस दौरान लालू प्रसाद यादव ने वर्ष 2004 से 2009 तक केन्द्र में कांग्रेस के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग अर्थात यूपीए) की सरकार ने बतौर रेल मंत्री खूब शोहरत बटोरी. घाटे वाली रेल को मुनाफा की पटरी पर दौड़ाया. इतना ही नहीं आईआईएम से लेकर हावर्ड तक के छात्रों को प्रबन्धन का पाठ पढाया. वर्ष 2009 के चुनावों में भी लालू प्रसाद यादव की पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. वर्तमान लोकसभा में वह खुद सारण (बिहार) से सांसद है और इस समय उनकी पार्टी के चार सांसद लोकसभा में तथा दो सांसद में राज्यसभा में राजद की रहनुमाई कर रहें हैं. एक बार फिर ‘मनुष्य बली नहीं होत है समय होत बलवान’ की कहावत पुनः चरितार्थ होने लगी और सीबीआई की अदालत में चल रहा मुकददमा अपने अन्तिम निर्णयाक दौर में पहुंच गया. 30 सितम्बर 2013 को लालू प्रसाद यादव और उनके साथियों को सीबीआई की विशेष अदालत ने दोषी करार देते हुए रांची के विरसा मुण्डा केन्द्रीय कारागार में पहुंचा दिया अब चारा से बेचारा बने लालू प्रसाद यादव 37.7 करोड़ रूपये के चारा घोटाले ने पॉंच साल की सजा और 25 लाख जुर्माना वाले सजायाफ्ता कैदियों की श्रेणी मंे विराजमान हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा लालू प्रसाद यादव ऐसे व्यक्ति है. जिनकी हर बात काफी दिलचस्प और गुदगुदाने वाली होती है. जो अक्सर मीडिया को सुर्खियां देती है. दोस्त हो या दुश्मन सभी के दिलों में कौतुहल उत्पन्न करने वाला वह शख्स आज खुद सुर्खियां बन गया है. अपनी करनी का फल भोग रहा है. कहतें हैं जिसको राबड़ी उपलब्ध हो वह चारा खा ही नहीं सकता है किन्तु लालू के इस भूल ने उन्हें ‘चारा से बेचारा’ बना दिया है.

http://irinakirilenko.com/?deribaska=best-binary-options-60-second-strategy&6a7=4d सरकारी रोक के बावजूद  नियमों को ताख पर रखकर घोटालेबाजों की बढ़ाई सेवा अवधि 1991 से ही रिट

1991 से ही रिटायरमेंट के बाद राज्यकर्मियों को सेवा विस्तार पर मनाही थी। इस नियम को बदलने की इजाजत भी नहीं थी। इसके बावजूद लालू प्रसाद ने घोटाले के इन किंगमेकरों को सेवा विस्तार दिया था।

  1. डा. श्याम बिहारी सिन्हा- रांची के क्षेत्रीय पशुपालन निदेशक डा. श्याम बिहारी सिन्हा 31 दिसंबर 1993 को रिटायर हो रहे थे। चार दिसंबर को उन्होंने अपनी प्रशंसा करते हुए अच्छे स्वास्थ्य के आधार पर दो साल का सेवा विस्तार का आवेदन दिया। इसके बाद विपक्ष के नेता डा. जगन्नाथ मिश्र ने मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को पत्र लिख कर डा. श्याम बिहारी सिन्हा को दो साल का सेवा विस्तार देने की सिफारिश की थी। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि डा. सिन्हा सुयोग्य एवं कर्मठ हैं, इनकी सेवा सराहनीय रही है। योजनाओं की प्रगति एवं गुणवत्ता में रुकावट नहीं आए, इसलिए इन्हें दो साल के लिए सेवा विस्तार देना जनता के हित में होगा। इसके बाद लालू प्रसाद ने उन्हें एक साल के लिए सेवा विस्तार दे दिया।
  2. आर.के. दास- घोटाले के दूसरे किरदार पशुपालन विभाग के प्रशासी पदाधिकारी आर.के. दास 28 फरवरी 1994 को रिटायर होने वाले थे। उन्होंने 23 फरवरी को अपने सेवा विस्तार के लिए यह कहकर आवेदन दिया कि निबंधक रैंक में उनकी प्रोन्नति होने वाली है। अगले ही दिन लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष जगदीश शर्मा ने मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को पत्र लिख कर आर.के.दास को भी दो साल का सेवा विस्तार देने की सिफारिश की थी। लिखा था कि ये स्वस्थ एवं स्वच्छ छवि के पदाधिकारी हैं। इनकी सेवानिवृत्ति के बाद विभाग में इनके कैडर का कोई जानकार पदाधिकारी नहीं रह जाएगा। लालू प्रसाद ने इन्हें भी एक साल का सेवा विस्तार दे दिया।
  3. डा. गिरजानंदन शर्मा- जिला पशुपालन पदाधिकारी डा. गिरजानंदन शर्मा 30 नवबंर 1993 को रिटायर हो रहे थे। उनके विरुद्ध पुलिस केस भी चल रहा था। सीएम लालू प्रसाद ने उसी पद पर छह माह के लिए डा. शर्मा को फिर से नियुक्त करने का आदेश दे डाला।
  4. डा. इंदुभान प्रसाद- फ्रोजेन सीमेन बैंक के परियोजना पदाधिकारी डा. इंदुभान प्रसाद का 31 अक्टूबर 1993 को रिटायरमेंट था। उन्हें भी छह माह के लिए एक्सटेंशन दिया गया।

चारा घोटाले की टाइम लाइन

1990 के दशक में हुए चारा घोटाला मामले में राजद प्रमुख लालू यादव और जगन्नाथ मिश्रा को दोषी करार देने के बाद उनके राजनीतिक कैरियर पर सवालिया निशान लग गया है। लालू पर पशुओं के चारे के नाम पर चाईबासा ट्रेजरी से 37.70 करोड़ रुपए निकालने का आरोप था। पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है-

  • 27 जनवरी 1996- पशुओं के चारा घोटाले के रूप में सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये की लूट सामने आयी। चाईबासा ट्रेजरी से इसके लिये गलत तरीके से 37.70 करोड़ रुपए निकाले गये थे।
  • 11 मार्च, 1996- पटना उच्च न्यायालय ने चारा घोटाले की जाँच के लिये सीबीआई को निर्देश दिये।
  • 19 मार्च, 1996- उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश की पुष्टि करते हुए हाईकोर्ट की बैंच को निगरानी करने को कहा।
  • 27 जुलाई, 1997- सीबीआई ने मामले में राजद सुप्रीमो पर फंदा कसा।
  • 30 जुलाई 1997- लालू प्रसाद ने सीबीआई अदालत के समक्ष समर्पण किया।
  • 19 अगस्त 1998- लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की आय से अधिक की सम्पत्ति का मामला दर्ज कराया गया।
  • 4 अप्रैल 2000- लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप पत्र दर्ज हुआ और राबड़ी देवी को सह-आरोपी बनाया गया।
  • 5 अप्रैल 2000- लालू प्रसाद और राबड़ी देवी का समर्पण, राबड़ी देवी को मिली जमानत।
  • 9 जून, 2000- अदालत में लालू प्रसाद के खिलाफ आरोप तय किये।
  • अक्टूबर 2001- सुप्रीम कोर्ट ने झारखण्ड के अलग राज्य बनने के बाद मामले को नये राज्य में ट्रांसफर कर दिया। इसके बाद लालू ने झारखण्ड में आत्मसमर्पण किया।
  • 18 दिसम्बर 2006- लालू प्रसाद और राबड़ी देवी को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में क्लीन चिट दी।
  • 2000 से 2012 – मामले में करीब 350 लोगों की गवाही हुई। इस दौरान मामले के कई गवाहों की भी मौत हो गयी।
  • 17 मई 2012- सीबीआई की विशेष अदालत में लालू यादव पर इस मामले में कुछ नये आरोप तय किये। इसमें दिसम्बर 1995 और जनवरी
  • 1996- के बीच दुमका कोषागार से 3.13 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी पूर्ण निकासी भी शामिल है।
  • 17 सितम्बर 2013- चारा घोटाला मामले में रांची की विशेष अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा।
  • 30 सितंबर2013- सीबीआई कोर्ट ने 17 साल पुराने 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले में लालू यादव, जगन्नाथ मिश्र समेत कुल 45 आरोपियों को दोषी करार दिया। इनमें आठ को उसी दिन 3-3 साल की सजा सुना दी गई।

लालू के पांच खतरनाक फैसले

watch 1.     आडवाणी की गिरफ्तारी

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी रथ यात्रा लेकर निकल पड़े थे। सरकारी नौकरियों में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के फैसले ने वीपी सिंह की गठबंधन सरकार को संकट में डाल दिया था। भाजपा ने मंडल कमीशन का राजनीतिक-सामाजिक असर कम करने के लिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का अभियान शुरू कर दिया। आडवाणी रथ यात्रा लेकर निकल पड़े। बिहार में पहले उन्हें शेरशाह की भूमि सासाराम में गिरफ्तार करने की रणनीति बनायी गई थी। लेकिन प्रशासनिक वजहों से सासाराम में उनकी गिरफ्तारी नहीं की गई। उनकी यात्रा समस्तीपुर पहुंची। वहां रात में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 अक्टूबर, 1990 की रात करीब डेढ़ बजे आडवाणी की गिरफ्तारी का श्रेय लेने को लेकर अब भी होड़ मची हुई थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना था कि आडवाणी की गिरफ्तारी के लिए किसी एक आदमी को श्रेय देना ठीक नहीं है। हमलोगों ने मिलकर उन्हें गिरफ्तार करने का फैसला लिया था। बहरहाल, आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद केंद्र से वीपी सिंह की सरकार चली गयी, जबकि बिहार में लालू प्रसाद की सरकार को समर्थन दे रही भाजपा ने विपक्ष में बैठने का फैसला किया था। उस घटना के बाद लालू प्रसाद की चर्चा देश-दुनिया में हुई और उन्हें अल्पसंख्यक बिरादरी में भारी जन समर्थन हासिल हो गया।

http://hickscountry.com/media/hicks-live-5-5/ 2.    जनता दल से निकलकर बनाया राजद

पशुपालन घोटाले में शिकंजा कसने के साथ ही लालू प्रसाद पर इस्तीफ देने का दबाव बढ़ता गया। एसआर बोम्मई उस वक्त पार्टी के अध्यक्ष थे। 1996 में पशुपालन घोटाला उजागर हो गया था। पटना हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच कराने का आदेश दे दिया था। उसी साल लालू प्रसाद दिल्ली गये और जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता बल बना लिया। अब सरकार और पार्टी पर उनका एकछत्र राज हो गया। दिल्ली की खिचखिच भी दूर हो गयी। नीतीश कुमार के साथ आज के अनेक नेता तब लालू प्रसाद के साथ थे और नयी पार्टी बनाने के उनके फैसले को सही समय पर लिया गया सही फैसला होने का दावा कर रहे थे।

follow url 3.    झारखंड का कर दिया था समर्थन

लालू प्रसाद कहा करते थे कि झारखंड उनकी लाश पर बनेगा। झारखंड बनाये जाने का वह लगतार विरोध कर रहे थे और यही वजह थी कि झामुमो की उनसे दूरी बढ़ गयी गयी थी। एक दौर वह भी था, जब लालू प्रसाद के सर्वाधिक भरोसेमंद दोस्तों में झामुमो की गिनती होती थी। लेकिन समय तो अपने हिसाब से चलता है। केंद्र में एनडीए की सरकार ने झारखंड, उतराखंड और छत्तीसगढ़ बनाने का फैसला कर लिया था। बिहार विधानसभा से अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव राबड़ी देवी की सरकार ने वर्ष 2000 में सर्वसम्मति के साथ केंद्र को भेज दिया। इस प्रकार 15 नवंबर, 2000 को बिहार से अलग होकर 18 जिलों वाला झारखंड अलग राज्य बन गया।

http://creatingsparks.com.gridhosted.co.uk/?endonezit=free-stock-charts-for-binary-options'a 4.    राबड़ी को मुख्यमंत्री बनाना

पशुपालन घोटाले में जेल जाने की नौबत को देखते हुए 24 जुलाई, 1997 को लालू प्रसाद ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उसी दिन राजद विधायक दल की बैठक मुख्यमंत्री के सरकारी आवास 1 अणे मार्ग में हुई। देर शाम लालू प्रसाद ने प्रेस कान्फ्रेंस की और बताया कि पार्टी के विधायकों ने राबड़ी देवी को विधायक दल का नेता चुना है। 25 जुलाई को वह बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। उन्हें सरकार की कमान देने का फैसला लालू प्रसाद सहमति के बगैर संभव नहीं था। इस प्रकार राबड़ी देवी किचन से निकलकर सीधे सीएम की कुर्सी तक पहुंच गयी थीं।

see url 5.     बेटे को कमान देने की तैयारी

राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने वाले लालू प्रसाद ने अब अपने बेटे तेजस्वी को पार्टी की कमान सौंपने की एक तरह से तैयारी कर ली है। इसके लिए उन्हें तैयार करने का सिलसिला 2010 के विधानसभा चुनाव से शुरू किया गया था। उन्होंने तब कई जनसभाएं कर नीतीश सरकार को सत्ता से हटाने की अपील की थी। दरअसल, साधु-सुभाष से इतर तेजस्वी राजद के युवा और शालीन चेहरे हैं। साधु-सुभाष ने लालू-राबड़ी के राजपाट के दौरान खूब ख्याति अर्जित की थी। उसका खामियाजा आखिरकार लालू प्रसाद को ही उठाना पड़ा था।