जिजीविषा के समक्ष फेलिन परास्त

5 years ago अरविन्द जयतिलक 0

http://www.jsaspecialists.com/?niomas=Luxembourg-stock-exchange-main-market&434=b9 बंगाल की खाड़ी से उठने वाला चक्रवाती तुफान यानी फेलिन ओडिसा और आंध्रप्रदेश के एक बड़े हिस्से को तबाह कर सकता था। लेकिन शुक्र है कि उस तरह का प्रलंयकारी साबित नहीं हुआ जिस तरह की भविष्यवाणियां की जा रही थी। अमेरिकी मौसम-विज्ञानियों ने चेतावनी दे रखी थी कि फिलिन का असर कैटरीना से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। फेलिन की तुलना श्रेणी 5 के हरीकेन से की गयी थी जो 280 किमी प्रति घंटे की रतार में सब कुछ तबाह कर देता है। आशंका यह भी थी कि ओडिसा और आंध्र के तटीय इलाकों से टकराने के बाद समुद्र से तीन मीटर तक लहरें उठेंगी और चौतरफा तबाही का मंजर पसर जाएगा। लेकिन तटीय इलाकों से टकराने के बाद फिलिन की तीव्रता कमजोर पड़ गयी है और हालात सुधरने लगे हैं। हालांकि ओड़िसा और आंध्रप्रदेश के तटीय जिलों में तुफान के वेग से हजारों पेड़ और बिजली के खंभे उखड़ गए हैं लेकिन बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की खबर नहीं है। अभी तक केवल सात लोगों के मारे जाने की ही खबर है।

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follow फिलहाल ओडिसा की राजधानी भुवनेश्वर समेत गजपति, खुर्दा, जगतसिंहपुर, नयागढ़, कटक और भद्रक जिले समेत झारखण्ड और बिहार के कुछ क्षेत्रों में भारी वर्षा हो रही है। लेकिन सेना और राज्य प्रशासन द्वारा पूरी मुस्तैदी से बचाव कार्य किया जा रहा है। मौसम विज्ञानियों ने आशंका व्यक्त की थी कि फिलिन का सर्वाधिक खौफनाक असर ओडिसा के 14 और आंध्रप्रदेश के 7 जिलों में देखने को मिलेगा। लेकिन यहां किसी भारी तबाही की सूचना नहीं है। लोग पूरी तरह महफूज हैं। उड़ीसा के गंजाम और आंध्र के श्रीकाकुडम जिले में जरुर फिलिन का सर्वाधिक प्रभाव देखने को मिला है लेकिन जानमाल की व्यापक क्षति नहीं हुई है। अगर कहा जाए कि फेलिन को परास्त करने में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी, केंद्र और राज्य सरकारें पूरी तरह सफल रही तो गलत नहीं होगा। वैसे आपदाओं से निपटने में हमारा रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। समुचित तैयारी के अभाव में अनगिनत बार प्राकृतिक आपदा का कोप झेलना पड़ा हैं। चौदह साल पहले 1999 में इसी उड़ीसा में सुपर साइक्लोन आया था जिसमें 15000 से अधिक लोग मारे गए। गांव के गांव उजड़ गए। तूफान गुजर जाने के बाद हजारों लोग भूख और बीमारियों से दम तोड़ दिए। उस समय सुपर साइक्लोन का केंद्र जगतसिंहपुर के बंदरगाह शहर पारादीप में था। तब भी सूचना प्रणाली द्वारा तूफान की जानकारी दी गयी थी लेकिन समय और स्थान की सटीक भविष्यवाणी नहीं की गयी थी। नतीजतन व्यापक स्तर पर जानमाल का नुकसान हुआ। अभी पिछले साल जनवरी में तमिलनाडु में थाणे चक्रवात की वजह से 42 लोग मारे गए थे। सटीक भविष्यवाणी के अभाव में 24 दिसंबर 2004 को हिंद महासागर में विनाशकारी भूकंप के कारण दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के तटवर्ती इलाकों में उठे समुद्री तुफान सुनामी में डेढ़ लाख से अधिक लोग मारे गए।
इस महाविनाशकारी भूकंप के झटकों से बेकाबू हुए समुद्र ने भारत में भयंकर लीला मचायी। अंडमान व निकोबार और मुख्य भूमि का संपूर्ण पूर्वी तट एकाएक बरपे इस कहर के मुख्य आखेट स्थल बन गए। यहां रहने वाले हजारों लोगों को सुनामी ने लील लिया। भारतीय वायुसेना का द्वीपीय अड्डा भी तबाह हो गया। मुख्य भूमि पर सुनामी का तांडव तमिलनाडु के तट पर सर्वाधिक भयावह रहा जहां कम से कम तीन हजार से अधिक लोग मारे गए। समुद्री मछुवारें का शहर नागपट्टिनम पूरी तरह तबाह हो गया। पांडिचेरी आंध्रप्रदेश और केरल में भी सैकड़ों लोग मारे गए। इंडोनेशिया और श्रीलंका भारत से अधिक दुर्भाग्यशाली रहे। इंडोनेशिया में 94 हजार लोग और श्रीलंका में 30 हजार लोग परलोक सिधार गए। लेकिन सौभाग्य से इस बार प्रलंयकारी तुफान की आहट पहले मिल गयी और जान-माल का भारी नुकसान होने से बच गया।

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site rencontre amis bordeaux राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन ने समय रहते बचाव की तैयारी कर तत्काल तटीय इलाकों से आठ लाख लोगों को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। रेलवे ने भी फौरी कदम उठा इन इलाकों से गुजरने वाली अधिकांश टेªनों को रद्द कर दिया। सेना, वायुसेना और नौसेना के सैनिक भी हर चुनौतियों से निपटने को तैयार रहे। प्रभावित लोगों को तत्काल इलाज सुविधा मिल सके इसके लिए ओडिसा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी डॉक्टरों की छुट्टियां निरस्त की। ओडिसा सरकार ने ‘कोई क्षति न होने’ का निर्णय लिया। इस बार केंद्र सरकार की भूमिका सराहनीय रही। उसने प्रभावित इलाकों के लोगों को कैंप और रहने व खाने-पीने का पूरा इंतजाम कर रखा है। कहना गलत नहीं होगा कि इन समुचित उपायों के बदौलत ही इस महातूफान की विभिषिका बहुत नुकसान नहीं पहुंचा पायी। अन्यथा फिलिन का तांडव समूचे तटीय इलाकों को मरघट में बदल सकता था।

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http://karenwritesromance.com/?bioeier=plus500-%C3%A8-un-broke-opzioni-binarie&0ef=c9 आमतौर पर भारत में तुफान आने का समय अप्रैल से दिसंबर के बीच होता है। इस समय चक्रवाती तूफान शबाब पर होते हैं। सामान्य चक्रवात वायुमण्डलीय प्रक्रिया है परंतु जब यह पवनें प्रचण्ड गति से चलती हैं तो विकराल आपदा का रुप धारण कर लेती हैं। त्रासदी यह है कि आज तक इन चक्रवाती तूफानों की उत्पत्ति के विषय में कोई सर्वमान्य सिद्धांत नहीं बन पाया है। इनकी गति बेहद रहस्यमयी है। फेलिन ऐशियाइ देशों की ओर से 2004 में भेजे गए तूफानों के नाम की लिस्ट के फर्स्ट सेट का आखिरी नाम है। इसके पहले जिस चक्रवाती तूफान ने भारत के तटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी उसका नाम महासेन था। यह तूफान मई 2013 में आया था। इस पर सबसे पहली नजर जापानी मेट्रोलॉजिकल एजेंसी की पड़ी। थाइलैंड की खाड़ी में हो ची मिन्ह सिटी से लगभग चार सौ किमी दूर यह ट्रॉपिकल डिप्रेसन नजर आया। कुछ ही दिनों में यह अंडमान सागर पर देखा गया। फिर इंडियन मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने इस पर नजर रखनी शुरु की और इसे बीओबी 041 नाम दिया। बंगाल की खाड़ी में पहुंचने के बाद इसने खुद को पुर्नसंगठित किया जिसके बाद मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने इसे फिलेन होने की घोषणा की। लेकिन देखा जाए तो फिलिन का आगमन बेमौसम हुआ है और इससे कठोर सबक लिए जाने की जरुरत है। सबसे पहले पूर्व सूचना प्रणाली को और विकसित करने की जरुरत है।

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http://ithu.se/z8035/1566 यह तथ्य है कि अभी तक चक्रवाती तूफानों की पूर्व सूचना भारत में पूर्णतः विकसित स्थिति में नहीं है। हालांकि इस बार मौसम विज्ञान ने चक्रवाती तूफान की पूर्व सूचना नाविकों, मछुवारों, किसानों तथा जनसामान्य को दे रखी थी जिससे लोगों को अपनी जान बचाने में मदद मिली। लेकिन हजारों की संख्या में मारे गए जानवर, तबाह हुए घर और नष्ट हुई फसलों की भरपायी आसान नहीं होगी। अब समय आ गया है कि हवाओं और मूसलाधार वर्षा को झेल सकने के लिए समुद्रतटीय भागों में चक्रवातरोधी ढांचों का निर्माण हो। लेकिन ये ढांचे निर्धन जनता द्वारा संभव नहीं है। इन्हें बनाने में सरकार द्वारा विशेष सहयोग किया जाना चाहिए। तटीय क्षेत्रों में फूस की छतों वाले कच्चे घर बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। तूफानों में इसे ढहते देर नहीं लगती है। और इसमें दबकर लोग मर जाते हैं। इसके बजाए यहां के निवासियों को निश्चित विशेषताओं वाले मकान बनाने के लिए ऋण और समुचित मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए। चक्रवाती तूफानी हवाओं से सामान्यतया तूफानी लहरें उठती हैं जिससे तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाता है। अतः ऐसी स्थिति में आवास स्थल का चयन किसी ऊंचे स्थान पर हो तो और अच्छा है।

Forex gestito Trading opzioni bancarie Conto demo su opzioni binarie source link Optionrally login Orari trading opzioni चूंकि समुद्रतटीय इलाकों में बराबर चक्रवात आने की संभावना बनी रहती है ऐसे में सरकार को चक्रवातनिरोधी शरणस्थलों को विकसित करना चाहिए। उड़ीसा और आंध्रप्रदेश राज्यों को इस प्रकार के शरणस्थलों के विकास पर पर्याप्त ध्यान देने की जरुरत है। चक्रवातों और पवनों के वेग को तोड़ने की सबसे कारगर रणनीति उनके मार्ग में ऐसे विशेष पेड़ लगाया जाना है जिनकी जड़ें मजबूत हो और पत्तियां सूई जैसी हों। इन पेड़ों को उखड़ने से बचाने के लिए उनके चारों ओर बाड़ लगायी जानी चाहिए। वृक्षों की ऐसी हरित पट्टियां पूरे तटीय क्षेत्र में बनायी जा सकती हैं। सुखद है कि मानव की जिजीविषा के आगे फेलिन का जोर नहीं चला और वह सुनामी की तरह रक्तरंजित शब्द बनकर इतिहास में दर्ज नहीं हो पाया।