न मन्दिर बनेगा, न मस्जिद बनेगी हर पांच साल बाद सिर्फ सरकार बनेगी

5 years ago तनवीर जाफरी 0

हिंदुओं को मंदिर व मुसलमानों को मस्जिद मिले या न मिले, मगर समाज को विभाजित करने वाले राजनीतिज्ञों को हर पांच साल बाद इसी हिंदू-मुस्लिम व मंदिर-मस्जिद जैसे विभाजनकारी मुद्दों पर सवार होकर सत्ता जरूर मिल जाया करती है…

भारतीय लोकतंत्र कहने को तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, मगर देश का ‘लोक’ विभिन्न वर्गों में जितना अधिक विभाजित है, उतना शायद ही किसी अन्य लोकतांत्रिक देश का होगा. मजे की बात तो यह है कि इस व्यवस्था के जिम्मेदार राजनीतिज्ञ विभिन्न श्रेणियों में आम भारतीयों के बंटे होने की सार्वजनिक तौर पर आलोचना तो करते हैं, मगर समय आने पर इसके बीच फासला और अधिक बढ़ाने का काम भी करते हैं. इतना ही नहीं बल्कि ऐसे राजनीतिक दलों का प्रयास भी यही होता है कि वे देश की संसदीय व विधानसभा सीटों पर ऐसे प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारें, जिनका अपनी जाति अथवा धर्म के मतदाताओं का निर्वाचन क्षेत्र विशेष में या तो बहुमत हो या फिर उनका मजबूत संख्या बल हो. हालांकि ऐसा करना भारतीय संविधान या राजनीतिक दलों की नियमावली में कतई उल्लिखित नहीं है, मगर राजनीति के बिगड़ते चेहरे-मोहरे तथा सत्ता तक किसी भी प्रकार से पहुंचने की चाहत ने उन्हें ऐसी व्यवस्था बनाने व उन पर अमल करने के लिए मजबूर कर दिया है. आमतौर पर जाति के आधार पर टिकट आवंटित किए जाने की परंपरा अब एक खतरनाक मोड़ पर जा पहुंची है. कई सत्तालोभी राजनीतिक दल जातिगत आधार पर समाज के विभाजन से भी दो कदम आगे बढकर धर्म आधारित विभाजन के रास्ते पर चल पड़े हैं. गुजरात जैसे राज्य को इन्होंने अपनी इस नापाक मंशा का शिकार भी बना डाला है. ऐसी शक्तियों का प्रयास है कि यह प्रयोग पूरे देश में किए जाएं. गुजरात की ही तरह पूरे देश को धर्म के आधार पर फिलहाल वैचारिक रूप से विभाजित कर बहुसंख्यक मतदाताओं से अपने पक्ष में मतदान कराए जाने का वातावरण तैयार किया जाए. इसी इच्छापूर्ति के लिए अयोध्या में अकारण तथा बिना किसी पारंपरिक रीति-रिवाज के बेमौसमी चौरासी कोसी परिक्रमा घोषित कर दी जाती है, तो दूसरी ओर इसी परिक्रमा को कुछ इस तरह दबाने का प्रयास किया जाता है गोया यह साधू-संतों की परिक्रमा न होकर देश की एकता के लिए खतरा पैदा करने वाले सबसे बड़े प्रयास हों. बहरहाल, पिछले दिनों मीडिया की सुर्खिया बटोरने वाली 84 कोसी अयोध्या परिक्रमा उत्तर प्रदेश सरकार की सख्ती के चलते अपना पूरा रंग नहीं दिखा सकी और विवादों के बीच संपन्न भी हो गई. अब एक बार फिर से 84 कोसी परिक्रमा के वही आयोजक अयोध्या में पांच कोसी परिक्रमा करने का प्रयास कर रहे हैं.

इस बार प्रस्तावित यात्रा को लेकर आयोजकों का तर्क है कि 84 कोसी प्रस्तावित परिक्रमा को राज्य सरकार ने अपारंपरिक व असामयिक कहकर रोकने का प्रयास किया था, परंतु पांच कोसी परिक्रमा 12 महीने व 24 घंटे चलती रहती है. लिहाजा सरकार इसे रोकने का प्रयास नहीं कर सकती. इस यात्रा को सफल बनाने के लिये इसमें भीड़ जुटाने की गरज से साधू-संतों का अयोध्या पहुंचना शुरू भी हो गया है. देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने की इसी मुहिम में पिछले दिनों उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला सांप्रदायिकता की आग में जल उठा. सांप्रदायिकता की यह आग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भी जा पहुंची. केंद्र व राज्य सरकार की चौकसी के कारण हालांकि इस क्षेत्र में फैलने वाली सांप्रदायिक हिंसा को तो सेना की तैनाती कर तथा कई जगहों पर सेना का फ्लैग मार्च करवा कर इसे नियंत्रित कर लिया गया, मगर इस आग को हवा देने व इसको भडकाने के प्रयास में लगे राजनीतिज्ञ काफी हद तक अपने मकसद में कामयाब भी हो गए.

सांप्रदायिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण होने के समाचार अभी से आने लगे हैं. अलग-अलग राजनीतिक दल अलग-अलग संप्रदाय के लोगों के प्रति अपना लगाव व सहानुभूति दर्शा रहे हैं. भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का यह कितना भयावह व डरावना सत्य है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाल में दंगा प्रभावित क्षेत्रों के दोनों ही धर्मों के लोगों के कई सदस्य अभी तक लापता हैं…

इस क्षेत्र में सांप्रदायिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण होने के समाचार अभी से आने लगे हैं. अलग-अलग राजनीतिक दल अलग-अलग संप्रदाय के लोगों के प्रति अपना लगाव व सहानुभूति दर्शा रहे हैं. भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का यह कितना भयावह व डरावना सत्य है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाल में दंगा प्रभावित क्षेत्रों के दोनों ही धर्मों के लोगों के कई सदस्य अभी तक लापता हैं. कई ऐसे लोग हैं जिनकी बेटियां-बेटे अभी तक घर वापस नहीं पहुंचे हैं. हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने परिजनों को अपनी नजरों के सामने कटते-मरते देखा है. इन लोगों के दिलों पर इस समय क्या गुजर रही होगी, इस बात का अंदाजा केवल भुक्तभोगी परिवार ही लगा सकता है. मगर इन सबकी पीड़ा से बेखबर व बेफिक्र राजनीतिज्ञ इस सांप्रदायिक हिंसा से लाभ व हानि के समीकरण बिठाने में अभी से लग गए हैं. कोई स्वयंभू रूप से बहुसंख्यकों का हमदर्द बना बैठा है, तो कोई अल्पसंख्यकों को ही अपना भाग्यविधाता समझे हुए है. जहां तक इन सांप्रदायिक दंगों का प्रश्र है, तो मुजफ्फरनगर में घटी प्रेम प्रसंग की घटना ने तथा इसमें हिंसा यहां तक कि हत्या हो जाने के बाद इस मामले ने राजनीतिज्ञों की कृपा दृष्टि’ के चलते सांप्रदायिक दंगों का रूप धारण कर लिया. इन दंगों के बाद राजनीतिज्ञ इसमें अपनी मनचाही फसल तलाशने लगे. राजनीतिज्ञ अपने नापाक इरादों को परवान चढ़ाने में इतने पारंगत हैं कि बिना किसी कारण के भी कारण पैदा करने की पूरी क्षमता रखते हैं. तिल का ताड़ बनाना या बिना बात का बतंगड़ बनाना इनके बाएं हाथ का खेल है.

ऐसे में आम लोगों को राष्ट्रहित एवं राष्ट्र के विकास को मद्देनजर यह सोचने की जरूरत है कि खुद को इन राजनेताओं के नापाक इरादों से कैसे बचाकर रखना है. ऐसे में अयोध्या के विवादित राम मंदिर-बाबरी मस्जिद प्रकरण की बात करें तो इसमें भी मंदिर व मस्जिद दोनों ही पक्ष के रामभक्तों व तथाकथित अल्लाह वालों की ओर से केवल और केवल राजनीति ही दिखाई देती रही है. जिस राम मंदिर निर्माण के संकल्प को लेकर लालकृष्ण अडवाणी ने रथयात्रा निकाली तथा अपनी यात्रा के अधिकांश मार्गों में सांप्रदायिक दंगों की लपटें पैदा कीं, उनके प्रयासों से ही तब उनकी पार्टी को देश में होने वाले चुनाव में अब तक की सबसे अधिक सीटें मिलीं. 183 के संख्या बल तक ‘रामजी’ की कृपा से ही पहुंचने के बाद अपनी सरकार बनाने के समय सत्तालोभियों एवं तथाकथित स्वयंभू रामभक्तों ने मंदिर निर्माण के विषय को ही किनारे रख दिया.

आखिर क्या कारण था कि इस मुद्दे को लेकर खुलेआम इन शक्तियों ने पूरे देश में सांप्रदायिकता फैलाई, दंगे भडकाए, सैकड़ों बेगुनाह दंगों में मारे भी गए. फिर सत्ता में आने की चाहत में राम मंदिर निर्माण के विषय को त्यागने की क्या आवश्यकता थी? क्या मंदिर मुद्दा त्यागकर सत्ता सुख भोगना इस बात का सुबूत नहीं है कि मंदिर निर्माण अथवा धार्मिक भावनाओं को भडकाना आदि बातें तो महज एक बहाना है, जबकि असली मकसद तो छल-कपट व पाखंड से सत्ता पाना है.

कुछ ऐसे ही वादे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव एवं तथाकथित मुस्लिम शुभचिंतकों ने भी किए थे. अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिये बाबरी मस्जिद निर्माण का वादा तथा आश्वासन दिया जाता रहा. कभी किसी आडवाणी जैसे नेता को गिरफ्तार कर मुस्लिम समर्थक दिखाई देने की कोशिशें की गयीं, तो कभी किसी धार्मिक यात्रा को खतरा बताकर उसे प्रतिबंधित कर धर्म विशेष के वोट झटकने के प्रयास किए गए. मगर जो परिणाम सामने हैं, वह यही कि न तो अब तक मंदिर बना और न मस्जिद. हां, समाज के इन नेताओं के सफल प्रयोग बदस्तूर जारी हैं. हिंदुओं को मंदिर व मुसलमानों को मस्जिद मिले या न मिले, मगर समाज को विभाजित करने वाले राजनीतिज्ञों को हर पांच साल बाद इसी हिंदू-मुस्लिम व मंदिर-मस्जिद जैसे विभाजनकारी मुद्दों पर सवार होकर सत्ता जरूर मिल जाया करती है.