बयान बहादूर बिहारी

4 years ago नवल किशोर कुमार 0

दोस्तों, गुजरात के सीएजी द्वारा जारी रिपोर्ट में गुजरात प्रदेश में कुपोषण की बात कही गयी है। कहा गया है कि वहां हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। यह हालत तब है जबकि वहां की नरेंद्र मोदी सरकार  द्वारा वर्ष 2007 से ही कुपोषण दूर किये जाने के लिए विशेष योजनायें चलाई जा रही हैं। सीएजी की  इस रिपोर्ट के बाद पूरे देश में नरेंद्र मोदी के विरोधियों को एक हथियार मिल गया है। इसके जरिए उनके विरोधी गुजरात के विकास पर सवाल उठा रहे हैं। कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात  के विकास का दावा केवल विज्ञापनी विकास है। विज्ञापनी विकास का मतलब यह कि नरेंद्र मोदी ने अखबारों और टेलीविजन चैनलों को विज्ञापन देकर गुजरात का विकास पुरुष होने का खिताब हासिल किया.

सीएजी की रिपोर्ट को लेकर बिहार में भी उनके बयान बहादुर विरोधियों का बयान आया है। अपना मुंह खोलते हुए जदयू सांसद शिवानंद तिवारी ने गुजरात के विकास को नकारा है तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी ने भी गुजरात के विकास को हवा हवाई करार दिया है। खास बात यह है कि इन नेताओं के बयान में गुजरात की तथाकथित कुपोषित जनता का दर्द नहीं बल्कि इस बात की खुशी है कि गुजरात में लोग कुपोषित हैं।

इसे नरेंद्र मोदी के विरोधियों की राजनीतिक दरिद्रता ही कहा जाना चाहिए। अगर सीएजी रिपोर्ट को सही मान लिया जाय तो फिर रघुराम राजन द्वारा हाल ही में जारी की गयी रिपोर्ट को कैसे दरकिनार किया जा सकता है कि गुजरात अभी देश के कम विकसित राज्यों में शामिल है। जो लोग रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट को गलत कह रहे हैं वे सीएजी की रिपोर्ट से इतर विचार कैसे रख सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात का विकास का दावा निश्चित तौर पर गलत है। यह बिल्कुल नीतीश सरकार द्वारा बिहार के विकास के दावे के जैसा है।

एक दावा जो बिहार सरकार के मुखिया इन दिनों कर रहे हैं कि वे वर्ष 2015 तक बिहार के हर घर में बिजली पहूंचाने की कोशिशों में सफल हो रहे हैं, सरासर विज्ञापनी है। हकीकत यह है कि अभी भी आधे से अधिक गांव इक्कीसवीं सदी में भी अंधेरे युग में जीने को विवश हैं। आधे से अधिक गांवों में जहां पिछले डेढ दशकों में विद्युतीकरण किया गया है, वहां कम क्षमता वाला ट्रांसफर्मर लगाये जाने के कारण बिजली का होना या नहीं होना एक समान ही है। बिजली उत्पादन को लेकर बिहार में बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अगले दो वर्षों में बिहार में इतनी बिजली पैदा हो जाएगी कि बिहार बिजली बेचने वाला राज्य हो जाएगा।

यह बात समझ से परे है कि ऐसे दावे किस आधार पर किये जा रहे हैं। कोयले के खदान के आवंटन को लेकर द्वंद्व पुराना ही है। नदियों में जल प्रबंधन की समस्या जस की तस ही है। सवाल यह है कि कोयले और पानी के बगैर क्या राज्य सरकार बिजली आसमान से पैदा करेगी। जिन जगहों पर बिजली उत्पादन केंद्र बनाये जाने के दावे किए जा रहे हैं, वहां की असलियत विज्ञापनी अखबारों में प्रकाशित नहीं किये जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर नवीनगर में बिजली केंद्र को ही लिजीये। सरकारी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया जा चुका है कि अगर यह केंद्र स्थापित हुआ तब अपेक्षित उत्पादन नहीं हो सकेगा। खैर इससे भी बड़ा उदाहरण कांटी थर्मल का है। सरकार ने इसे उपेक्षित कर रखा है। बाढ के इलाके में स्थापित हो रहा एनटीपीसी का बिजली उत्पादन केंद्र के समक्ष भी कोयले और पानी का खैर, नेता हैं तो बयान बहादुर होंगे ही। ऐसे में गुजरात के विकास को लेकर सीएजी के द्वारा की गयी टीका टिप्पणी को लेकर नरेंद्र मोदी पर हमले होंगे। यह तय है। लेकिन मूल सवाल यह है कि गुजरात में कुपोषण और विकास पर सवाल उठाने वालों को पहले अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। अपना गिरेबां यानी अपने राज्य की स्थिति पर विचार करना चाहिए। अगर बिना विचार किये बयान दिये जायेंगे तो आम जनता पर इन बयानों का दूसरा प्रभाव पड़ेगा। वह यह कि नरेंद्र मोदी पर लगाये जा रहे आरोप महज बकवास हैं। अगर यह प्रभाव हुआ तो यह नरेंद्र मोदी के हित में ही होगा, जो देश में फासीवाद की नयी परिभाषा गढने को बेताब हैं।