बिहार में नमो नमो

4 years ago नवल किशोर कुमार 0

अब केवल औपचारिकता मात्र शेष रह गया है। छह महीने के बाद देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे। इस बात के प्रमाण देश के हर कोने में दिखायी दे रहा है। नरेंद्र मोदी की विभिन्न रैलियों में उमड़ने वाली भी इस बात का प्रमाण है कि देश की बहुसंख्यक जनता अब बदलाव के मूड में है। जहां एक ओर नरेंद्र मोदी मजबूत हो रहे हैं, वही तथाकथित धर्म निरपेक्ष शक्तियां आपसी सिर-फुटौव्वल के कारण कमजोर हो रही हैं। अब तो स्वयं देश के प्रधानमंत्री पर कोयले घोटाले में शामिल होने का आरोप लग चुका है। राहुल गांधी अभी तक भारत के युवाओं को अपने साथ जोड़े रखने में कामयाब होते नहीं दिख रहे हैं।

हाल के दिनों में इस्लामिक धर्म नेताओं ने भी नरेंद्र मोदी के पक्ष में आवाज लगाया है। हालांकि इससे नरेंद्र मोदी को कितना लाभ मिलेगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। दूसरी ओर हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए नरेंद्र मोदी के अलावा देश में कोई विकल्प भी नहीं है। तीसरे मोर्चे का अस्तित्व बनने से पहले ही समाप्त होता नजर आ रहा है। खासकर उत्तरप्रदेश और बिहार में जहां कुल मिलाकर 120 सीटें हैं, वहां दोनों सत्ताधारी दलों यानी समाजवादी पार्टी और जदयू की हालत पतली नजर आ रही है। हालांकि यूपी में अखिलेश यादव की सरकार को भले ही अभी एंटीकम्बेंशी फैक्टर का खतरा न हो, लेकिन बिहार में तो इसकी पूरी संभावना है।

बिहार में विकास की राजनीति को जमीन पर उतारने वाले सुशील मोदी और नीतीश कुमार अब एक-दूसरे के सामने हैं। इसके अलावा सवर्ण जातियों का वोट अलग-अलग दलों में जाता दिख रहा है। मसलन राजपूत जाति का वोट राजद के खाते में तो भुमिहार जाति के वोटरों के लिए भाजपा जदयू की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। जबकि ब्राह्म्णों के लिए तो कांग्रेस और भाजपा दोनों एक समान ही हैं। लेकिन हिन्दुत्व के मसले के कारण ब्राह्म्ण भाजपा के पक्ष में ही जायेंगे। इसका कयास आसानी से लगाया जा सकता है।
बिहार में सवर्ण जातियों के मतों की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत है। जबकि मुसलमानों के 20-22 फीसदी वोटों में भी बिखराव होने की पूरी संभावना है। मसलन जदयू को हिन्दू मतों के भारी नुकसान के एवज में मुसलमानों का वोट तभी मिलेगा जब राजद या कांग्रेस भाजपा को हराने की स्थिति में नहीं होगा। इसके अलावा उम्मीद है कि भाजपा इस बार कम से कम 8-10 मुसलमानों को बिहार में अपना उम्मीदवार बनायेगी। इसका फर्क भी निश्चित तौर पर पड़ेगा।

पिछड़ी जातियों में सबसे अधिक आबादी वाला यादव जाति के लोग राजद के पक्ष में जायेंगे। राजद सुप्रीमो को सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा जेल भेजे जाने के बाद यादवों में आक्रोश है जो चुनाव के दौरान राजद के लिए सहानुभूति में परिवर्तित होगी। संभव है कि शरद यादव और बिजेंद्र यादव के कारण कोसी इलाके में यादव जाति के वोट जदयू को मिले। लेकिन यह भी ध्यान रखने योग्य है कि मधेपुरा और पूर्णिया जिले में पप्पू यादव के जेल से बाहर रहने का असर जरुर दिखेगा। सब कुछ इस बात पर निर्भर पड़ेगा कि पप्पू यादव किस दल को अपना समर्थन देते हैं। फिलहात तो रांची जाकर लालू प्रसाद से मुलाकात कर उन्होंने राजद को अपना समर्थन देने का संकेत दे दिया है। अगर ऐसा हो गया तो कोसी इलाके में जदयू का सूपड़ा साफ होना तय है।

कांग्रेस के लिए वर्ष 2014 में कुछ खास नहीं है। कहने का मतलब यह है कि अगर कांग्रेस अपना खाता भी खोल ले तो उसके लिए यह बोनस सरीखा होगा। उसके दोनों हाथों में लड्डू होगा। मतलब यह है कि जदयू जीते या फिर राजद, अगर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को अपेक्षित सीटें नहीं मिलीं तब दोनों दलों के नेता कांग्रेस शरणम गच्छामि का मंत्र जपेंगे ही। यही हाल उत्तरप्रदेश में भी देखने को मिलेगा। वहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों कांग्रेस के लिए ही चुनाव जीतेंगी।

तीसरे मोर्चे की बात कहने वाला वामपंथ अभी तक के इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल आदि राज्यों में वामपंथी विचारधारा लोगों को आकर्षित करने में नाकामयाब रही है। पूंजीवादी ताकतें बड़ी तेजी से लाल के तिलिस्म को समाप्त कर रही हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि वामपंथ अपने लिए इतने सीट भी जीत सकेगी ताकि संसद में लाल विचारधारा गूंजेगी। इसकी एक बड़ी वजह है वामपंथी दलों की आपसी एकता। उत्तरप्रदेश में तो लाल पार्टियों का कोई अस्त्तिव ही नहीं है। बिहार में भी कमोबेश यही स्थिति है। अलबत्ता विधानसभा चुनाव में इस बार लाल पार्टियों को कुछ फायदा हो सकता है, इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। केवल कल्पना इसलिए कि लाल पार्टियों में एका के बगैर यह संभव नहीं है।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी के लिए मैदान साफ है। बिहार में कम से कम 10-12 सीटें भाजपा के खाते में जा सकती हैं। वहीं जदयू की संख्या भी दहाई को पार कर सकती है। यही हाल राजद का भी होगा। कांग्रेस के खाते में 3-4 सीटें आने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के पास भले ही इतनी सीटें न हों कि वह सीधे-सीधे सरकार बनाने का दावा पेश करे, लेकिन इतनी कम भी नहीं होंगी कि उसे सरकार बनाने में किसी प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। वैसे भी भारत में सबकुछ बिकता है। खरीदने और बेचने के मामले में भाजपा का मुकाबला कोई पार्टी नहीं कर सकती है।