मोदी का ‘आइडिया ऑफ इंडिया’?

5 years ago ग्लैडसन डुंगडुंग 0

go to site मोदी ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आइडिया आफ इंडिया को चकनाचूर कर देती है. वे टीका तो मुस्कुराते हुए लगाते हैं, लेकिन टोपी नहीं पहनना चाहते. वे हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करते हैं, जो मूलतः संघ परिवार की विचारधारा है…

binäre optionen buch भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी के भारी विरोध के बावजूद फॉसीवाद और विकास के गठजोड़ को पूंजीवादी लोकतंत्र के बाजार में परोसने में महारथ हासिल करने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अब भाजपा के घोषित प्रधानमंत्री उम्मीदवार बन गए हैं. इसी के साथ भाजपा का असली चेहरा भी देश के सामने आ गया है कि हकीकत में पार्टी की लगाम आरएसएस के हाथों में है. राष्ट्रीय मीडिया ने तो देश को मोदीमय ही बना दिया है.

http://winevault.ca/?perex=notizie-finanziarie-opzioni-binarie मीडिया द्वारा चुनाव में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिलने की बात डंके के चोट पर कही जा रही है. अब इसमें नया चैप्टर यह जोड़ दिया गया है कि देश का 47 प्रतिशत युवा वोटर मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है. ऐसी स्थिति मंे मोदी की हार-जीत से ज्यादा यह विश्लेषण जरूरी है कि क्या मोदी ‘आइडिया आफ इंडिया’ का प्रतिनिधित्व करते हैं? दूसरा प्रश्न यह है कि क्या मोदी से भारतीय संविधान को खतरा है? और तीसरा सवाल यह है कि क्या ‘मैंगो पीपुल्स’ को मोदी से डरने की जरूरत है?

http://docimages.fi/?dereter=bin%C3%A4re-optionen-experten&041=42 इसमें सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि आखिर ‘आइडिया आफ इंडिया’ है क्या? भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान के प्रस्तावना में ही आइडिया आफ इंडिया को खूबसूरती के साथ सजाया है, जिसमें विविधता में एकता, सर्वधर्म संभव, धार्मिक और अभिव्यक्ति की आजादी, आत्म-सम्मान के साथ जीने के लिए स्वतंत्रता और समान अधिकार, राष्ट्रीय एकता कायम करने वाली बंधुता और सभी को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय देने की गारंटी समाहित है, जो संविधान का मूल आधार भी है.

Soldi da Investire ? Scopri come e source oggi in modo conveniente. Consigli sul trading online e come fare per evitare truffe... दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आइडिया आफ इंडिया को चकनाचूर कर देती है. वे टीका तो मुस्कुराते हुए लगाते हैं, लेकिन टोपी नहीं पहनना चाहते. वे हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करते हैं, जो मूलतः संघ परिवार की विचारधारा है. हालांकि संघ परिवार खुद को राष्ट्रभक्त, देश का हितैषी और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा संरक्षक होने का दंभ भरता है, लेकिन आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में तिरंगे से ज्यादा तरजीह भगवा झंडे को मिलती है.

Una delle domande ricorrenti che mi vengono fatte tramite email è come e http://www.cheferetv.net/pizdabolstvo/3338 30000 euro in questo momento. Naturalmente a 30000 euro potete संघ परिवार ने देश के लिए अलग से संविधान भी बनाकर रखा है और सत्ता में आने पर उसे लागू करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मौजूदा संविधान पसंद नहीं है. असल में संघ परिवार की विचारधारा ही विदेशी है, जो मूलतः हिटलर से प्रभावित है. हिटलर के राष्ट्र की परिकल्पना में एक नस्ल, एक भाषा और एक संस्कृति समाहित थी. इसी विचारधारा की वजह से जर्मनी में 60 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था.

see संघ परिवार की विचारधारा का परिणाम अयोध्या, गुजरात और देश के कई अन्य हिस्सों में देखा जा चुका है, यही वजह है कि मोदी की हुंकार से मैंगो पीपुल्स के बीच में दहशत पैदा होती दिखती है. इसलिए आइडिया आफ इंडिया और संघ परिवार की विचारधारा देश में एक साथ नहीं चल सकती है, क्योंकि दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं.

opzioni binarie inizia gratis लेकिन राष्ट्रीय मीडिया मोदी को देश के मसीहा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, मानो मोदी के आते ही देश की सारी समस्याओं का अंत हो जायेगा. इसलिए यह भी सवाल है कि क्या मीडिया भी आइडिया आफ इंडिया से बेखबर है? सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की भूमिका पर यह कहते हुए सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मीडिया को संवैधानिक मूल्यों की समझ है? न्यायालय ने सवाल इसलिए किया है, क्योंकि मीडिया भी सिर्फ और सिर्फ आर्थिक विकास और जीडीपी की ही बात करती है.

http://iviti.co.uk/?vera=interactiveoption-com&09e=32 इतना ही नहीं 15 अगस्त को राष्ट्रीय मीडिया ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी दोनों के भाषणों की तुलना की और दोनों को चैनलों ने लाईव दिखाया. ऐसा लग रहा था मानो दो देशों के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हैं. क्या यह बरताव उचित था. मनमोहन सिंह और मोदी की तुलना की जाये, तो अंतर सिर्फ इतना ही दिखाई देगा कि एक चुप रहने में तो दूसरा बोलने में माहिर है. एक में होश है तो दूसरे में जोश, एक आइडिया आफ इंडिया के करीब है और दूसरा इससे काफी दूर है. लेकिन दोनों एक ही आर्थिक नीति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे सिर्फ मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचता है.

will dating another girl make my ex jealous आजकल कारपोरेट जगत भी मोदीमय होता दिखाई पड़ता है, लेकिन सवाल यह है कि कारपोरेट जगत को भारत में उदारीकरण के जनक कहे जाने वाले मनमोहन सिंह से ज्यादा मोदी पर क्यों भरोसा है? असल में भाजपा बहुसंख्यक व्यापारिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे अब यह लगने लगा है कि मोदी उनके लिए व्यापार के नये-नये रास्ता खोल सकते हैं. यह इसलिए क्योंकि पूरे देश में भूमि-अधिग्रहण को लेकर रैयत, पूंजीपति और सरकारों के बीच तनातनी चल रही है और प्रस्तावित नये भूमि अधिग्रहण कानून से पूंजीपतियों की समस्या और जटिल होने वाली है.

enter मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम और अहलुवालिया की तिकड़ी के बावजूद कारपोरेटस की बड़ी-बड़ी परियोजनायें नहीं लग पायी हैं. ऐसी स्थिति में उन्हें यह लगने लगा है कि मोदी ही उन्हें प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा दिलायेंगे, क्योंकि मोदी सरदार सरोवर परियोजना के बारे में यह कह चुके हैं कि गुजरात के 4 लाख किसानों को पानी देने के लिए 10 हजार लोगों को विस्थापित करने में कोई बुराई नहीं है. यानी ग्रेटर कामन गुड के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं और कारपोरेट वर्ल्ड इसी वजह से उन्हें सत्ता में देखना चाहता है.
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी 2014 के आम चुनाव में भाजपा को सत्ता दिला पायेंगे? यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि 90 के दशक में देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने वाले हिन्दुत्व के मसीहा लालकृष्ण आडवाणी और हिन्दू हृदयसम्राट बालासाहब ठाकरे भी सत्ता के केन्द्र तक नहीं पहुंच पाये, हालांकि हिन्दुत्ववादी राजनीति को उन्होंने जरूर स्थापित कर दिया.

Options trader blog rich राम मंदिर आंदोलन के समय ऐसा लग रहा था मानो सचमुच हिन्दुत्व का मसीहा आ गया हो. उस समय मैंगो पीपुल के लिए भी रोटी, कपड़ा और मकान से ज्यादा जरूरी अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना करना था. बावजूद इसके आडवाणी प्रधानमंत्री नहीं बन पाये. यह इसलिए हुआ क्योंकि आडवाणी आइडिया आफ इंडिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

जब इस बात की समझ आडवाणी को हुई तो उन्होंने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर आइडिया आफ इंडिया का हिस्सा बनने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उनका करवट बदलना हार्डकोर हिन्दुओं को पसंद नहीं आया. इसलिए अंततः संघ परिवार ने उन्हें हाशिये पर डाल दिया. वहीं अटल बिहारी बाजयेपी देश के प्रधानमंत्री इसलिए बने क्योंकि वे आइडिया आफ इंडिया के करीब थे. 2002 के गुजरात दंगे के समय भी उन्होंने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने को कहा, लेकिन उस समय आडवाणी ही थे, जिन्होंने मोदी को सहारा दिया था और उनकी कुर्सी बच पायी थी.

इसमें दोराय नहीं है कि मोदी जमीनी नेता हैं, उनमें भीड़ को अपने तरफ खींचने की ताकत है और युवाओं को उनमें समाधान भी दिखाई देता है. इसीलिए उच्च जातियों के संगठन आरएसएस ने पिछड़े वर्ग से आने वाले मोदी का नेतृत्व स्वीकार किया. हकीकत यह है कि मोदी आइडिया आफ इंडिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, वे संघ परिवार के विचारधारा को ही आगे बढ़ायेंगे. इसलिए मोदी की जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने वोटर आइडिया आफ इंडिया और संघ परिवार की विचारधारा को समझते हैं.

अगर वोटर आइडिया आफ इंडिया को समझते हैं, तो मोदी की हार निश्चित है. वहीं मोदी जीत जाते हैं, तो स्पष्ट हो जायेगा कि आजादी के 66 वर्ष बाद आइडिया आफ इंडिया ने दम तोड़ दिया है. मोदी की जीत का अर्थ संविधान की हार होगी और इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार देश में सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली कांग्रेस होगी, जिसने आइडिया आफ इंडिया को जन-जन तक नहीं पहुंचाया. आज भी देश की बहुसंख्यक आबादी संविधान से अनजान है या इसे नकारात्मक दृष्टि से देखती है.

इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता है कि 90 के दशक की उदारीकरण की नीति ने आइडिया आफ इंडिया को हाशिये पर डाल दिया और विकास के नाम पर मुट्ठीभर लोगों के हाथों देश के संसाधनों को केन्द्रित कर दिया है. यही वजह है कि आज देश की 70 प्रतिशत संपति सिर्फ 8200 लोगों के पास है और बहुसंख्यक लोग संसाधनहीन हो गए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने गोवा में लौह-अयस्क उत्खनन के मामले में स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू सकल उत्पाद (जीडीपी) और आर्थिक विकास ही सबकुछ नहीं है तथा निजीकरण संवैधानिक मूल्य के खिलाफ है. इसलिए देश के प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के साथ समृद्धि होनी चाहिए. इंसाफ के साथ समावेशी विकास ही असली विकास है और इसी में आइडिया आफ इंडिया झलकता है लेकिन मनमोहन, मीडिया और मोदी तीनों इसके खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं. ऐसी स्थिति में देश को नये नेतृत्व की जरूरत है, जो आइडिया आफ इंडिया को समझता हो और इसकी रक्षा करने की ताकत रखता हो.