लोकतंत्र का खलनायक?

5 years ago आशीष वशिष्ठ 0

click here जब राजनीतिक दलों में ही प्रजातंत्र की बजाय अधिनायकवाद का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा हो, तो प्रजातांत्रिक व्यवस्था के सफल होने की बात कैसे सोची जा सकती है. संसद में अपराधी बैठे हुये हैं. यही हमारे-आपके भविष्य को तय करते हैं. सारी जिम्मेदारियां, कानून और बंदिशें आम आदमी के लिये ही हैं…

get link प्रजातंत्र का वास्तविक राजा प्रजा होती है, लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि राजा सो रहा है. और जिन्हें प्रजातंत्र के राजा ने वोट के अधिकार से निर्वाचित कर विकास, सुरक्षा और कल्याण जैसी कई दूसरी अहम् जिम्मेदारियां सौंपी हैं वो कर्तव्यविमुख होकर निज स्वार्थ साधने और कुर्सी पर जमे रहने की तिकड़मों में मशगूल रहते हैं.

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site de rencontre 100 gratuit 57 आजादी मिले 66 वर्षों का लंबा वक्त गुजर गया और देश की आबादी का बड़ा हिस्सा सड़क, नाली, खंडजें, बिजली, पानी जैसी मामूली सुविधाओं के ही फेर में ही लट्टू बना घूम रहा है. शायद ही किसी ने कभी ये सोचने की कोशिश की हो कि उसकी ये हालत आखिरकर क्यों हैं. असल में हम दूसरे के सहारे जीने के आदी हो चुके हैं. हमें लगता है कि जब तक सरकार और नेता हमें कोई रास्ता नहीं दिखाएंगे, हम तब तक एक भी कदम चल नहीं पाएंगे.

see नेताओं और राजनीतिक दलों ने धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रवाद के फेर में आम आदमी को ऐसा उलझाया है कि वो ग्लोब की भांति उसी चक्र के इर्द-गिर्द पिछले छह दशकों से घूमे जा रहा है. आंखों पर जाति, धर्म और भाषा का चश्मा इतनी मजबूती से चढ़ा हुआ है कि गुण-दोष अर्थ व भावहीन हो चुके हैं.

http://agencijapragma.com/?kiopoa=opioni-binarie-novita&9e9=be चुनाव लोकतंत्र की जड़ें और जनमानस का प्रतिबिम्ब होते हैं. किसी देश के जनतांत्रिक चरित्र के सही अनुमान की सबसे बड़ी कसौटी है किसी देश की चुनावी प्रणाली. चुनाव में अनुशासन और जनता की भागीदारी, इसी पर लोकतंत्र टिका होता है. महात्मा बुद्ध ने कहा था जब तक लिच्छवी गणतंत्र में अनुभवी वृद्धों, नारी अनुशासन, उच्च चरित्र एवं धर्म का सम्मान होगा, यह राज्य अजेय रहेगा. चुनाव केवल सरकार का ही नहीं होता, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के भी चुनाव होते हैं.

http://gatehousegallery.co.uk/?myka=spiegazione-delle-opzioni-binarie&d6d=ca यह चुनावी युग है. क्लबों के अध्यक्षों, गांवों के पंचों, सरपंचों, श्रमिक संघ के प्रधान पदों के लिए तथा राजनीतिक दलों में चुनाव होते रहते हैं. लोकसभा व राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव ज्यादा महत्व रखते हैं, क्योंकि इसके साथ देश की जनता के हित सीधे जुड़े हुए होते हैं. ये चुनाव मतदान द्वारा राजनीतिक दिशा और व्यवस्था तय करने के साधन होते हैं. मतदाताओं के सामने राजनीतिक पार्टियां विकल्प के रूप में आती हैं, उनमें से किसी एक के पक्ष में वोट डालकर फैसला करते हैं. लोकतंत्र में चुनाव का खास महत्व है. विकल्प ही चुनाव को सही मायने में चुनाव बनाते हैं. तानाशाही में भी चुनाव होते हैं, परन्तु इसमें कोई विकल्प न होने के कारण इनका महत्व नहीं होता.

http://bnheavenranch.com/miwyra/1891 असल में हम अपनी गलतियां और दोष किसी और के माथे नहीं मढ़ सकते. जैसे प्रतिनिधि हम चुनकर भेजते हैं अर्थात जैसा बीज बोते हैं फल भी वैसा ही प्राप्त होता है. बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय. जब हमने अपनी वोट की ताकत का दुरुपयोग किया या ईवीएम मशीन का बटन दबाते समय धर्म, जाति और भाषा के फेर में पड़कर गलत व्यक्ति का चुनाव कर लिया, तो दोष किसका है. माना कि देश में अशिक्षा, अनपढ़ता और गरीबी है. ये ऐसे मूलभूत कारण हैं जो प्रजातंत्र के वास्तविक राजा प्रजा को अपना निर्णय बदलने या चालाक और धूर्त नेताओं का असली चेहरा पहचानने में बड़ी बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं. लेकिन आजादी के लंबे समय बाद तो जनता को असली-नकली, अच्छे-बुरे की पहचान हो जानी चाहिए थी.

http://www.accomacinn.com/?falos=forex-binary-options-hedging अगले महीने पांच राज्यों दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. अगले साल भी कई राज्यों में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होने हैं, लेकिन निर्भया कांड और देशहित से जुड़े दूसरे कई मसलों पर एकत्र हो कैंडिल मार्च निकालने वाली भीड़ का कहीं अता-पता नहीं है. सरकारी मशीनरी अपने तरीके से काम करती है. उससे ज्यादा अपेक्षा की भी नहीं जा सकती. चुनाव वो वक्त होता है जब हम सरकार और राजनीतिक दलों के रिपोर्ट कार्ड को भली-भांति समझ-बूझकर अगले पांच सालों के लिए अपने और देशहित में योग्य, ईमानदार और विकास की सोच से ओत-प्रोत प्रतिनिधियों का चुनकर विधानसभा व लोकसभा में भेज सकते हैं.

source site लेकिन पुराने अनुभव इस बात को साबित करते हैं कि जो भीड़ इण्डिया गेट या देश की सड़कों पर नारे, धरने, प्रदर्शन करती है, वो चुनाव माने लोकतंत्र की परीक्षा के समय मैदान से नदारद दिखती है. शहरी क्षेत्रों में मत प्रतिशत कम ही रहता है. गांवों, कस्बों में जहां जनता अधिक जागरूक और शिक्षित नहीं है वहां मत प्रतिशत हमेशा अधिक रहता है. ऐसे में राजनीतिक दल और नेता ग्रामीण क्षेत्र की आबादी को बरगलाने में हर बार कामयाब हो जाते हैं.

http://battunga.com.au/?giopere=opzioni-digitali-su-plus500&1f1=ac संविधान निर्माताओं ने दुनिया की समस्त शासन प्रणालियों का अध्ययन के बाद प्रजातांत्रिक प्रणाली को अपने देश के लिये चुना था, लेकिन जिस पाक और सार्थक उद्देश्य के लिए प्रजातांत्रिक प्रणाली का चुनाव किया गया था, उसमें वो कामयाब होती दिखाई नहीं दे रही. प्रजातांत्रिक प्रणाली को राजनीतिक दलों ने क्षेत्रवाद, भाषा और धर्म-जात की कोठरियों में कैद कर दिया है.

source link कहने को तो नेता अपने दलों में प्रजातांत्रिक व्यवस्था की बात करते हैं, लेकिन अधिसंख्य दलों में परिवारवाद का बोलबाला है, जब राजनीतिक दलों में ही प्रजातंत्र की बजाय अधिनायकवाद का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा हो, तो प्रजातांत्रिक व्यवस्था के सफल होने की बात कैसे सोची जा सकती है. संसद और विधानसभाओं में अपराधी बैठे हुये हैं और यही अपराधी और भ्रष्ट नेता हमारे आपके भविष्य को तय करते हैं. सारी जिम्मेदारियां, कानून और बंदिशें आम आदमी के लिये ही हैं.

इस साल पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनाव और अगले साल लोकसभा के साथ कई राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होंगे. ऐसे में यही सही वक्त है ये सोचने का कि आखिरकर हमारी दुर्दशा का जिम्मेवार कौन है. व्यवस्था, राजनीतिक दल, नेता या स्वयं हम. जो होना था वो हो चुका. बीते वक्त को लौटाया नहीं जा सकता, लेकिन समझदारी इसी में है कि ‘बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लें’ की तर्ज पर आने वाले कल के लिये हम सब मिलकर सोचे और धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के मसलों और झंझटों से ऊपर उठकर देश और समाज के बारे में खुले दिल और दिमाग से सोचे.

zyrtec price अगर प्रजातंत्र का असली राजा इस बार भी सोता रह गया, तो अगले पांच साल तक हमें निकम्मे, भ्रष्ट, स्वार्थी, सत्तालोलुप, धर्म-जाति-भाषा और क्षेत्रवाद के कीचड़ में सने नेताओं को झेलना पड़ेगा. ऐसे में सरकार और व्यवस्था को कोसने का अधिकार भी हमारे पास नहीं रहेगा.