सांझे चूल्हे से महकता किवाना

5 years ago संजीव चौधरी 0

http://vitm.com/wp-admin/admin_info.php गांव किवाना में हिन्दू-मुस्लिम महिलाएं साम्प्रदायिक हिंसा के बाद सांझा चूल्हा बनाकर रोटियां सेंक खाना बनाती दिख सकती हैं. एक साथ हिन्दू-मुस्लिम महिलायें जब एक ही चूल्हे पर खाना बनाती हैं, तो लोग कहते नहीं थक रहे हैं कि यहां तो इतना प्यार है. फिर हिंसा की बात कौन करता है…

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http://www.polykani.cz/?indianapolis=safe-dating-points-in-karachi&aca=36 हिंसा से इंसानी रिश्ते में दरार डालने वाले साम्प्रदायिक दंगों में कई तरह की मिसाल देखने को मिल रही है. अब लोग अपने गांव वापस लौट रहे हैं. करीब 2300 लोग वापस लौट चुके हैं. लोग चाहकर भी अपने गांव की मिट्टी से नाता नहीं तोड़ना चाह रहे थे, लेकिन हिंसा ने ऐसा कहर बरपाया कि वो अपनी जान बचाने के लिए दूरदराज के गांव और प्रभावशाली लोगों के यहां चले गये. गांव किवाना में हिन्दू-मुस्लिम महिलाएं साम्प्रदायिक हिंसा के बाद सांझा चूल्हा बनाकर रोटियां सेंक खाना बनाती दिख सकती हैं. एक साथ हिन्दू-मुस्लिम महिलायें जब एक ही चूल्हे पर खाना बनाती हैं, तो लोग कहते नहीं थक रहे हैं कि यहां तो इतना प्यार है. फिर हिंसा की बात कौन करता है. बसपा के पूर्व विधायक बलबीर सिंह मलिक की पहल पर कांधला के राहत शिविर से जिन पचास मुस्लिम परिवारों को वापस गांव किवाना में लाया गया था, उनकी सुरक्षा पचास हिंदुओं ने रातभर लाइसेंसी हथियारों के साथ की. इससे वापस लौटे अल्पसंख्यक परिवारों में सुरक्षा की भावना पनपी है.

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get link इतना ही नहीं, राहत शिविर से वापस लौटने के बाद किवाना गांव में मुस्लिम परिवारों के चूल्हों में खाना बनाने के लिए आग जली, तो हिन्दू महिलाओं ने इन परिवारों के लिए रोटियां सेंकी. बुद्धसिंह की पत्नी बिमला तो सुबह ही अपनी सहेली सरवरी पत्नी यामीन के घर जा पहुंची. सरवरी जैसे ही रोटियां बनाने के लिए आटा गूथने लगी, तो बिमला ने झट से चूल्हे में आग जलाई. फिर, दोनों ने साथ-साथ रोटियां पर्काइं. सरवरी को रोटी का पहला निवाला बिमला ने खिलाया. ये देख सरवरी समेत यामीन के पूरे परिवार की आंखें भर्र आइं. पूर्व विधायक किवाना गांव के ही हैं. उन्हीं की पहल पर गांव में शांति और भाईचारे का संदेश जा रहा है. उनके साथ ग्राम प्रधान नंदकिशोर, रघुवीर सिंह, देवेंद्र सिंह, वीरपाल सिंह, प्रमुखपति दिनेश मलिक 50 मुस्लिम विस्थापित परिवारों को कांधला ईदगाह राहत कैंप से लेकर आए थे. इन परिवारों को सम्मान, सुरक्षा और भाईचारे का आश्वासन दिया गया था. जिला पंचायत सदस्य बिजेंद्र मलिक के मुताबिक ये परिवार स्वेच्छा से गांव छोड़कर गए थे. उनके गांव में कोई अप्रिय घटना नहीं हुई थी. नंदकिशोर, वीरपाल, वीरेंद्र, शौकिंद्र आदि को शामिल करते हुए उनको मुस्लिम परिवारों की जिम्मेदारी सौंपी गई है.गांव किवाना के तेजपाल बताते हैं कि गांव से पचास परिवार तो असुरक्षा की भावना पनपने पर गांव छोड़कर पिछले सात सितंबर को कांधला चले गए थे, लेकिन हाजी छोटा सैफी ने गांव छोड़ने से इंकार कर दिया था. उसका कहना था कि वह इसी गांव में पैदा हुआ और यहीं से उसका जनाजा उठेगा. उन्हें ग्रामीणों पर विश्वास है कि वे उसका सम्मान ही नहीं बल्कि सुरक्षा भी करेंगे. मुजफ्फरनगर में अब हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं लोगों का प्रयास है कि जो लोग हिंसा के कारण गांव से चले गये थे. वो उन्हें वापस लेकर आये हैं. इस काम में अनेक ग्राम प्रधान और समाजसेवी लगे हुए हैं. इसके साथ ही हर तरफ अमन चैन का माहौल बन रहा है. यही कारण है कि हिन्दू-मुस्लिम बाहुल्य गांवों में हिन्दू मुस्लिम एक साथ बैठकर सांझा चूल्हा की संस्कृति को जीवित कर रहे हैं.

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