पाक में सैन्य शासन का इशारा ?

4 years ago तनवीर जाफरी 0

पाकिस्तान वैसे तो पिछले दो दशकों से हिंसा का शिकार है, मगर धीरे-धीरे हिंसक घटनाओं में तेजी आ रही है.आलम यह है कि एक ओर चरमपंथियों का मुकाबला करने वाले सुरक्षाकर्मियों खासतौर पर पाकिस्तानी सेना का मनोबल टूटने के कगार पर है, तो दूसरी ओर उसे आतंकवादी संगठनों के हाथों में जाता देखकर संभ्रांत, शिक्षित तथा बुद्धिजीवी वर्ग अब देश छोडकर सुरक्षित देशों में पनाह लेने लगे हैं…
पाकिस्तान में फैली अराजकता तथा चरमपंथियों की मजबूत होती पकड़ ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान आतंकवादियों के देश के रूप में बना दी है. पिछले महीने ह्यूमन राईटस द्वारा जारी एक रिपोर्ट में साफ लब्जों में कहा गया है कि ‘पूरे पाकिस्तान में चरमपंथी गुटों को अपनी गतिविधियां अंजाम देने की खुली छूट हासिल है. कानून लागू करने वाली एजेंसियों और अफसरों ने या तो अपनी आंखें बंद कर रखी हैं या हमलों को रोक पाने में लाचार हो गए हैं.
अब तो इस बात के भी कयास लगाए जाने लगे हैं कि कहीं इराक के फलूजा तथा सीरियाई शहरों की तरह आतंकी संगठन कराची जैसे बड़े नगरों पर अपना कब्जा न जमा बैठें. इन परिस्थितियों में सवाल यह उठता है कि देश की निर्वाचित नवाज शरीफ सरकार क्या तालिबानों व अन्य आतंकवादी संगठनों की बढ़ती हुई ताकत को रोक पाने के लिए कोई बड़ा कदम उठाने की स्थिति में है? अथवा सेना अध्यक्ष राहिल शरीफ सेना के गिरते मनोबल को बचाने तथा चरमपंथियों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पाक सत्ता को एक बार फिर सैन्य नियंत्रण में लेने का काम करेंगे?
पाकिस्तान में छुटपुट हत्याओं का सिलसिला कई दशकों से जारी है, लेकिन पिछले दिनों न केवल हिंसक वारदातों में तेजी आई है बल्कि यहाँ सक्रिय सुन्नी चरमपंथी गुटों तथा तालिबानों ने जिस प्रकार के निशाने साधने शुरू किए हैं,उससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि इन हिंसक शक्तियों का मकसद वहाँ अराजकता का वातावरण पैदा कर देश को गृहयुद्ध की स्थिति में डालना तथा खूनी संघर्ष से सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करना है.
यानी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति नजीब से जिस ढंग से तालिबानों ने पहली बार सत्ता छीनी थी, उसी की पुनरावृत्ति यह शक्तियां पाकिस्तान में भी करना चाह रही हैं. यही वजह है कि अब पाक स्थित तालिबानों ने चुन-चुन कर फौजी ठिकानों, सुरक्षा चौकियों तथा सुरक्षा जवानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. सुन्नी चरमपंथी गुटों द्वारा शिया समुदाय की लक्षित सामूहिक हत्याएं की जाने लगी हैं.
इन हिंसक कार्रवाईयों को अंजाम देने के लिए आतंकवादी संगठनों ने बड़े पैमाने पर फिदाईन अथवा आत्मघाती हमलावरों की भर्ती की है. 21 जनवरी को ब्लूचिस्तान में क्वेटा शहर के समीप शिया समुदाय के 29 लोगों को उस समय मार दिया गया, जबकि वे एक बस में यात्रा कर रहे थे. विस्फोटक से लदी हुए एक कार ने जिसे एक फिदायीन हमलावर चला रहा था, कार से उस बस को टक्कर मार दी. ठीक उसी समय कराची में शिया समुदाय के तीन लोगों को गोली मारकर हलाक कर दिया गया.
इसी तरह 22 जनवरी को 12 सुरक्षाकर्मी अलग-अलग घटनाओं में मारे गए. 19 जनवरी को खैबर पतूनखवाह प्रांत के बन्नु क्षेत्र में सैन्य छावनी पर हुए हमले में 22 जवान हलाक हो गए. इस हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान ने ली. पाक स्थित तहरीक-ए-तालिबान के प्रवक्ता शाहिदुल्ला शाहिद ने कहा कि यह कार्रवाई मौलाना वलीउर्रहमान की मौत का बदला है. सेना हमारी दुश्मन है और ऐसे हमले हम भविष्य में भी करते रहेंगे.
अब पाकिस्तान में रेल ट्रैक उड़ाने का काम भी आतंकवादियों ने शुरू कर दिया है. पिछले दिनों जिला राजपुर के कोटला हसनशाह क्षेत्र में एक रेल लाईन को धमाके से उड़ा दिया गया. उसके बाद एक ट्रेन पटरी से नीचे उतर गई, जिसमें तीन लोग मारे गए जबकि 25 घायल हो गए. धर्मस्थलों व धार्मिक जुलूसों तथा भीड़ भरे बाजारों में फिदायीन हमले करना या बम विस्फोट के द्वारा बेगुनाह लोगों की हत्याएं करना तो गोया इन चरमपंथियों के लिए आम बात होकर रह गई हैं.
और तो और विश्वव्यापी स्तर पर पोलियो जैसे मर्ज को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए चलाए जाने वाले अभियान को भी यह अनपढ़ चरमपंथी संदेह की नजरों से देखते हैं. इन्हें इसमें भी अमेरिका की साजिश नजर आती है. पिछले दिनों इन मानवता विरोधियों ने पोलियोकर्मियों पर कई हमले किए, जिसमें महिलाए व बच्चे मारे गए. पिछले दो वर्षों के दौरान पोलियो अभियान में लगे 30 लोगों की पाकिस्तान में हत्या की जा चुकी है.
इन घटनाओं से दुखी होकर पोलियो अभियान को आर्थिक सहायता पहुंचाने वाले प्रमुख उद्योगपति बिल गेटस ने पाक में पोलियो अभियान को आर्थिक सहायता रोकने संबंधी संकेत दिए हैं. जाहिर है पाकिस्तान के बद से बदतर होते जा रहे ऐसे हालात सेना को संभवतः अब और अधिक समय तक मूकदर्शक बने रहने नहीं देंगे.
हालांकि पिछले दिनों सेना पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान ने तालिबानी ठिकानों पर हवाई हमले कर 40 आतंकवादियों को मारने का दावा भी किया है. परंतु देश में निर्वाचित सरकार होने के चलते पाक सेना स्वतंत्र रूप से सैन्य कार्रवाई कर पाने में फिलहाल सक्षम नहीं है. उधर पाक में लोगों की बेचौनी इस हद तक बढ़ती जा रही है कि बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी को भी पिछले दिनों साफतौर पर यह कहना पड़ा कि इनके खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की जरूरत है. बिलावल ने कहा है कि पाकिस्तान का चेहरा ओसामा बिन लादेन या वह आतंकवादी नहीं हो सकते जो रोज हजारों जाने लेते हैं. उनके बजाए पाकिस्तान के चेहरे वे होने चाहिएं जो इनके खिलाफ खड़े हैं और देश को उम्मीद बंधाते हैं.
प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सत्ता में आते ही तालिबान से बातचीत करने की जो पेशकश की थी, उस पर दो कदम आगे बढ़ने की कोशिश करते हुए पिछले दिनों एक चार सदस्यीय वार्ताकार समिति बनाए जाने की घोषणा की है. इस समिति में पाकिस्तान के दो वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्ला युसुफ जई तथा इरफान सिद्दीकी को शामिल किया गया है, जबकि एक पूर्व राजदूत रूस्तम शाह मोहम्मद व आईएसआई के सेवानिवृत मेजर आमिर शाह को रखा गया है. यह वार्ताकार समिति तालिबान से बातचीत कर गृहमंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.
इन हालात में सवाल यह उठता है कि नवाज शरीफ द्वारा इस चार सदस्यीय वार्तकार समिति के गठन के बाद क्या तालिबानी व अन्य चरमपंथी संगठनों के हमलों में कोई कमी आने वाली है? क्या तालिबानी ताकतें जोकि चरमपंथ व हिंसा के मार्ग पर इस कद्र आगे बढ़ने के बाद वे नवाज शरीफ के वार्तालाप जैसे उदारवादी प्रस्ताव को गंभीरता से लेने की कोशिश करेंगी?
सवाल यह भी है कि पाकिस्तानी सेना तालिबानी हमलों में आए दिन मारे जा रहे अपने जवानों के बावजूद अब भी नवाज शरीफ सरकार के निर्देशों की प्रतीक्षा करती रहेगी? क्या पाक सेना के आलाअधिकारी अपने जवानों के मनोबल को गिरता हुआ इसी तरह देखते रहेंगे? इन सबसे बड़ी बात यह है कि क्या पाकिस्तान की शरीफ सरकार और जनरल राहिल शरीफ को इस बात का भी अंदाजा है कि निर्वाचित सरकार तथा सेना में भी किस हद तक चरमपंथियों की घुसपैठ हो चुकी है?
पाकिस्तान में फौजी एयरबेस पर हो चुके हमले तथा गवर्नर सलमान तासीर की हत्या से आखिर पाकिस्तान के नीति निर्धारकों को क्या सबक हासिल हो रहा है? क्या यह घटनाएं इस बात का सुबूत नहीं हैं कि चरमपंथी ताकतें पाकिस्तान के हर क्षेत्र में अपनी घुसपैठ मजबूत कर चुकी हैं? यहां तक कि राष्ट्रीय असेंबली में उनकी हमदर्दी में आवाज उठाने वाली ताकतें पहुंच चुकी हैं? सेना में भी कट्टरपंथी विचारधारा रखने वाले कर्मचारी व अधिकारी उनके हिमायती बने हुए हैं?
इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि शरीफ सरकार इन तालिबानी ताकतों से दहशतजदा है. संभवतः यही वजह है कि नवाज शरीफ ने सत्ता में आते ही तालिबान से बातचीत करने की जो पेशकश की थी, उस पर अमल करने का वे अब तक कोई साहस नहीं कर पाए. न ही अब तक किसी शांतिवार्ता संबंधी प्रतिनिधिमंडल की घोषणा की. मगर अब जबकि आतंकवादियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि उन्होंने सेना को ही अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया तथा सीधे तौर पर सेना को चुनौती देनी शुरू कर दी है, तब नवाज शरीफ ने अपनी आंखें खोली हैं. कुछ दिन पहले ही उन्होंने चार सदस्यीय वार्ताकार समिति की घोषणा की है?
नवाज शरीफ की इस वार्ताकार समिति की घोषणा के बाद यह कयास भी लगाये जा रहे हैं कि सेना के रुख को भांपते हुए ही शरीफ ने वार्ता का निर्णय लिया. जाहिर है सेना अपने जवानों की बड़े पैमाने पर हो रही हत्याओं और सुरक्षा ठिकानों, चौकियों, छावनियों व सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों पर होने वाले आतंकवादी हमलों के बाद अपने जवानों के मनोबल को अब और अधिक गिरता हुआ देखने के मूड में नहीं है. वह भी तब परवेज मुशर्रफ के शासन में लाल मस्जिद में सेना ऑपरेशन करने का साहस जुटा चुकी है.