‘गधे’ को पसन्द नहीं ‘गधा’ कहलाना

9 months ago ब्रजेश कुमार सिंह Comments Off on ‘गधे’ को पसन्द नहीं ‘गधा’ कहलाना

अखिलेश जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं आप और सत्ता टिकाये रखने की चुनौती है आपके सामने. चुनाव में पार्टी की नैया पार लगानी है, तो वोट चाहे जैसे मिले, लेने तो पड़ेंगे ही. ऐसे में भला अमिताभ बच्चन के बहाने पीएम मोदी पर हमला करने के लिए गधे ही काम आ जाएं, तो क्या बुरा.

लेकिन टीपू जी, आपको ये पता नहीं कि ये गधे भी अपने को गधा कहलाना पसंद नहीं करते, जैसा आपने मान लिया है. गुजरात के लोग भी कच्छ के छोटे रन्न के खास निवासी के तौर पर पहचान रखने वाले इन जीवों को गधा नहीं, घुडखर के तौर पर संबोधित करते हैं. घुडखर यानी गधे और घोड़े के बीच का जीव. घोड़े जैसे लक्षण भी हैं इन घुडखरों में, सामान्य गदहों से उलट हवा में बात करते हैं ये. कच्छ के छोटे रन्न में जब ये दौड़ते हैं, तो इनकी रफ्तार 50 किलोमीटर से लेकर 70 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच जाती है, कुछ वैसी ही रफ्तार, जैसी आपके यहां की सड़कों पर आम तौर पर कारों की होती है.रिकॉर्ड के लिए बता दूं कि जिन्हें आप गधा कहकर अमिताभ बच्चन से अपील कर रहे हैं कि वो गदहों का प्रचार नहीं करें, वो आपके प्रदेश के गदहों या फिर गुजरात के भी सामान्य गदहों से अलग हैं. गुजरात में ये घुडखर, जिन्हें अग्रेजी में वाइल्ड एस कह दिया जाता है, सामान्य गदहों के करीब जाते तक नहीं है, बल्कि अपनी दुनिया में ही रहते हैं.

जिस तरह से एशियाई सिंह पूरी दुनिया में इस समय अकेले गुजरात के गीर के जंगलों में ही प्राकृतिक तौर पर बचे हुए हैं, वैसे ही घुड़खर भी पूरी दुनिया में सिर्फ कच्छ के छोटे रन्न में ही बच गये हैं, जो गुजरात के कच्छ और सुरेंद्रनगर जिले का वो हिस्सा है, जो नमकीन दलदल का इलाका है. आपकी जानकारी के लिए इन घुड़खरों की कुल ताताद महज तीन हजार के करीब है, जो कच्छ के छोटे रन्न के करीब पांच हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके में ही सिमटे हुए हैं. आप इन्हें देखने के लिए कभी गुजरात नहीं आए, इसलिए इनकी सामान्य उंचाई और लंबाई भी बता देता हूं. करीब 210 सेंटीमीटर लंबा होता है एक सामान्य घुडखर और करीब सौ-सवा सौ सेंटीमीटर उंचा. जहां तक वजन का सवाल है, दो सौ से ढाई सौ किलोग्राम वजन होता है इनका.

चूंकि इनकी संख्या काफी कम है और इनके लुप्त हो जाने का खतरा है, इसलिए इनको बचाने के लिए ही गुजरात में उस इलाके को, जहां ये रहते हैं, घुडखर यानी वाइल्ड एस सैंक्चुअरी का दर्जा दे दिया गया है. करीब पांच हजार वर्ग किलोमीटर का ये इलाका मोटे तौर पर कच्छ और सुरेंद्रनगर जिले का है, लेकिन कुछ-कुछ हिस्सा इसके अंदर पाटण, बनासकांठा और राजकोट जिले का भी है.

धरती पर इन सुंदर प्राणियों का अस्तित्व बना रहे, इसलिए इन्हें भारतीय वन्य पशु संरक्षण कानून 1972 के तहत शेड्यूल 1 प्राणी की श्रेणी में रखा गया है यानी वो प्राणी, जो लुप्त होने के बिल्कुल कगार पर हैं और इन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए.

अगर अमिताभ बच्चन ने इनके बारे में दुनिया को खूशबू गुजरात की कैंपेन के जरिये बताया, तो आपको भला इसमें बुरा क्यों लग रहा है. जिस कांग्रेस के साथ उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए आपकी दोस्ती हुई है और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ आप लगातार संयुक्त तौर पर रोड शो कर रहे हैं, उसी कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए जब केंद्र में सत्ता में थी, तो वर्ष 2013 में इन्हीं खास घुडखरों पर डाक टिकट जारी किया गया था, जिन्हें आप गधे के तौर पर संबोधित कर अमिताभ और मोदी दोनों पर निशाना साध रहे हैं.

आपकी जानकारी में इजाफा करने के लिए बता दूं कि बिग बी ने वर्ष 2010 में गुजरात टूरिज्म के लिए खूशबू गुजरात की नाम से कैंपेन शूट किया था. अगले तीन वर्षों यानी 2013 तक ये सिलसिला चला, जिसके आखिरी चरण में उन्होंने घुडखरों पर फिल्म बनाई. खूशबू गुजरात की सीरिज के तहत अभी तक कुल 22 फिल्में बनी हैं, जिनमें से महज एक फिल्म घुडखरों पर है. यूपीए शासन के दौरान ही वर्ष 2011-12 में खूशबू गुजरात की सीरिज को बेस्ट टूरिज्म फिल्म का अवार्ड भी मिला था.

कभी आपके राज्य के ब्रांड एंबेसडर भी रहे अमिताभ बच्चन ने अपने कैंपेन के जरिये गुजरात में पर्यटन को काफी बढ़ावा दिया है. अगर आंकड़ों के हिसाब से बात करें, तो कैंपेन लांच होने के पहले यानी वर्ष 2010-11 में जहां गुजरात में दो करोड़ से भी कम पर्यटक आते थे वो आंकड़ा अब करीब दोगुना हो गया है. वर्ष 2015-16 के जो आंकड़े मौजूद हैं, उसके हिसाब से करीब 383 लाख पर्यटक गुजरात आए. घुडखरों वाली ये फिल्म भी पिछले दो वर्ष से टीवी पर देखाई जा रही है गुजरात टूरिज्म के प्रचार अभियान के तहत.

आपने एशियाई मूल के सिंह गुजरात से मंगाये थे अपने इटावा के सफारी पार्क के लिए. कभी आपके उत्तर प्रदेश में भी हजारों की तादाद में सिंह हुआ करते थे, लेकिन उत्तर प्रदेश उन्हें बचा नहीं पाया, जैसे आप इटावा के सिंहो को नहीं बचा पा रहे हैं. गुजरात को कम से कम आपको इस बात के लिए यश देना ही चाहिए कि वो सिंह की तरह घुडखरों को भी बचा पाया है, जो पूरी दुनिया में गुजरात के अलावा कही नहीं है. ऐसे में अभी तो नहीं, लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद गुजरात जरूर आइएगा, सिंह नहीं, बल्कि उन घुडखरों को देखने के लिए, जिनकी खूबियों को टीवी के पर्दे पर बताते हैं महानायक. और अगर आप राजनीतिक कारणों से गुजरात आने का मन न बना पाएं, तो सफारी के लिए ही सही, एक दो घुडखरों को उत्तर प्रदेश में बुला तो लीजिएगा ही.