यूपी को मिलेगा दो टूक जनादेश?

7 months ago हरि शंकर व्यास Comments Off on यूपी को मिलेगा दो टूक जनादेश?

यदि मतदान रिकार्ड तोड़ है तो जनादेश धुंधला नहीं हो सकता। त्रिशंकु विधानसभा नहीं होगी। इसलिए कि माहौल में जब इरादा, जोश-जज्बा या गुस्सा होता है तभी ज्यादा मतदाता वोट डालने की लाईन में लगते है। यों अधिक मतदान को ले कर कुछ पुराने कारण भी है। मगर उनमें अपना मानना है कि 2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव के साथ वे कारण लगभग खत्म है। मतदाता लिस्ट से फर्जी मतदाता पहले ही लगभग छंट चुके हैं। पहले कुल वोटों की लिस्ट में फर्जी नाम बहुत होते थे। वे कटने शुरू हुए तो उससे सौ में साठ, सत्तर या अस्सी प्रतिशत वोट पड़ने का आंकड़ा बनने लगा। ताजा चुनाव क्योंकि 2012 के विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव की बैकग्राउंड में है इसलिए फर्जी मतदाताओं के कटने से मतदान अधिक होने की थीसिस अब पहले जैसी तुक वाली नहीं है। यदि सन 2012 या 2014 के मुकाबले एक-दो या तीन-चार प्रतिशत भी मतदान अधिक है तो वह बहुत बड़ी बात है। उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा इन सबमें 2012 व 2014 में भी जोश जब पीक पर था तो उसके बराबर या उससे भी ज्यादा वोटिंग की खबर है तो इससे झलकता मौजूदा जोश कमाल की बात है। उस सूरत में भंग विधानसभा का सवाल नहीं उठता। सभी राज्यों में मतदाताओं का जनादेश दो टूक होगा। पूर्ण बहुमत की सरकारे बनेगी।

अब यहां एक थ्योरी है कि जिन राज्यों में आमने-सामने की लड़ाई है वहां किसी एक पार्टी के पूर्ण बहुमत के आसार बनते है। जैसे उत्तराखंड में कांग्रेस बनाम भाजपा में सीधा मुकाबला है तो एक पार्टी को बहुमत मिलेगा। लेकिन पंजाब, गोवा और उत्तरप्रदेश में तिकोना-चौकोना मुकाबला है तो घिचपिच नतीजे आएंगे। जोड़-तोड़ से सरकार बनेगी। जैसे उत्तरप्रदेश में अजितसिंह और उनकी लोकदल ने गड़बड़ की है तो बसपा और समाजवादी-कांग्रेस एलायंस में मुस्लिम वोट बंटेगे। ऐसे ही गोवा में भाजपा, कांग्रेस के अलावा आप पार्टी और एमजीपी-शिवसेना के एलायंस की चौकोनी लड़ाई में एकतरफा नतीजे नहीं आ सकते। गोवा में भी ईसाई-मुस्लिम वोटों को ले कर कंफ्यूजन है। भाजपा के मनोहर पर्रिकर का पूरा दांव ईसाई वोटों की उम्मीद पर है। पर उसमें कांग्रेस और आप पार्टी के सैंध लगने का भी खतरा है। दूसरी और एमजीपी-शिवसेना-भाजपा-संघ के बागियों का एलायंस हिंदू वोटों को यदि एक-दो प्रतिशत भी तोड़ गई तो सभी तरफ उलटफेर के आधार है। मतलब हंग विधानसभा आने का कंफ्यूजन दमदार है। दो टूक जीत-हार नहीं होगी। पार्टियों को जोड़-तोड़ कर सरकार बनानी पड़ेगी।

लगभग इसी लाइन पर पंजाब के चुनाव को ले कर भी अनुमान है। कांग्रेस बनाम आप बनाम भाजपा-अकाली एलायंस में वोट बंटने के ऐसे अनुमान है कि कईयों का मानना है कि किसी एक पार्टी का बहुमत नहीं बनेगा। भंग विधानसभा आएगी और जोड़ तोड़ से सरकार बनेगी।
अपन इन सब बातों को फालतू मानते है। सभी राज्यों में रिकार्ड मतदान का ट्रेंड है तो अर्थ है कि लोगों ने मन बनाया हुआ है। अब इस बात के साथ पत्रकार, मीडियाकर्मी, सर्वेक्षक, जानकार, राजनीतिबाज यह थ्योरी लिए हुए है कि मन जांत-पांत से बना हुआ है और जांत-पांत में क्योंकि बहुत विभाजन है सो उसके कारण त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर बनती है। अपनी दलील है कि जांत-पांत का ही यदि नंबर एक फेक्टर हो तो रिकार्ड मतदान नहीं होता। अपना मानना है कि 55-60 प्रतिशत या इससे अधिक का मतदान जात-पात से उठा हुआ होता है। जातियों में गोलबंदी कितनी ही हो लेकिन उससे भी आगे लोगों के जहन में कुछ पका होता है जिससे वोट पड़ते हैं। जातिय गोलबंदी सामान्य मतदान लिए होती है। उससे भी अधिक वोट पड़ा तो मतलब होगा कि कोई ऐसा फेक्टर काम कर रहा है जो जात से ऊपर का है। जैसे बिहार को लेकर अपनी थीसिस थी कि लालू यादव और नीतीश कुमार-कांग्रेस का एलायंस बना तो उसमें जातिय समीकरण का फेक्टर याकि गणित अपनी जगह थी मगर इसके साथ नीतीश कुमार के प्रति आम मानस में पुण्यता याकि बतौर मुख्यमंत्री उनके काम के प्रति पोजिटिव सोच लोगों में थी जिससे गणित के साथ केमेस्ट्री बनी। नतीजतन भारी मतदान हुआ नतीजा दो टूक बहुमत का आया।

इसलिए रिकार्ड मतदान जात-पात से ऊपर उठे किसी के प्रति नकारात्मक या सकारात्मक सोच का फेक्टर लिए होता है। जो अंततः मतदान पेटी से किसी पार्टी या नेता के पक्ष में दो टूक जनादेश निकलवाती है।

पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के चारों राज्यों में मतदान की बुनावट और उसके ट्रेंड से अपने को यह दो टूक झलक रहा है कि जात-पात की बिसात के बीच दर्शक याकि मतदाता अपने मन में भावनात्मक राय बनाए हुए है। सवाल है कौन सा मुद्दा है जो चारों राज्यों में लोगों को सोचने के लिए मजबूर करने वाला रहा होगा? एक कॉमन फेक्टर नरेंद्र मोदी और उनकी नोटबंदी का है। फिर उसके नीचे प्रदेश के चेहरे, प्रदेश के मुद्दे, प्रदेश की राजनीति और जातियों की गोलबंदी है।

अब यहां सोचने वाली बात है कि क्या नरेंद्र मोदी और उनकी नोटबंदी इतना बडा फेक्टर है जिसमें प्रदेश के चेहरे, मुद्दे और लोगों के अनुभव भुला दिए जाए या फिर उलटा है? मतलब उत्तराखंड या गोवा में जो हुआ, पंजाब में लोगों का जो लोकल अनुभव रहा उससे लोगों की याददाश्त ने नरेंद्र मोदी और नोटबंदी को कोने में फेंके रखा?

अपने को जो दिख रहा है उस अनुसार नरेंद्र मोदी-नोटबंदी के लोगों को अनुभव और प्रदेश के लोकल फेक्टर इस चुनाव में एक और एक ग्यारह की तस्वीर बना रहे हैं और इससे नतीजे भारी उलटफेर वाले होंगे। मतलब रिकार्ड मतदान के साथ दो टूक बहुमत वाला जनादेश। तब सवाल है कि रिकार्ड मतदान के साथ आंधी, भारी बहुमत का जो शौर सुनाई देना था वह क्यों नहीं है?