आखिर हार गया गठबंधन

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– इन्द्रजीत सिंह
उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव सपा ने अखिलेश यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ा. यूपी की सभी 403 सीटों के रुझानों में पार्टी 50 सीटों का आकंड़ा भी नहीं छू पाई है. वहीं केंद्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी ने बहुमत के आंकड़े को 325 सीटें जीतकर पीछे छोड़ दिया. इस प्रकार चुनाव पूर्व हुआ सपा-कांग्रेस का गठबंधन बुरी तरह हार गया। आपको बताते है कि यूपी में समाजवादी पार्टी की संभावित हार के पांच प्रमुख कारण-

1. पार्टी और परिवार में दो फाड़ः
यूपी विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की संभावित हार का प्रमुख कारण पार्टी में दो फाड़ होना रहा. जहां एक तरफ पार्टी के संस्थापक मुलायाम सिंह यादव प्रदेश सपा अध्यक्ष और अपने भाई शिवपाल यादव व सपा के वरिष्ठ नेता अमर सिंह के साथ खड़े दिखे, वहीं सपा के थिंक टैंक प्रो.रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और राजेंद्र चौधरी जैसे नेता अखिलेश खेमे में नजर आए. इस विवाद में आजम खान जैसे सीनियर नेता हर समय दोनों खेमों के बीच सुलह का काम करते दिखे. आखिरकार चुनाव आयोग को तय करना पड़ा कि असली समाजवादी पार्टी कौन सी है और इसमें अखिलेश की जीत तो हुई लेकिन पार्टी के कैडर और जनता के बीच इसका गलत संदेश पहुंचा.

2. कमजोर संगठनः
पार्टी में दो फोड़ होने के बाद अखिलेश ने विधायकों की संख्या के दम पर पिता और चाचा से पार्टी का प्रतिनिधित्व तो ले लिया, लेकिन प्रचार के दौरान संगठन के रूप में सपा काफी कमजोर नजर आई. सपा-कांग्रेस गठबंधन होने से पार्टी के कई पुराने नेताओं के टिकट कटे जिससे पार्टी का बड़ा कैडर अखिलेश खेमे से अलग हो गया. हर जगह पार्टी के प्रचार के लिए अखिलेश और डिंपल ही प्रचार का प्रमुख चेहरा रहे. मुलायम सिंह यादव जसवंतनगर सीट पर शिवपाल के लिए वोट मांगने के लिए पहुंचे और लखनऊ कैंट सीट से बहू अपर्णा के लिए प्रचार में शामिल हुए. बाकि 296 सीटों पर सपा अखिलेश के भरोसे थी. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि मुलायम सिंह और शिवपाल यादव जैसे बड़े नेताओं के जाने से समाजवादी पार्टी के कैडर ने सामने आकर नहीं भीतर से अखिलेश खेमे पर वार किया है. वहीं अमर सिंह जैसे नेता के जाने से भी समाजवादी पार्टी ने प्रचार में एक बड़े चेहरे को खोया. वैसे भी अखिलेश खेमे के नरेश अग्रवाल ये कह चुके है कि हम नतीजों के बाद सपा के उन लोगों का नाम बताएंगे जिन्होंने इन चुनावों में अखिलेश को हराने का काम किया है.
3. कांग्रेस से गठबंधनः

यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में समाजवादी पार्टी का कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन करना बड़ी चूक साबित हुआ. गठबंधन के मुताबिक सपा ने 298 और कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा. गठबंधन से पहले कांग्रेस पार्टी ये नारा दे रही थी कि ‘27 साल यूपी बेहाल’. उसी पार्टी से गठबंधन करने पर पार्टी कैडर को गलत संदेश गया. जहां पिछली बार पार्टी अपने दम पर ही बहुमत से कहीं ज्यादा सीटें लेकर आई थी वहीं इस बार उसने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके उसे 100 से ज्यादा सीटे दे दी. जिससे सपा के कई प्रत्याशियों के टिकट कटे. शुरुआती दिनों में सपा का ये कदम बीजेपी विरोध को बंटने नहीं देने के लिए एक सराहनीय कदम लग रहा था. लेकिन कांग्रेस के साथ जाने का परिणाम ये हुआ कि दो लोग सपा को विकल्प के रूप में देख रहे थे वो बीजेपी के साथ गए. हालांकि पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने इसके लिए अखिलेश यादव को पहले ही आगह कर दिया था.
4. यूपी में खराब कानून-व्यवस्थाः

2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो मुलायम सिंह ने अपनी जगह अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनवाया. अखिलेश ने सपा की गुंडों की पार्टी वाली छवि को सुधारने की पूरी कोशिश करते हुए दागी नेताओं से दूरी बनाए रखी, अखिलेश ने ऐसे लोगों को न तो सरकार में जगह दी, न ही पार्टी में. लेकिन कई बार मुलायम सिंह और शिवपाल के हस्तक्षेप के चलते उन्हें अपने फैसले वापस लेने पड़े. नतीजा ये रहा कि यूपी में कानून-व्यवस्था की हालत लगातार खराब होती रही. यूपी में सांप्रदायिक हिंसा, रेप और लूटपाट की वारदातों में भी इजाफा हुआ. राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था ने अखिलेश के विकास कार्यों को भी घूमिल करने का काम किया.
5. पारंपरिक वोट बैंक का खिसकनाः

मुलायम सिंह के अध्यक्ष रहने तक समाजवादी पार्टी से पिछड़ा और मुस्लिम वोटर जुड़ा रहा. अखिलेश के अध्यक्ष बनने और सपा के अंतर कलह के चलते कहीं न कहीं पिछड़े और गरीब तबके ने अखिलेश में अपना नेतृत्व नहीं देखा. वहीं सपा का पारंपरिक वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समाज इस बार के सपा के कार्यकाल से खासा नाराज दिखा. उसका एक बड़ा कारण है कि अखिलेश राज में यूपी में 200 से ज्यादा जगहों पर सांप्रदायिक दंगे हुए. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने सपा के बैकवर्ड वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी का काम करते हुए, शाक्य, मौर्य, लोध, यादव, गुर्जर और जाट नेताओं को आगे किया. प्रदेश बीजेपी की कमान केशव प्रसाद मौर्य को सौंपी तो वहीं पश्चिमी यूपी में संजीव बालियान, हुकुम सिंह जैसे नेताओं को पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का काम सौंपा. स्वामी प्रसाद मौर्य, उमा भारती, केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के चलते पिछड़े वर्ग का बड़ा वोट बैंक सपा के हिस्से से खिसक कर बीजेपी को गया.