ईवीएम पर बवाल क्यों?

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Tastylia Tadalafil Oral Strips Buy 20 MG Without Prescription असल में हारी हुई पार्टियां और उसके नेता अपनी जिम्मेदारी से बचने और अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ रहे हैं। सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बुरी तरह से हारने के बाद इनके नेताओं पर सवाल उठ रहे हैं, उनकी काबिलियत का आकलन किया जा रहा है, इसलिए उन्होंने अपने ऊपर से फोकस हटाने के लिए ठीकरा ईवीएम की गड़बड़ी पर फोड़ दिया है…

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follow url – अजीत कुमार

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http://tjez.gob.mx/perdakosis/5620 इस काम में सोशल मीडिया उनका साथ दे रहा है। हकीकत से ज्यादा झूठे सच्चे आंकड़ों के जरिए यह समझाया जा रहा है कि अमुक बूथ पर जितने वोट पड़े, उससे ज्यादा वोट तीनों पार्टियों को मिले हैं। यह साबित करने का प्रयास हो रहा है कि चुनाव आयोग ने जितने प्रतिशत वोटिंग का आंकड़ा दिया है, गिनती में उससे ज्यादा वोट सामने आए हैं। इसके लिए पार्टियां बूथ स्तर के आंकड़े जुटा रही हैं और पेपर ट्रेल से उनका मिलान कर रही हैं। परंतु यह सोशल मीडिया के प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं है।

click here असल में हारी हुई पार्टियां और उसके नेता अपनी जिम्मेदारी से बचने और अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ रहे हैं। सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बुरी तरह से हारने के बाद इनके नेताओं पर सवाल उठ रहे हैं, उनकी काबिलियत का आकलन किया जा रहा है, उनके रणनीतिक फैसलों की समीक्षा हो रही है और आगे की रणनीति में उनकी भूमिका को लेकर चिंता जाहिर की जा रही है। इसलिए उन्होंने अपने ऊपर से फोकस हटाने के लिए ठीकरा ईवीएम की गड़बड़ी पर फोड़ दिया है। जैसे जैसे लोग चुनाव नतीजों को भूलेंगे, वैसे वैसे यह विवाद भी ठंडा पड़ जाएगा। यह अब तक का इतिहास रहा है कि हारने वाली पार्टियां ईवीएम को जिम्मेदारी ठहराती रही हैं। पहले जब बैलेट पेपर से चुनाव होते थे, तब उसमें भी हारने वाले गड़बड़ी के आरोप लगाते थे। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद ने कहा था कि बक्से में से जिन्न निकलेगा। जब वे गिनती में भारी बहुमत से जीत गए तो विपक्षी पार्टियों ने जिन्न निकलने के उनके बयान को आधार बना कर आरोप लगाया था कि बक्से बदल दिए गए थे। इसी तरह 1971 के लोकसभा चुनाव के बाद उस समय की जनसंघ के नेता बलराज मधोक ने अदृश्य स्याही के इस्तेमाल का आरोप लगाया था और कहा था कि इंदिरा गांधी ने यह स्याही सोवियत संघ से मंगाई थी और बैलेट पेपर पर पहले ही कांग्रेस के आगे मुहर लगा दी गई थी। ऐसे ही 2009 का चुनाव जब कांग्रेस जीती तो भाजपा के नेता और प्रवक्ता जीवीएल नरसिंह राव ने एक पूरी किताब इस पर लिख दी कि कैसे ईवीएम हैक किए जा सकते हैं और उनसे चुनाव नतीजों को बदला जा सकता है। उस समय इसका मकसद तब के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी पर से ध्यान हटाने का था। हैरानी नहीं है कि इस किताब की भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी है। आंध्र प्रदेश में लगातार दो चुनाव हारे चंद्रबाबू नायडू ने भी 2010 में रिलीज हुई इस किताब पर अपनी टिप्पणी लिखी।

http://highschool.isq.edu.mx/cr45/3846/assets/js/8974 सो, ईवीएम की गड़बड़ी के आरोप हारे हुए नेताओं के प्रलाप के अलावा कुछ नहीं हैं। अरविंद केजरीवाल और अजय माकन ने नगर निगम चुनाव से पहले यह मुद्दा उठा कर अपने कार्यकर्ताओं को और निराश कर दिया है। दोनों को पता है कि दिल्ली में चुनाव की घोषणा के बाद आयोग ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर से चुनाव नहीं कराएगा। फिर भी दोनों ने यह मांग करके चुनाव बाद के लिए अपनी पोजिशनिंग की है। अगर हार गए तो फिर इसका ठीकरा ईवीएम पर फोड़ देंगे। कार्यकर्ता भी इस बात को समझ रहे हैं। पांच राज्यों के चुनाव के बाद जो नेता ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं, वे वोट के आंकड़ों को भी ध्यान से देखने की जहमत नहीं उठा रहे हैं। अगर ईवीएम फिक्स किए जाते तो नतीजे वैसे नहीं होते, जैसे आए हैं। मिसाल के तौर पर गोवा और मणिपुर में पॉपुलर वोट भाजपा को ज्यादा मिले हैं। गोवा में तो कांग्रेस से चार फीसदी ज्यादा वोट भाजपा को मिले हैं, लेकिन सीटें कम हैं। उसके मुख्यमंत्री और छह मंत्री चुनाव हार गए।

http://backyardgardensjoseph.com/?bioener=dating-chinese-culture&f05=a2 उत्तर प्रदेश में भी बसपा को पिछले लोकसभा और विधानसभा दोनों के मुकाबले ज्यादा वोट आए हैं। कांग्रेस 2012 में तीन सौ से ज्यादा सीट लड़ कर साढ़े सात फीसदी वोट लाई थी और इस बार 105 सीट लड़ कर उसे 6.2 फीसदी वोट मिले हैं। सो, नतीजे कुल मिला कर वोटों के बिखराव को दिखाते हैं। अगर बिहार जैसी एकजुटता होती तो नतीजे अलग होते। इसके अलावा यह मानने का भी कोई कारण नहीं है कि ईवीएम से छेड़छाड़ हो सकती है। सारे ईवीएम अलग ईकाई होते हैं और वे इंटरनेट से भी जुड़े नहीं होते हैं। इसलिए अगर किसी को हैक करना है तो उसे हर ईवीएम को अलग अलग हैक करना होगा। एक साथ सारे ईवीएम हैक नहीं हो सकते हैं। एक चुनाव में लाखों की संख्या में ईवीएम इस्तेमाल होते हैं। बिना किसी की नजर में आए इनमें गड़बड़ी करना लगभग असंभव है। इसके अलावा इस्तेमाल से पहले पोलिंग बूथ पर हर पार्टी का पोलिंग एजेंट अपनी अपनी पार्टी का बटन दबा कर चेक करता है कि वोटिंग ठीक से हो रही है। ऐसे ही अब वीवीपीटी यानी पेपर ट्रेल की एक अलग यूनिट इसमें जोड़ दी गई है, जिससे मतदाता को वहीं पर परची मिल जाती है, जिस पर लिखा होता है कि उसने किसको वोट दिया। ईवीएम का चुनाव भी रैंडम होता है यानी कौन सा ईवीएम कहां के चुनाव में इस्तेमाल होगा, यह किसी को पता नहीं होता है। सबसे ऊपर यह कारण है कि ईवीएम आने के बाद भी सत्तारूढ़ पार्टियां हारती रही हैं। अगर ईवीएम फिक्स होते तो कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी नहीं हारती।