एक योगी का ‘राजतिलक’

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see url बीजेपी ने जाति समीकरण को भी साधने का काम किया है. आदित्यनाथ ठाकुर हैं और दो नए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं. वहीं, लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा ब्राह्मण हैं. जाति गठबंधन की राजनीति से बीजेपी 2019 के चुनाव में फतह हासिल कर सकती है…

http://www.banmark.fi/?aftepatius=app-para-conocer-gente-de-todo-el-mundo&66a=49 हमेशा अपने सुरक्षा गॉर्ड से घिरे रहने वाले 44 वर्षीय योगी आदित्यनाथ देश के राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री होंगे. उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड बहुमत से जीत दर्ज करने के बाद भाजपा ने आदित्यनाथ को कमान देकर हिंदुत्व कार्ड को चर्मोत्कर्ष पर पहुंचाने का प्रयास किया है. इसके लिए योगी आदित्यनाथ सही मुखौटा हैं. योगी को यूपी की सत्ता देने का निर्णय लिए जाने के बाद, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि योगी मोदी के मंत्र ‘सबका साथ-सबका विकास’ के साथ कितना न्याय करेंगे, यह देखने वाली बात होगी. हालांकि उनके समर्थक पहले से ही ‘देश में मोदी-प्रदेश में योगी’ की बात दोहराते रहे हैं. गढ़वाल विश्वविद्यालाय से विज्ञान में स्नातक योगी आदित्यनाथ पांच बार से गोरखपुर से सांसद हैं लेकिन उन्हें प्रशासकीय अनुभव नहीं है. हालांकि योगी दो बार केंद्र सरकार में मंत्री रहे हैं.

get link कई मायनों में, आदित्यनाथ की ताजपोशी की तुलना नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने वाले समय के जी रही है. उस समय बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के सामने मोदी को मुख्यमंत्री बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था. बाद में बीजेपी को मोदी को 2014 के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए बाध्य होना पड़ा था. हालांकि, लालकृष्ण अडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता मोदी के पक्ष में नहीं थे.

http://www.tentaclefilms.com/?yutie=demo-iq-option&7e5=81 माना जा रहा है कि आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के रूप में हिंदुत्व के मुद्दे को केंद्र में लाएंगे. यही शायद सबसे बड़ा कारण उनके चयन का भी रहा क्योंकि संघ परिवार ‘हिंदू समाज’ में किसी भी विभाजन पर सावधान रहेगा. ‘हिंदुत्व वोट’ जाति व्यवस्था को भी ध्वस्त करेगा और बीजेपी के ऐतिहासिक जनादेश को सुरक्षित रखेगा जिसे बीजेपी हर हाल में अपने साथ बनाए रखना चाहेगी. योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में चयन के क्या मायने हैं? हालांकि इसके ठोस कारण अभी तक सामने नहीं आए हैं. कैंपेन के दौरान भी योगी आदित्यनाथ अपनी फायरब्रांड इमेज से बाहर नहीं निकले.

here हालांकि यूपी चुनाव में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा था. इस विधानसभा में पिछले 25 वर्षों मे सबसे कम मुस्लिम विधायक हैं. पूरे प्रदेश में मुस्लिम आबादी कुल आबादी का 18 प्रतिशत है. आदित्यनाथ ‘लव जिहाद’ और ‘तुष्टिकरण’ जैसे विवादास्पद मुद्दों को भी हवा देते रहे हैं.

http://www.backclinicinc.com/?jixer=forex-trading&a82=eb प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी की जनता से विकास का वादा किया है. विकास का कौनसा स्वरूप आदित्यनाथ देंगे? क्या वह बिजली, सड़क, पानी पर फोकस करेंगे जिसकी आवश्यकता इस समय सबके लिए है या फिर वे ‘मंदिर’ की राजनीति चुनेंगे? उत्तर प्रदेश में नौकरी और आर्थिक पिछड़े वर्ग को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है. राजनीतिक पर्यवेक्षक आदित्यनाथ की विकास की राजनीति को लेकर सशंकित है.
उत्तर प्रदेश संघ के ‘हिंदुत्व’ एजेंडे के लिए गुजरात के पहले से मूल ‘प्रयोगशाला’ रहा है और 2019 में मोदी की जीत के लिए अहम कुंजी है. योगी आदित्यनाथ हमेशा ही ‘अपनी’ करते रहे हैं और केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनका तालमेल अच्छा नहीं रहा. मजेदार बात यह है कि कैपेंन के दौरान बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक हेलीकॉप्टर दिया था और पहली बार उन्होंने अपने पूर्वांचल से बाहर निकलकर प्रचार किया. इसके बावजूद भी, उनके अपने संगठन हिंदू युवा वाहिनी ने उन्हें सीएम बनाने के लिए मांग ही नहीं की बल्कि कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतारे. आदित्यनाथ ने उन्हें किसी तरह मनाया.

annonces rencontres seniors gratuites बीजेपी ने जाति समीकरण को भी साधने का काम किया है. आदित्यनाथ ठाकुर हैं और दो नए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं. वहीं, लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा ब्राह्मण हैं. जाति गठबंधन की राजनीति से बीजेपी 2019 के चुनाव में फतह हासिल कर सकती है.
इस तरह से योगी आदित्यनाथ का ‘राजतिलक’ करके पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के युग में बीजेपी का फुलप्रूफ मेकओवर करने का प्रयास किया गया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि 2019 के चुनाव में महज दो साल का समय बचा है. ऐसे में विकास को थोड़ा परे रखकर बीजेपी अपने पुराने मुद्दे पर वापस लौट सकती है.

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