कुशल सेनापति की तरह नेतृत्व करते हैं ‘मोदी’

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देश में इस समय सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वस्त नेता नरेन्द्र मोदी ही हैं। सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदीय जनता ने उनके हर निर्णय को शिरोधार्य किया है। मोदी हर संघर्ष में सेनापति की तरह आगे रहकर नेतृत्व करते हैं। अमित शाह का संगठन कौशल और रणनीतिक सूझबूझ भी निर्विवाद है…

– विजय कुमार

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों ने बता दिया है कि देश में इस समय सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वस्त नेता नरेन्द्र मोदी ही हैं। सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदीय जनता ने उनके हर निर्णय को शिरोधार्य किया है। मोदी हर संघर्ष में सेनापति की तरह आगे रहकर नेतृत्व करते हैं। अमित शाह का संगठन कौशल और रणनीतिक सूझबूझ भी निर्विवाद है। कांग्रेस में कैप्टेन अमरिंदर सिंह जनाधार वाले नेता, जबकि राहुल बाबा एक बार फिर पप्पू सिद्ध हुए हैं। अखिलेश और मायावती को जो चोट लगी है, उसे वे कभी नहीं भूल सकेंगे। केजरीवाल का बड़बोलापन काम नहीं आया। चुनावी विशेषज्ञ प्रशांत किशोर का प्रबंध धरा रह गया। बादल परिवार का भ्रष्टाचार पंजाब में भाजपा को भी ले डूबा।

1. उत्तर प्रदेश- उ.प्र. के चुनावों पर देश ही नहीं, दुनिया भर की निगाह थी। कहते हैं कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाता है। निःसंदेह उ.प्र. ने 2019 के लिए मोदी का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। जहां तक अखिलेश की बात है, वह अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे थे। परिवार में हुआ झगड़ा स्वाभाविक हो या प्रायोजितय पर अमरीका में बैठकर उनकी रणनीति बनाने वाले फेल हो गये हैं। घरेलू झगड़ा और राहुल का साथ, दोनों कदम आत्मघाती सिद्ध हुए। शिवपाल ने भी अखिलेश को हराने में पूरा जोर लगाया। अब शिवपाल का अलग समाजवादी दल भी शीघ्र ही देखने को मिल सकता है।

अखिलेश ने हार तो तभी मान ली थी, जब उन्होंने राहुल से हाथ मिलाया था। वे यह नहीं समझ सके कि कांग्रेस डूबती नाव है और राहुल बेकार कप्तान। फिर भी उन्होंने गठबंधन किया। यद्यपि इससे उन्हें लाभ ही हुआ। गठबंधन के बिना अखिलेश की सीट इससे भी आधी रह जातीं और कांग्रेस साफ हो जाती। अखिलेश और राहुल को शायद यह समझ आ गया होगा कि लोग उनके चेहरे देखकर मन बहलाने तो आते हैं, पर वोट नहीं देते। अब बसपा की बात करें। मायावती का जातीय समीकरण कागजों पर तो बहुत अच्छा था, पर वह जमीन पर नहीं उतर सका। नोटबंदी से उन्हें भारी नुकसान हुआ। चुनाव के लिए रखे अरबों रुपये एक ही रात में रद्दी हो गये। अतः उनका चुनाव अभियान फीका रहा। यद्यपि नुकसान सपा को भी हुआ, पर सत्ता ने इसकी भरपाई कर दी। अब बसपा में विद्रोह और टूट की पूरी संभावना है। मायावती का राजनीतिक भविष्य भी अब समाप्त सा लगता है।

जहां तक भाजपा की बात है, तो उनका पूरा अभियान मोदी केन्द्रित था और उसकी कमान सीधे अमित शाह के हाथ में थी। यद्यपि बिहार का ऐसा ही अभियान सफल नहीं हुआ था। उससे मोदी और अमित शाह ने काफी कुछ सीखा होगा। फिर बिहार और उ.प्र. की परिस्थिति अलग है। भाजपा ने बड़े जातीय समूहों की बजाय छोटे समूहों को साथ लिया। इससे उसे लाभ हुआ। प्रदेश में मुस्लिम वोटबैंक का मिथक भी टूटा है। मुस्लिम महिलाओं ने भी चुपचाप भाजपा का साथ दिया है। इससे औरतों को पैर की जूती समझने वाले मजहबी नेताओं को नानी याद आ गयी है। लगता है देश अब जाति, मजहब और वंशवादी राजनीति के कोढ़ से उबर रहा है।

2. पंजाब- उ.प्र. की तरह पंजाब भी एक बड़ा राज्य है। वहां बादल परिवार दस साल से सत्ता में था। भाजपा की भूमिका वहां छोटे सहयोगी की थी। इस बार माहौल बादल परिवार के विरुद्ध था। इससे कांग्रेस को लाभ हुआ, पर यह जीत वस्तुतः अमरिंदर सिंह की जीत है। यद्यपि राहुल ने उन्हें खूब अपमानित किया। फिर भी वे पार्टी में बने रहे। अंततः उन्हें ही चुनाव की कमान सौंपी गयी। सत्ता विरोध का लाभ ‘आप’ को भी हुआ। एक समय तो मीडिया उसे विजेता कह रहा था, पर उसकी जीत बहुत दुखद होती। क्योंकि उसकी पीठ पर देश और विदेश में बैठे खालिस्तानियों का हाथ है। सीमावर्ती राज्य में उस जैसी अराजक पार्टी का शासन बहुत खतरनाक सिद्ध हो सकता था। इस नाते वहां कांग्रेस की जीत ठीक ही है।

भाजपा को शुरू से ही बादल विरोधी रुझान दिख रहा था। फिर भी उसने साथ नहीं छोड़ा। इसके दो कारण हैं। एक तो दोनों का साथ पुराना है। दूसरा भाजपा वहां शहरी हिन्दुओं की पार्टी है, तो अकाली ग्रामीण सिखों की। दोनों का मेल वहां सामाजिक सद्भाव का समीकरण बनाता है। इसे बचाने के लिए निश्चित हार का खतरा उठाकर भी भाजपा अकालियों के संग रही। यदि भाजपा महाराष्ट्र की तरह वहां भी अलग से सब सीटों पर लड़ती, तो सबसे आगे रहती। लोगों को मोदी और भाजपा पर विश्वास है, पर बादल परिवार के बोझ ने नाव डुबो दी। अब भाजपा को चाहिए कि वह ग्रामीण सिखों में से नेतृत्व ढूंढकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये। इससे अगले सभी चुनावों में उसे सफलता मिलेगी।

3. उत्तराखंड- उत्तराखंड में भाजपा को दो तिहाई स्थान मिले हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत दोनों जगह से चुनाव हार गये हैं। उनका अहंकार और भ्रष्टाचार पूरी पार्टी को ले डूबा। साल भर पहले भाजपा ने सत्ता पाने के लिए पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में जाल बिछाया था, पर बात नहीं बनी। इस बार भाजपा ने उन सब विद्रोहियों को भी टिकट दिया था। भाजपा को गढ़वाल, कुमाऊं, तराई और मैदान, सब तरफ जीत मिली है।
4. गोवा- गोवा में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। भाजपा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर और कई मंत्री भी हार गये हैं। इसमें भाजपा से नाराज स्वयंसेवकों की भी बड़ी भूमिका है। अर्थात आग घर के चिराग से ही लगी है।

5. मणिपुर- मणिपुर में भाजपा के पास खोने को कुछ नहीं था। इसलिए उसे जो मिला, वह ठीक ही है। भाजपा काफी तेजी से ईसाई और जनजातीय प्रभाव वाले पूर्वोत्तर भारत में आगे बढ़ रही है। इसमें संघ द्वारा संचालित सेवा कार्यों का बड़ा योगदान है। साथ ही असम के पुराने कांग्रेसी और वर्तमान भाजपा नेता हेमंत बिस्व शर्मा की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। कुल मिलाकर इन चुनावों ने भाजपा का प्रभाव और मोदी का कद बढ़ाया है। होली के इस केसरी रंग से सभी देशप्रेमी हर्षित हैं।