पंजाब में कांग्रेस नहीं अमरिदंर जीते

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here पंजाब की जीत असल में कैप्टन अमरिंदर सिंह की निजी जीत है। और जो लोग इस तथ्य को नहीं स्वीकारते, उनके लिए सवाल है कि क्या राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस, कैप्टन के बिना पंजाब जीत पाती…?

see url – निरंजन परिहार

dating rotten ecards जो लोग मान रहे हैं कि पंजाब में कांग्रेस की जीत हुई है, वे सही नहीं है। न ही यह बात सही है कि राहुल गांधी के युवा नेतृत्व की वजह से पंजाब का युवा कांग्रेस से जुड़ा। दरअसल, पंजाब के पूरे चुनाव में न तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के परंपरागत ढांचे के मुताबिक चुनाव लड़ा और न ही वे राहुल गांधी की मेहरबानियों के मोहताज रहे। दिखने में भले ही यह कांग्रेस की जीत है, और कैप्टन भी इसे पंजाब की जनता की जीत बताकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं। लेकिन असल में पंजाब में जीता कौन ? क्या राहुल गांधी जीते, या कांग्रेस की जीत हुई या फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह ?

follow site यह सबसे बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए, क्योंकि अगर यह कांग्रेस की जीत है, तो फिर यूपी में तो कांग्रेस ने सबसे ज्यादा मेहनत की थी और राहुल गांधी ने वहां पर खटिया भी बिछाई। लेकिन फिर भी यूपी में कांग्रेस का सफाया हो गया और यूपी का युवा राहुल गांधी की खटिया खड़ी करके चला गया। असल बात यह है कि पंजाब की जीत असल में कैप्टन अमरिंदर सिंह की निजी जीत है। और जो लोग इस तथ्य को नहीं स्वीकारते, उनके लिए सवाल है कि क्या राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस, कैप्टन के बिना पंजाब जीत पाती ?

Congelamento ghirlandavi disingannato enter site site de rencontre gratuit non payant francais bekanntschaften detmold हालांकि पंजाब में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मजीठा रैली में सीएम के तौर पर अमरिंदर सिंह के नाम का ऐलान कर दिया था। और वैसे भी, अपने राजनीतिक कद के नाते प्रदेश कांग्रेस के मुखिया अमरिंदर इस पद से सहज दावेदार भी थे। लेकिन पंजाब में सन 2007 से लगातार दस साल तक सत्ता में रही बादल सरकार के प्रति आम लोगों में जो बहुत गुस्सा था। अमरिंदर सिंह इस गुस्से को, पिछले पांच साल से वोटों में बदलने की कोशिश कर रहे थे। इसके लिए वे हर पल हर प्रयास करते रहे, और इस गुस्से को हवा से बदल कर आंधी में उन्हीं ने तब्दील करके लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को मजबूती दी। यह वह चुनाव था, जब पूरे देश में 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर थी, लेकिन पंजाब में लोगों ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली तक को अमृतसर में चारों खाने चित कर दिया था।

http://tripleinfo.net/viposiw/pioer/2072 वह अमरिंदर सिंह ही थे, जिन्होंने पंजाब में अपने को जनता का सबसे विश्वसनीय नेता साबित करके लोकसभा में भी मजबूत किया, और फिर वहां से इस्तीफा देकर पंजाब की राजनीति में और मजबूत होकर उभरे। इस सबके बीच अमरिंदर सिंह ने सबसे महत्वपूर्ण एक काम यह भी किया कि देश भर में राजनीतिक रूप से लगातार फेल होते राहुल गांधी के नेतृत्व में कमजोर होती कांग्रेस के प्रति जो प्रचार हो रहा था, उसके असर को पंजाब में प्रसारित होने से रोकने में वे कामयाब रहे। नतीजा अगर कांग्रेस के पक्ष में गया तो इसका मतलब साफ है कि इस बार पंजाब के लोगों ने अमरिंदर सिंह पर भरोसा दिखाया है।

viagra viagra online pharmacy सबने देखा है कि सन 2012 के विधानसभा चुनावों में भी पंजाब में कांग्रेस जीत के बहुत करीब आकर भी अटक गई थी। कांग्रेस ने वह चुनाव किसी को भी आगे करके नहीं लड़ा था। लेकिन इस बार के चुनाव में यूपी में जैसे बीजेपी नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे, उसी तरह पंजाब में कांग्रेस नहीं बल्कि कैप्टन चुनाव लड़ रहे थे और उन्हीं की इज्जत दांव पर लगी थी। अमरिंदर सिंह को पता था कि पंजाब के चुनाव को कांग्रेस के नेतृत्व के निर्देशन में परंपरागत तरीकों से लड़ा गया तो बाजी सीधे सीधे हाथ से निकल सकती है। इसीलिए न तो वहां उन्होंने राहुल गांधी से भारी भरकम फीस वसूलकर कांग्रेस के रणनीतिकार बने प्रशांत किशोर तो कोई तवज्जो दी और न ही दिल्ली दरबार के लोगों की सलाह को। यहां तक कि पंजाब की स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमेन राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत, कांग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी और नीरज डांगी जैसे धुरंधर केंद्रीय पर्यवेक्षक भी पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के निर्देशक और मार्गदर्शक नहीं बल्कि सहयोगी के रूप में ही देखे गए। और, यह भी कैप्टन की ताकत का ही कमाल था कि नवजोत सिंह सिद्धू के बारे में राहुल गांधी द्वारा सब कुछ तय कर लिए जाने के बावजूद सिद्धू को तब तक इंतजार करना पड़ा जब तक कि अमरिंदर सिंह ने संकेत नहीं दिए। इस पूरे चुनाव को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने हाथ में लिया, और पंजाब के मामले में कांग्रेस से हर तरह की पूरी छूट ली और किसी का कोई बड़ा हस्तक्षेप नहीं स्वीकारा।
दरअसल, अब जब जनादेश मिल गया है, तो यह कहा जाना चाहिए कि 75 साल के कैप्टन अमरिंदर सिंह पर पंजाब के लोगों ने एक बार फिर नए सिरे से भरोसा किया है। पंजाब के किसानों के बीच भी वे बहुत लोकप्रिय हैं और कट्टरपंथी सिखों में भी उनकी छवि एक नेक इंसान की है। वहां के सिखों में कैप्टन की जबरदस्त पैठ है तो वहां के हिंदू भी उन्हें बहुत पसंद करते हैं। कैप्टन को खासकर इसी का फायदा मिला। मगर अब, जब सब कुछ तय हो गया है कि पंजाब में जीत अमरिंदर सिंह की हुई है और उनकी क्षमताओं पर सवार होकर ही कांग्रेस भारी बहुमत से जीती है। तो, लगे हाथ आपसे यह सवाल भी पूछ लेने का मन करता है कि अगर राहुल गांधी और प्रशांत किशोर को अगर पंजाब सौंप दिया होता, तो नतीजा क्या होता ? जवाब में आपको यूपी याद आ रहा हैं क्या ?

http://www.techhelpnumbers.com/font/1686 (लेखक: वरिष्ठ पत्रकार हैं)