आडवाणी, जोशी और मोदी

12 months ago Editor 0

आखिर जब भारत सरकार, उसकी एजेंसी सीबीआई की अपील है कि साजिश थी, मुकद्दमा चलना चाहिए तो देश की सर्वोच्च अदालत कैसे कह दे कि यह फालतू बात है कि अयोध्या में मस्जिद ढ़ांचा बिना साजिश के ढ़हा। साजिश के साक्ष्य सच्चे है या झूठे, यह तो अभी निचली अदालत को देखना है। सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो उसका फर्ज है…

~ हरि शंकर व्यास

लालकृष्ण आडवाणी, डा. मुरली मनोहर जोशी क्या आज आहत, व्यथित, गुस्साए नहीं होंगे? पर इनके आहत होने, गुस्सा होने का भला मतलब भी क्या है? लालकृष्ण आडवाणी मन ही मन उस वक्त को कोस रहे होंगे जब पालमपुर की भाजपा बैठक में उन्होंने राममंदिर आंदोलन का संकल्प, प्रस्ताव बनाया था। वह विचार, वह क्षण साजिश की बुनावट लिए हुए था। साजिश मतलब यह सोचना कि ऐसा करेंगे तो हिंदू जागेगा! भाजपा राज में आएगी! भाजपा को दो सांसदों की औकात से बाहर निकालने के लिए आडवाणी का सियासी-साजिशी दिमाग जैसा-जो उस वक्त चला तो परिणाम आज का भारत है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की सत्ता है। हिंदूओं का, योगी आदित्यनाथ की भगवा ध्वजा का लहराना है। वह जून 1989 की बात थी। लालकृष्ण आडवाणी ने तब पालमपुर की भाजपा बैठक में हुंकारा मारा था मंदिर वही बनाना है। उसके बाद जो हुआ तो वह वक्त से था। न आडवाणी के रोडमैप से कुछ हुआ और न उन्हंे वह मिला जो चाहा। पाप-पुण्य के योग में उनका आज जो उत्तरार्द्ध है वह इतना दारूण, इतने अश्रु लिए हुए है कि कल्पना नहीं कर सकते। क्योंकि मैं निजी तौर पर आडवाणी, डा. जोशी को बारीकि से जानता-समझता हूं इसलिए अपना मानना था, है और रहेगा कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह को कम से कम इतना तो करना था कि उनकी जब सीबीआई है तो सुप्रीम कोर्ट में खम टोंक, दो टूक स्टेंड लेना था कि साजिश की बात फालतू। मुकद्दमे लायक साक्ष्य नहीं। जब स्वामी असीमानंद, प्रज्ञा भारती के लिए जांच एजेंसी एनआईए स्टेंड बदल सकती है, जांच-सबूत देख नए सिरे से निर्णय पर पहुंच सकती है तो सीबीआई ऐसा क्यों नहीं कर सकती? 6 दिसंबर 1992 के दिन भी अपना मानना था और आज भी है कि अयोघ्या में उस दिन बाबरी मसजिद का ध्वंस स्वंयस्फूर्त हिंदू ज्वालमुखी से था। बाद में कईयों ने साजिश की थीसिसे दी लेकिन हकीकत में उस दिन आडवाणी, संघ और भाजपा सब लुटेपीटे थे। इसलिए कि रोडमैप वह नहीं था जिस अनुसार आगे राजनीति होनी थी।

जो हो, पते की बात यह है कि सीबीआई जब दस तरह की निर्लज्जताओं में, सरकारी तोते की तरह काम करती रही है तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के होते हुए आडवाणी, डा. जोशी, उमा भारती आदि पर मुकद्दमा चलाने की जिद्द क्यों किए रही? उसकी जिद्द थी तभी सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना पड़ा। अदालत को दोषी नहीं दे सकते। सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो उसका फर्ज है। आखिर जब भारत सरकार, उसकी एजेंसी सीबीआई की अपील है कि साजिश थी, मुकद्दमा चलना चाहिए तो देश की सर्वोच्च अदालत कैसे कह दे कि यह फालतू बात है कि अयोध्या में मस्जिद ढ़ांचा बिना साजिश के ढ़हा। साजिश के साक्ष्य सच्चे है या झूठे, यह तो अभी निचली अदालत को देखना है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार और भाजपा से जो-जैसी प्रतिक्रिया आई है उसका लबोलुआब है कि सालों से, दशकों से यह मामला चल रहा था तो नई बात क्या? मुकद्दमा चलना है तो चले। उमा भारती पहले भी मंत्री थी आज भी मंत्री है। कल्याणसिंह अभी राज्यपाल है सो अदालत ने कहा ही है कि जब वे राज्यपाल पद से रिटायर हो तब उन पर आरोप तय हो। इस लीक में तब यह थ्योरी भी बनती है कि मुकद्दमा शुरू हुआ, आरोप तय हुए तो आरोपी दागी नहीं कहलाएगें। मतलब लालकृष्ण आडवाणी और डा. मुरली मनोहर जोशी के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बनने के अभी भी अवसर है। कहने को कुछ भी कहे, कुछ भी सोचंे, हकीकत में बुढे लालकृष्ण आडवाणी की दारूण दशा आज और गहराई। डा मुरली मनोहर जोशी क्योंकि उतने टूटे हुए नहीं है इसलिए वे कोर्ट के आदेश अनुसार यूपी की कोर्ट विशेष में दो साल अदालती चक्कर, मुकद्दमा लड़ने के वंदोबस्तों का निर्वहन कर सकते है। जैसा उमा भारती ने कहां वैसे यह उन्हे भी संतोष हो सकता है कि राममंदिर के लिए मुकदमा लड़ रहे हैं, जेल जाने को तैयार है तो यह उनके उतरार्द्ध में भी त्याग। उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस स्थिति में बहुत बड़ी कृपा का यह मौका बनता है कि दागी और आपराधिक मुकद्दमें के बावजूद आडवाणी या डा. जोशी को संवैधानिक पद पर बैठाए।

अपन तो चाहेंगे कि नरेंद्र मोदी अहसान चुकाए। कृतज्ञ बने न कि कृतध्न! सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने आज फिर घटनाओं का वह क्रम सामने है कि कैसे 1984 के बाद दो सांसदों को ले कर लालकृष्ण आडवाणी के संसद भवन के पतले गरियारे में वे अपना दफ्तर बना कर कमल खिलाने की उधेड़बुन में रहा करते थे। उनसे और उनके संसदीय दफ्तर संभालते राजेंद्र शर्मा से मुझे खूब जानने-समझने को तब मिला करता था! संदेह नहीं कि बाद में एक काले क्षण में, काली जुबान और सुधींद्र कुलकर्णी की काली संगत में जिन्ना को ले कर वे बुद्दी फिरा गए। और करीबियों की ही जिद्द में 2012-13 में नरेंद्र मोदी की संभावनाएं नहीं बूझी। पर लालकृष्ण आडवाणी, डा. मुरलीमनोहर जोशी के पाए यदि नहीं होते, इन्होंने आगे नहीं बढाया होता तो न भाजपा आज वाले मुकाम पर होती और न नरेंद्र मोदी आज प्रधानमंत्री पद पर बने होते। यदि आडवाणी का वीटो नहीं होता तो मोदी का न केवल मुख्यमंत्री पद जा रहा था बल्कि फिर एजेंसियों-कोर्ट-कचहरी में वह हुआ होता जिसकी कल्पना रोंगटे खड़े कर सकती है। इसलिए नरेंद्र मोदी के वक्त में आडवाणी बुढ़ापे की दारूण अवस्था के बीच मुकद्दमा लड़े, 2 साल लगातार सुनवाई में पेशी पर जाए तो अपने को तो अच्छा नहीं लगेगा। बहुत बुरा होगा। सो अपन तो चाहेंगे कि जब अंहकार है, सत्ता भरपूर है तो हर्ज नहीं कि मुकद्दमा चले तो चले, आडवाणी या डा. जोशी को गुरूदक्षिणा दे। उनका मान बढ़ेगा और ये भी तहेदिल दुआ देंगे। देखना है मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसा रूप दिखाते हैं!