नक्सलियों को करना होगा नेस्तनाबूद

1 year ago Editor 0

here आज बस्तर की फिजां में महुए की खुशबू की जगह खून और बारूद की गंध ने ले ली है। बस्तर के कथित माओवादी जनवादी प्रकृति के सिधान्त्कारों को इंसानी खून का चस्का लग गया है। वे किशोर उम्र के युवक-युवतियों को हिंसक खतरनाक खेल खेलने के लिए अपने गिरोह में शामिल कर अपनी ढाल बनाते जा रहे हैं …

segnali opzioni binarie marketts ~ प्रणय विक्रम सिंह

billiga Sildenafil Citrate tabletter छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुई नक्सली वारदात में 25 जवानों की शहादत से पूरा देश स्तब्ध है। खून से लथपथ निष्प्राण देह के चित्र मन को व्यथित कर रहे हैं। दरअसल यह भारतीय गणराज्य के खिलाफ नक्सलियों के हथियारबंद संघर्ष का ऐलान है। आखिर, एक राज्य में दूसरा राज्य या देश में दो समानांतर सेनाओं जैसी बात को कैसे स्वीकारा जा सकता है। उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज ने अपनी एक मशहूर गजल में कहा था ‘खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद…’ शायद छत्तीसगढ़ भी यही पूछ रहा है। लेकिन जवाब देने के लिए कौन है? जबकि चहुंओर मरघट की निस्तब्ध शांति पसरी हुई है!

source url आज बस्तर की फिजां में महुए की खुशबू की जगह खून और बारूद की गंध ने ले ली है। बस्तर के कथित माओवादी जनवादी प्रकृति के सिद्धांतकारों को इंसानी खून का चस्का लग गया है। वे किशोर उम्र के युवक-युवतियों को हिंसक खतरनाक खेल खेलने के लिए अपने गिरोह में शामिल कर अपनी ढाल बनाते जा रहे हैं। बस्तर के आदिवासियों का पुश्तैनी चरित्र एक बड़े षड्यंत्र के द्वारा हिंसा के सांचे में ढाला जा रहा है। एक-दो पीढ़ी के बाद ऐसी आदिवासी हिंसा पर सरकार का नियंत्रण ढीला होता जायेगा। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने को लेकर केवल गाल बजाने के कारण समस्या बद से बदतर होती जा रही है।

source पिछले 5 साल में नक्सली हिंसा की 5960 घटनाएं हुई हैं। इनमें 1221 नागरिक, 455 सुरक्षाकर्मी और 581 नक्सली मारे गए हैं। नोटबंदी के बाद माना जा रहा था कि नक्सलियों की कमर टूट गई है, लेकिन सुकमा की घटना ने एक बार फिर नक्सल हिंसा को सुलगा दिया है। गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार साल 2012 से 2017 तक नक्सली हिंसा के चलते देश में 91 टेलीफोन एक्सचेंज और टावर को निशाना बनाया गया तो 23 स्कूलों को भी नक्सलियों की बर्बरता झेलनी पड़ी। फोर्स पर हुए इन ताजा हमलों से केवल उसकी नाकामियों की कहानी नहीं लिखी जा सकती। सच ये है कि आज फोर्स भी नक्सलियों की पैठ वाले ऐसे इलाकों में घुस चुकी है और बहुत से इलाकों पर तो अपना कब्जा भी हासिल कर चुकी है, जहां कभी सरकार के प्रतीक के तौर पर केवल प्रदूषित पानी फेंकते हैण्डपम्प ही हुआ करते थे। पर सच ये है, कि हिंसा थम नहीं रही। दरअसल नाकामियों के सवाल उठाते समय फोर्स की चुनौतियां, उसकी परेशानियां, उसकी सीमाएं सब कुछ सामने होती हैं, लेकिन ये मामला कब तक सिर्फ फोर्स का ही होकर रहेगा?

viagra purchase usa रणनीतिक चुनौतियों और नाकामियों को संबोधित करने के लिए इस देश के पास विशेषज्ञों से लेकर संसाधनों तक किसी भी चीज की कमी नहीं है, फिर भी बस्तर की पारदर्शी जिन्दगी खून के धब्बों से लथपथ है। इसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही पर भी चर्चा होनी आवश्यक है। सच ये है कि अगर मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सैन्य रणनीति पर और अधिक मजबूती की जरूरत है, तो असैन्य मोर्चे को भी संबोधित करना उतना ही जरूरी है। जिस समय जवानों के शव अंतिम संस्कार के लिए देहरी पर रखे हों, उस समय सिवाय बारूदी जवाब के और कुछ नहीं सूझता, लेकिन लोकतंत्र को तो एक बहुत लम्बी लड़ाई लडनी है। सुरक्षाबलों पर हो रहे हमलों की बुनियाद पर क्या नक्सलियों को अपराजेय मान लिया जाये? क्या मौजूदा सुरक्षा तंत्र की समार्थ्य को नक्सली पहचान चुके हैं?

http://caboclonharaue.com/?kreosan=op%C3%A7%C3%B5es-binarias-pdf&b37=b7 भारतीय सुरक्षा बलों के बाजू नक्सलियों के आजमाये हुये हैं। आज जो हालात बने हैं उन्हें देख कर ये लगता है, कि ज्यों-ज्यों मर्ज बढ़ता गया, तो आने वाले समय में ये कहना पड़ेगा कि ये मर्ज ला-इलाज है, इसकी दवा न काजिये। तो फिर इसका इलाज क्या है?

http://www.castleimmobiliare.it/?buisews=formazione-trading-azioni-opzioni-milano&6d2=e6 हमें समझने की आवश्यकता है कि नक्सल-माओवाद मसले का हमेशा से एक राजनीतिक कोण रहा है। लेकिन गृह मंत्रालय अपनी समन्वित कार्रवाईय बेहतर खुफिया प्रबंधन, केंद्रीय बलों में टीथ-टू-टेल अनुपात सुधार कर और राजनीतिक पहल के जरिये उग्रवाद की पहुंच व प्रभाव को कम कर सकता है। इसके साथ, गृह मंत्रालय को अंतर्राज्यीय परिषद और क्षेत्रीय परिषदों को पुनर्सक्रिय करना होगा, खुफिया एजेंसियों को जीवंत-सक्रिय करना, सुरक्षा अभियानों में तकनीक का भरपूर सहयोग करना, अपराध न्याय प्रणाली में सुधार और पुलिस सुधार जैसे काम अरसे से अटके पड़े हैं।

https://mummiesclub.co.uk/bilbord/816 अब तक ज्यादातर मामलों में वारदात के बाद ही कार्रवाई होती रही है, लेकिन ये सच्चाई कि अगर अपनी पुलिस को वारदात के पहले इंटेलिजेंस की सही जानकारी मिल जाये, पुलिस की सही लीडरशिप हो और राजनीतिक सपोर्ट हो तो आतंकवाद पर हर हाल में काबू पाया जा सकता है। सीधी पुलिस कार्रवाई में कई बार एक्शन में सफलता के बाद पुलिस को पापड़ बेलने पड़ते हैं और मानवाधिकार आयोग वगैरह के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

http://sumarplant.ro/franciye/4037 पंजाब में आतंकवाद के खात्मे में सीधी पुलिस कार्रवाई का बड़ा योगदान है, लेकिन अब सुनने में आ रहा है कि राजनीतिक कारणों से उस दौर के आतंकवादी लोग हीरो के रूप में सम्मानित किये जा रहे हैं जबकि पुलिस वाले मानवाधिकार के चक्कर काट रहे हैं। इसी तरह की एक घटना उत्तर प्रदेश की भी है। बिहार में पांव जमा लेने के बाद माओवादियों और अन्य नक्सलवादी संगठनों ने उत्तर प्रदेश को निशाना बनाया तो मिर्जापुर से काम शुरू किया। लेकिन वहां उन दिनों एक ऐसा पुलिस अफसर था जिसने अपने मातहतों को प्रेरित किया और नक्सलवाद को शुरू होने से पहले ही दफन करने की योजना बनायी। बताते हैं कि राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह से जब आतंकवाद की दस्तक के बारे में बताया गया तो उन्होंने वाराणसी के आईजी से कहा कि ‘आप संविधान के अनुसार अपना काम कीजिये, मैं आपको पूरी राजनीतिक बैकिंग दूंगा।’ नक्सलवादियों के किसी ठिकाने का जब पुलिस को पता लगा तो उसने इलाके के लोगों को भरोसे में लेकर खुले आम हमला बोल दिया। दिन भर इनकाउंटर चला, कुछ लोग मारे गए। इलाके के लोग सब कुछ देखते रहे लेकिन आतंकवादियों को सरकार की मंशा का पता चल गया और उतर प्रदेश में नक्सली आतंकवाद की शुरुआत ही नहीं हो पायी। हां, ये भी सच है कि बाद में मिर्जापुर के मडिहान में हुई इस वारदात की हर तरह से जांच कराई गयी। आठ साल तक चली जांच के बाद एक्शन में शामिल पुलिस वालों को जांच से निजात मिली लेकिन ये भी तय है कि सही राजनीतिक और पुलिस लीडरशिप के कारण दिग्भ्रमित नक्सली आतंकवादी काबू में किये जा सके। इस लड़ाई का राजनीतिक-प्रशासनिक और सामाजिक-आर्थिक मोर्चा भी इतना ही मजबूत होना चाहिए।

http://www.goodlight.it/?bioreresd=deposito-minimo-per-iq-option&d7c=d5 इस बात से इंकार नहीं है कि नक्सलवाद घने जंगलों, संवैधानिक नकार, आदिवासी दब्बूपन, प्रशासनिक नादिरशाही, कॉरपोरेट जगत की लूट, राजनीतिक दृष्टिदोष और स्थानीय पुलिस की नासमझ बर्बरता का संयुक्त प्रतिफल है, लेकिन खून का स्वाद चख चुके नक्सली भेडियों को चिडियाघर के पिंजडे़ में बंद करना या उन्हें बेजान-बेरूह मांस के लोथड़े में तब्दील करना अब समय की प्राथमिक आवश्यकता है। साभार