लाल बत्ती तो गई पर लाल सिस्टम कब जायेगा?

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binary options wikipedia Dopo aver sciorinato questi bei numeri, che certamente l'Istat ha fornito per primo al Governo, ci si chiede: भारत राष्ट्र-राज्य में सड़के कभी लालबत्ती मुक्त नहीं हो सकती। सड़क पर मंत्री-संतरी नए तरीके से सत्ता खनकाएंगे। सो मोदीजी, देश यदि बदलना है तो उस सिस्टम को बदलिए जो माईबाप है। उसकी लाल स्याही, कलम को खत्म कीजिए तभी सच्चा जनतंत्र खिलेगा!

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opcje binarne rozliczanie एक मई से देश में लाल बत्ती नहीं दिखलाई देगी! अच्छी बात है। सड़क को सत्ता की लाल खनक से मुक्त कराने की पहल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साधूवाद! यदि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे ही और सत्ता का अंहकार खत्म कराए, राजा और प्रजा, नेता और जनता, अफसर और आमजन का फर्क खत्म करें तो यह उन तमाम कामों से बड़ा काम होगा जिनके पिछले तीन साल में वे नारे लगवा रहे है। इसलिए कि आजाद भारत की समस्या उसका सिस्टम है। वह सिस्टम जो हाकिम की हुकुमत की लाल स्याही है। वही उसे लालबत्ती मुहैया कराता है। यदि ऐसा न होता तो न तो भारत में भ्रष्टाचार होता और न ही भारत पिछड़ा हुआ रहता। पंडित जवाहरलाल नेहरू से ले कर नरेंद्र मोदी सभी की राज प्रवृतियों का मूल संकट हम हिंदूओं की यह तासीर है कि हम राजा को भगवान का अवतार मानते हैं। राजा, नृप होने का मतलब विशेष है, पूजनीय है! तब उसकी आरती उतारेंगे, पालकी सजाएंगे और लालबत्ती दिखाते हुए उसे सड़क पार करवाएंगे। हाथी, घोड़ा, पालकी जय हाकिम लाल की। मुझे किसी भी रिफरेंस में यह पढ़ने को नहीं मिला कि औपनिवेशिक काल में चर्चिल लंदन की सड़कों में लालबत्ती में घूमते थे। अंग्रेज भारत में भले तुर्रिदार लाल टोपीमय दरबानों, लालबत्ती में भारत में घूमते रहे हों, लेकिन सच्चे लोकतंत्र वाले फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन के पुराने कथानक के सिनेमाई दृश्यों में भी यह देखने को नहीं मिला कि अब्राहम लिंकन की बग्गी की लालटेन लाल शीशा लिए हुए थी या जेएफ कैनेडी के काफिले की कारों पर लाल बत्ती लगी हो। हां, इमरजेंसी की नीली लाइट दिखती है लेकिन लाल कालीन की तर्ज पर लाल बत्ती से हुकूमत की पहचान भारतीय उपमहाद्वीप का शायद इसलिए खास रूप बना क्योंकि सत्ता हमारी भगवान है। ये भगवान करोड़ों की संख्या में है। यदि सवा सौ करोड़ लोग हैं तो वे मूर्तियों में बसे 32 करोड़ देवी-देवताओं से ही नहीं बल्कि सत्ता के मंदिरों में बैठे जिंदा देवताओं से भी नियंत्रित हैं।

source site भारत में 1947 से रचा ढोंग है जो लोकतंत्र अलापता है कि वह जनता के लिए है। नहीं, वह सत्ता के लिए है। प्रधानमंत्री या कलक्टर का यह कहना प्रपंची है कि वह जनसेवक है। इसलिए कि अपना लोकतंत्र मूलतः अंग्रेजों के सिस्टम का फैलाव है। गुलामों पर राज करने की जो व्यवस्था अंग्रेजों ने गढ़ी थी वह जस की तस हमारे संविधान निर्माताओं ने न केवल अपनाई बल्कि विदेशों से तमाम तरह के टैंपलेट ले कर उससे अपने को पूरी तरह माईबाप बनवा दिया। इस देश में सब सरकार करती है याकि सब भगवानजी करते है। हम-आप याकि जनता की जिंदगी में मतलब इस बात का है कि हाकिमों से काम कराने में हम समर्थ है या नहीं? जनता भले वोट देती है, जनादेश से सत्तारोहण होता है मगर सत्ता का रोहण। सत्ता याकि सिस्टम स्थाई है। अर्थ सत्ता का, सिस्टम का है। उसमें रचे-बसे अंहकार याकि लालबत्ती का है। लालबत्ती, लाल कलम ही तय कराती है कि सडक पर सबका समान अधिकार नहीं है। नागरिक को, जनता को उसके आगे से हटना होगा। चौंकना होगा। डरना होगा। जान बचा कर भागना होगा। लालबत्ती का अर्थ है भारत सरकार। आपने गौर किया होगा, जो सरकारी मुलाजिम होते है या हाकिम की जो क्लास है वह किस घमंड से कार की नंबर पट्टी पर अपने को भारत सरकार बताती घूमती है! मैंने विदेश में ऐसी कोई कार प्लेट नहीं देखी। वहां पता नहीं पड़ता कि कौन पीएम, या मंत्री या कलक्टर है। लंदन, अमेरिका में कभी पीएम, मंत्री, कलक्टर की खनक सुनाई ही नहीं देती है। और अपने यहां?

http://winevault.ca/?perex=siti-sicuri-per-opzioni-binarie मैंने कोई तीस साल पहले इंदिरा गांधी के वक्त का एक किस्सा सुना। उत्तर-पूर्व के राज्य के एक आदिवासी नेता की शपथ हुई। शपथ ले कर वह अपने इलाके गया। उसका अपना जो गांव था वहां तक सड़क नहीं थी। पगडंडी से जाना था। मंत्री को चिंता हुई यह खराब बात। पगडंडी से पैदल गए तो मैरे गांव वाले मानेंगे नहीं कि वे खास हो गए है। भारत सरकार में मंत्री है! क्या करें? विचार हुआ। अंत में रास्ता निकला जिसमें पांच-छह पुलिसजनों के काफिले के साथ मंत्री ने पगडंडी का रास्ता नापा। उनके आगे सफेद दरबानी-मगर लालटोपीमय पोशाक में एक व्यक्ति तख्ती लिए हुए था जिस पर लिखा हुआ था मंत्री, भारत सरकार!

http://fhlchristianministries.org/?encycloped=Forex-traders-wealth-management&fb1=e5 क्या यह सब मोटर एक्ट में संशोधन से खत्म होगी? कार की बत्ती खत्म हो जाए पर सिस्टम तो वहीं रहना है। सिस्टम की तासीर हुकूमत चलाने की है और हिंदू की तासीर उसके आगे मुजरा करने की है। वह मुगलों को भी हुकुम, हुकुम कहता था, अंग्रेजो को भी कहता था तो नेहरू को भी कहता था और आज नरेंद्र मोदी को भी कहता है। हिंदू याकि जनता पहले भी शक्तिशून्य थी और आज भी है। हाकिम की लाल कलम से सब थर्राते हैं। कलम की याकि सिस्टम की स्याही क्योंकि लाल है इसलिए हम पेन का, पेन पकड़ने वाले का कुछ नहीं कर सकते।

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