सस्ती औषधि की सौगात

12 months ago Editor 0

बेहद महंगी दरों पर मिलने वाली ब्रांडेड दवाएं मरीजों और उनके तीमारदारों की जेब पर इतनी भारी पड़ती हैं कि अधिकांश तो पर्याप्त मात्रा में दवाएं खरीद भी नहीं पाते। जेनेरिक दवाओं को लेकर प्रधानमंत्री की यह घोषणा राहत देने वाली है और यदि सब अच्छी नीयत और दृढ़ इच्छाशक्ति से हुआ तो मरीजों के उपचार खर्च में 50 से 75 प्रतिशत की कमी आ सकती है…

~ डॉ. ए.के. अरुण

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत दिया कि ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जाएगा जिसके तहत चिकित्सकों को उपचार के लिए महंगी ब्रांडेड दवाओं की जगह जेनेरिक दवाएं (जो मूल दवा है और सस्ती होती है) ही लिखनी होंगी। उल्लेखनीय है कि बेहद महंगी दरों पर मिलने वाली ब्रांडेड दवाएं मरीजों और उनके तीमारदारों की जेब पर इतनी भारी पड़ती हैं कि अधिकांश तो पर्याप्त मात्रा में दवाएं खरीद भी नहीं पाते। जेनेरिक दवाओं को लेकर प्रधानमंत्री की यह घोषणा राहत देने वाली है और यदि सब अच्छी नीयत और दृढ़ इच्छाशक्ति से हुआ तो मरीजों के उपचार खर्च में 50 से 75 प्रतिशत की कमी आ सकती है।

पहले ये समझें कि जेनेरिक दवाएं कहते किसे हैं। यह वास्तव में किसी भी दवा को दिया गया गैर-मालिकाना आधिकारिक (इंटरनेशनल नॉन प्रोप्रायटरी – आईएनए) नाम है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) निर्धारित करता है। जैसे कि ‘पैरासिटामॉल एक जेनेरिक दवा है, जबकि क्रोसिन उसी दवा का एक ब्रांड नाम है। विभिन्न दवा कंपनियां पैरासिटामॉलको अलग-अलग ब्रांड नामों से बनाकर मनमानी कीमतों पर बेचती हैं। दरअसल ये जेनेरिक या गैरमालिकाना नाम दवाओं की लेबलिंग, उत्पाद संबंधी जानकारी, विज्ञापन व अन्य प्रचार सामग्री, दवा नियमन व वैज्ञानिक पत्रिका या साहित्य के नामों के आधार में उपयोग के लिए होते हैं। कई देशों के कानून में दवा के ब्रांड नाम से ज्यादा बड़े अक्षरों में जेनेरिक नाम छापने का स्पष्ट प्रावधान है। कुछ देशों की सरकारों ने तो ऐसे प्रावधान भी कर दिए हैं जिससे वहां सार्वजनिक क्षेत्र में ‘ट्रेडमार्क’ का उपयोग प्रतिबंधित हो गया है।

डब्ल्यूएचओ की 46वीं विश्व स्वास्थ्य सभा की प्रस्ताव संख्या 46.19 के अनुसार भी लगभग सभी दवाओं को जेनेरिक नामों से पहचानने व बेचने की बात है, लेकिन खेद है कि इस पर अमल पूरी तरह हो नहीं पाता। हमारे देश में आमतौर पर 70-80 दवाइयां ही व्यापक उपयोग में ली जाती हैं। लेकिन विभिन्न दवा कंपनियों द्वारा इन दवाओं के कोई एक लाख ब्रांड कई गुना महंगी दरों पर बेचे जा रहे हैं। इन ब्रांडेड दवाओं के चलन के पीछे डॉक्टरों की अहम भूमिका होती है। एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया कि ब्रांडेड दवाएं जेनेरिक दवाओं की अपेक्षा 10 से 100 गुना तक ज्यादा दामों पर बेची जाती हैं। भारत में पहले ब्रांडेड दवाओं पर 15 प्रतिशत उत्पाद शुल्क लगता था, जबकि जेनेरिक दवाएं उत्पाद शुल्क से मुक्त थीं। अब सब पर उत्पाद शुल्क लगता है।

दवा कंपनियां अक्सर रिसर्च के नाम पर ब्रांड नाम से दवा बेचने की आड़ में भारी मुनाफा कमाती हैं। ज्यादातर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां गुणवत्ता व शोध का हवाला देते हुए कहती हैं कि गंभीर बीमारियों के उपचार में उनकी ब्रांडेड दवा का ही इस्तेमाल होना चाहिए। इससे आम लोग भी भ्रमित होते हैं। कभी-कभी वे भी यह सवाल उठा देते हैं कि जेनेरिक दवाओं की तुलना में ब्रांडेड दवाएं ज्यादा प्रभावी तो होती ही होंगी? लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। किसी भी फार्मास्युटिकल कम्पनी को दवा बनाने में ‘फार्माकोपिया’ में उल्लिखित क्वालिटी व गाइडलाइन मापदंडों का पालन करना जरूरी होता है। चाहे दवा जेनेरिक हो या ब्रांडेड।

स्वास्थ्य की एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘लैनसेट’ ने अपने सर्वेक्षण व अध्ययन के आधार पर एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें कहा गया था कि भारत में प्रतिवर्ष 3.9 करोड़ लोग खराब स्वास्थ्य और महंगी दवा के कारण उपचार कराने की वजह से गरीबी रेखा से नीचे पहुंच जाते हैं। ग्रामीण भारत में यह आंकड़ा शहरी लोगों की तुलना में 40 प्रतिशत ज्यादा है। अध्ययन में यह भी कहा गया कि लगभग 47 प्रतिशत लोगों को महंगे इलाज की वजह से अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी या गिरवी रख कर्ज लेना पड़ा। इस अध्ययन के अनुसार भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बावजूद 78 प्रतिशत लोगों को अपने उपचार पर अलग से खर्च करना पड़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इतने भारी-भरकम स्वास्थ्य बजट के बावजूद मात्र 22 प्रतिशत लोगों के इलाज की व्यवस्था हो पाती है। जाहिर है, इसी मजबूरी का फायदा उठाकर निजी दवा कंपनियां अपना व्यापार चमकाती है।

ब्रांडेड दवाओं के बेतहाशा कारोबार के पीछे एक तथ्य यह भी है कि भारत में वर्ष 2003 से तैयार ‘जरूरी दवा सूची’ पर ठीक से अमल ही नहीं हो रहा। यह दवा सूची स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति- 2002 मे स्पष्ट उल्लेख है कि सरकारें सरकारी व सार्वजनिक अस्पतालों के लिए दवा उपयोग व खरीद में केवल ‘जरूरी दवा सूची’ के अनुरूप ही काम करेगी, लेकिन सरकारी अधिकारियों व स्वास्थ्य कर्मचारियों ने इस नियम की लगातार अनदेखी की है। पिछली सरकार ने जेनेरिक दवा को उपलब्ध कराने के लिये कई प्रदेशों में ‘जन-औषधि केंद्र’ के नाम से जेनेरिक दवा की दुकानें भी खोलीं, जिनमें बेहद सस्ते मूल्य पर जरूरी दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन चिकित्सकों एवं दवा कंपनियों के एजेंटों की मिलीभगत से सस्ती दवा की यह मुहिम ज्यादा कारगर नहीं हो सकी।

भारत में तीन ऐसे प्रदेश हैं, जहां ‘जेनेरिक एवं जरूरी दवा’ की अवधारणा को लागू किया गया है। ये प्रदेश हैं तमिलनाडु, दिल्ली एवं राजस्थान। इन प्रदेशों में काफी हद तक जरूरी दवा जेनेरिक रूप में अस्पतालों में उपलब्ध कराई गई हैं। हालांकि इस दिशा में अभी और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, फिर भी अन्य प्रदेश इन तीन राज्यों से जरूरी व जेनेरिक दवाओं के उपयोग का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

भारत का दवा बाजार दुनिया के दवा बाजार में तीसरे नंबर पर है। विगत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष भारतीय दवा बाजार की वृद्धि दर 15 प्रतिशत है। सीआईआई के एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2020 तक भारतीय दवा बाजार 55 बिलियन डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा। दवा क्षेत्र में विदेशी निवेश के आ जाने के बाद वर्ष 2000 से 2016 के बीच भारतीय दवा बाजार में तेजी से इजाफा हुआ है। इस दौरान यहां 14.53 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ। ऐसे में दवा कंपनियों के लिए जेनेरिक दवाओं का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होगा। जाहिर है, ऐसे में टकराव बढ़ेंगे और हो सकता है कि मुनाफाखोर कंपनियां इसे रोकने के लिए तरह-तरह की तिकड़में आजमाने से बाज न आएं, जैसा कि हम स्टेंट के मामले में देख रहे हैं, जिनकी कृत्रिम कमी बाजार में पैदा की जा रही है। लिहाजा, इसके लिए भी सरकार को पर्याप्त उपाय करने होंगे कि मरीजों को दिक्कत न हो। उम्मीद है कि मोदी सरकार जेनेरिक दवाओं के लिए जल्द कानून लाएगी, ताकि दवा कंपनियों की लूट रुक सके। जेनेरिक दवाएं अनिवार्य किए जाने से स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव संभव है। लेखक: जन-स्वास्थ्य विज्ञानी व राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त चिकित्सक हैं।