जन संसद, जंगे आजादी और चम्बल

11 months ago बी. के. पाण्डेय 0

1857 में जब सारा देश ब्रितानिया हुकूमत के अत्याचारों से सुलग उठा था, तब 25 मई 1857 को इसी ‘पचनद घाट’ पर चम्बल के तमाम क्रन्तिकारी इकट्ठा हुए थे और यहीं से उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को नेस्तनाबूंद करने की कसमें खाईं और कूद पड़े थे 1857 के महासमर में …

 

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) की 160वीं वर्षगाँठ पर मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा पर स्थित पाँच नदियों के संगम ‘पचनदा’ पर, ‘जंगे आजादी और चम्बल’ विषय पर एक विशाल ‘जन संसद’ का आयोजन किया गया। दरअसल 1857 में जब सारा देश ब्रितानिया हुकूमत के अत्याचारों से सुलग उठा था, तब 25 मई 1857 को इसी ‘पचनद घाट’ पर चम्बल के तमाम क्रन्तिकारी इकट्ठा हुए थे और यहीं से उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को नेस्तनाबूंद करने की कसमें खाईं और कूद पड़े थे 1857 के महासमर में।

जब 1857 में जब पूरे देश में क्रांति के केंद्र ध्वस्त कर दिए गए, हजारों शहादतें हुईं, हजारों महानायकों को कालापानी भेज दिया गया, उस वक्त देश भर के क्रन्तिकारी चम्बल के आगोश में खिंचे चले आये। इसलिए तब यह धरती उस महान स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का ट्रेनिंग सेंटर बन गई थी। जन नायक गंगा सिंह, रूप सिंह सेंगर, निरंजन सिंह चौहान, जंगली-मंगली बाल्मीकि, पीतम सिंह, बंकट सिंह कुशवाह, मारुंन सिंह, चौधरी रामप्रसाद पाठक, गंधर्व सिंह, भैरवी, तेजाबाई, मुराद अली खां, काशीबाई, शेर अंदाज अली, चिमना जी, दौलत सिंह कछवाह, बरजोर सिंह, खलक सिंह दौआ इत्यादि हर वर्ग, जाति, लिंग और सम्प्रदाय के लोगों ने चम्बल में 1857 के 10-12 वर्ष बाद भी इस अंचल में आजादी की मशाल जलाये रखा था!

पचनदा में बहता पानी भले ही शांत, ठहरा और साफ-सुथरा दिखता हो लेकिन हकीकत यह है कि बीहड़ों में जिंदगी उतनी ही उथल-पुथल भरी है। एक साजिश के तहत हमेशा ही चम्बल क्षेत्र को ‘डार्क जोन’ बनाकर उपेक्षित रखा गया जबकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैला यह विशाल बीहड़ क्रांतिकारियों की शरण स्थली के रूप में मशहूर रहा है। आज भी आजादी के 70 वर्ष बाद भी क्रांतिकारियों के वारिसों को सत्ता के हाथों उपेक्षा और अपमान के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगा। …कल की यह ‘जन संसद’ चम्बल के इन्ही गौरव और अपमानों के लेखा-जोखा निमित्त आयोजित की गई।

जन संसद के इस आयोजन की पृष्ठभूमि तैयार की जुझारू और संघर्षशील युवा सिनेमाकर्मी ‘शाह आलम’ ने, जो अपनी सायकिल से निकले तो थे चम्बल ही नहीं सम्पूर्ण उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के पितामह रहे गेंदालाल दीक्षित द्वारा 1916 स्थापित ‘मातृवेदी संगठन’ के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में उसकी स्मृतियों के दस्तावेजी करण को लेकर, पर अपनी 2300 कि.मी. की यात्रा में उन्होंने केवल ‘मातृवेदी’ ही नहीं उससे सुदूर 1857 और उससे पहले भी यह दुर्गम अंचल क्रांतिकारियों और जाबांज देश भक्तों की खान के रूप में दिखाई पड़ा। वे फिर अपने बाकीं काम छोड़ चम्बल के इतिहास उत्खनन में जुट गए, किन्तु यह इतिहास उत्खनन मात्र इकहरा न था। उसमें चम्बल के दुरूह जीवन और कष्टकारी स्थितियों की पड़ताल भी शामिल थी। इसलिए जब इस जन संसद का आयोजन हुआ और इसमें स्थानीय इतिहासकार, पत्रकार, समाजसेवी व आम नागरिक शामिल हुए, तब यह मात्र एक रस्म अदायिगी तक सीमित रह जाने वाला कार्यक्रम न होकर, जन संवाद के माध्यम से जन समस्याओं की गहन पड़ताल और उनके निवारण की तह तक विस्तार को प्राप्त हुआ।

‘इंकलाब जिन्दाबाद’ और ‘आवाज दो हम एक हैं’ के गगनभेदी नारों के साथ वरिष्ठ पत्रकार के. पी. सिंह, शाह आलम और तमाम वरिष्ठजनों की अगुवाई में कोई दो सौ-सवा दो सौ लोगों का हुजूम पचनद की रेती में गढ़े उन्नत तिरंगे के नीचे 1857 के चम्बल के तमाम शहीदों को पुष्पों के द्वारा श्रद्धासुमन अर्पित करता राष्ट्रगान के उपरांत वहाँ से चलकर प्राचीनबाबा साहब प्रांगण में आकर आम और नीम की सघन छाया में संसद की वृत्ताकार शैली में दरी पर आकर बैठ जाते हैं। कार्यक्रम का संचालन सम्हाला उरई के युवा समाज सेवी कुलदीप कुमार बौद्ध ने और मुख्य वक्ता बने पत्रकार के.पी. सिंह।

कार्यक्रम के प्रारंभ में बीज वक्तव्य शाह आलम ने दिया उसके बाद सर्वप्रथम अपने विचार प्रकट करने आये कवि डा. गोविन्द द्विवेदी ने कहा-‘चम्बल वीर प्रसूता भूमि है और इसका वास्तविक स्वरूप हमें देश के सामने लाना ही होगा।’ तदुपरांत राज त्रिपाठी ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा-‘हमें शाह आलम का शुक्र गुजार होना चाहिए, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और लगन से हमें हमारे लड़ाका पुरखों के शौर्य और साहस से परिचित कराया कि राष्ट्र की बलिदानी परम्परा में हमारा भी कोई अमिट स्थान है।’ उसके बाद औरैया से आये डा.अजय शुक्ला ‘अंजाम’ ने मैनपुरी में स्थित शहीद मंदिर और उस पर आयोजित होने तथा सबसे अधिक लम्बा (19 दिन) चलने वाले मेले के बारे में जानकारी देने के बाद बताया कि 1857 में इटावा के तत्कालीन कलेक्टर ए.ओ. ह्यूम ने एक तोंपो और बंदूकों से लैस एक जंगी बेड़ा भेजा था। उस समय साधनहीन हमारे दादा-परदादों ने अपने हँसिया, दरांती, और बरछी-भालों से पहले डभोली घाट फिर भरेह पर उनका कड़ा मुकाबला किया था। हम बहादुर और बागी कौम हैं। ….पर देश ने आजादी के बाद हमारे साथ छल किया। चम्बल के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया। चम्बल का युवा बेरोजगारी के चलते पलायन को मजबूर है। त्योहारों पर उनकी घर में प्रतीक्षा होती रहती है पर अपने बूढ़े माँ-बाप और जवान बहनों के ब्याह की चिंता में यह आना टालते रहते हैं। बंगलौर, अहमदाबाद सूरत और अन्य स्थानों पर जोखिम भरे काम करके यह युवा जब अपने देश लौटते हैं तो कई बीमारियों के साथ और जो पैसा उन्हें घर के खर्च में देना होता है, वो उनके इलाज में स्वाहा हो जाता है। हमारा चम्बल आज बहुत बड़े संकट की कगार पर है और इसका यदि कोई जिम्मेवार है तो वे इस देश और प्रदेश के हुक्मरान।’

इसके बाद भिण्ड मध्यप्रदेश से आये युवा साहित्यकार-इतिहासकार डॉ. जितेन्द्र विसारिया ने अपने उद्बोधन में कहा-‘पचनद और चम्बल घाटी की अपनी एक साझा संस्कृति और इतिहास है। जब तत्कालीन संयुक्त प्रान्त स्थित ‘पचनदा’ के क्रांतिकारी अंग्रेजों के दमन के शिकार हुए तब तत्कालीन सिंधिया रियासत के अंतर्गत आने वाले कछवाहघार (भिण्ड) में शरण पाई थी। कछवाहघार में पृथ्वी सिंह, चिमनाजी और दौलत सिंह-बरजोर सिंह द्वारा गठित ‘स्वराज मंडल’ में शामिल होकर चम्बल और पचनदा के वीरों ने ग्वालियर तक रानी झाँसी और तात्या टोपे की मदद की और 18 जून 1858 के 10-12 साल बाद तक ब्रिटिश हुकूमत को टक्कर देते रहे थे। पर एक साजिश के तहत अंग्रेजों की मनोकामना फलीभूत हुई और इस अंचल की बगावती परंपरा को लूट-खसोट की डाकू परंपरा से नत्थी कर उसे बदनामी और उपेक्षा के ऐसे दलदल में धकेल दिया कि आज भी देश के अन्य हिस्सों में चम्बल के युवाओं को किराए पर माँगे कमरे नहीं मिलते! हमें चम्बल को इस बदनाम छवि से निकलना ही होगा और विकास के मार्ग को प्रशस्त करना ही होगा।’

इसके बाद धर्मेंद्र सिंह ने भी आजादी के बाद चम्बल के क्रांतिकारियों के साथ हुए छलावे पर अपना आक्रोश प्रकट करते हुए उनकी कुर्बानियों के व्यर्थ न जाने की बात कही। इसके बाद बड़ी संख्या में उपस्थित हुई ग्रामीण महिलाओं ने भी घूँघट की ओट से अपनी और अपने अंचल की दुर्दशा पर गुस्सा प्रकट किया। कंजौसा की मीरा बाई निषाद ने कहा-‘हियाँ मजूरी है नईं है और सरकार से जो थोरी भौत योजनाएं आती हैं, वे बड़ी जाति के खाये-अघाये लोगन के पेट मेंईं समाय जाती हैं…हमाये मुहल्ला में एक हू हेण्डपंम्प नईं और उनके हियाँ दुइ-दुइ, तीन-तीन।… नरेगा में टाइम से मजूरी नईं मिलत। ….बेहड़ से लकड़ियाँ बीन-बीन लड़िकन कों पढ़ाओ, पर हिया कोई धंधों-रोजगार न होवे और नौकरी न मिलिबे से हमाये लड़िका मजूरी पे जान लगे, तो गाँव के लोग हँसी उड़ाउत कि पढ़ें फारसी बेंचे तेल….तो साब! जि है हमाई दशा? न जीवे में न मरिवे में!!!’ उसके बाद गाँव की एक अन्य महिला जयदेवी ने वर्षों से प्रस्तावित ‘पचनद डैम’ के बनने पर विस्थापित होने वाले 184 गांवों के लोगों के पुनर्वास पर अपनी चिंता प्रकट की- ‘साब! पचनदा पर जो बाँध बनाओ गओ तो हम गरीब कहाँ बसाए जैहें? पूरो इलाका बेहड़ है। जो भी खेती हैं, व नदी की तीर में है। बाँध बनो तो सब डूब जैहै, तब हम का खाएँगे, काँ रहेंगे???’

इसके बाद स्थानीय प्रौढ़ भग्गूलाल जी ने पचनदा के दलितों की बदहाली पर प्रकाश डालते हुए कहा-‘अब से पूर्व के मुख्यमंत्री जी सारी योजनाएं अपने गृहनगर सैंफई ले गए। सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश में जालौन जिला सबसे अधिक पिछड़ा है। यहाँ के दलित आज भी मैला ढोने को मजबूर हैं। पिछले दिनों कस्बा उमरी के स्वच्छकारों ने जब यह घृणित कार्य छोड़ना चाहा, तो गाँव के दबंगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। उन्हें परचून की दुकान से सामान, आटा चक्की पर आटा और बस में सवारी करने से मना किया गया। यहाँ तक कि उनका खेतों में शौच और श्मशान पर मुर्दा जलाने की भी मनाही झेलनी पड़ी। ….प्रशासन ने आनन फानन में 32 हजार की मशीन मँगवाई। रात में राम तलैया के कुछ बाल्मीकि लड़के ले गए, जिसमें चैंबर का ढक्कन खुलते ही जहरीली गैस से दो बाल्मीकि युवक मारे गए। उनकी पुलिस में एफआईआर तक नहीं हुई और मामला दबा दिया गया।…दलित वर्ग की यहाँ स्थिति बहुत दयनीय है।

इसके बाद एक अन्य ग्रामीण सन्तोष ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा-‘इस जन संसद में जो बात उठी है वो सच्चे मन से उठाई जाएँगी तो अवश्य सुनी जाएँगी। …इतनी सारी नादिया होते हुए भी यहाँ भयंकर पानी की किल्लत पड़ती है। किसान की जमीन असिंचित है, क्योंकिं गहरी नदियों से लिफ्टिंग कर पानी ऊपर लाने हेतु न कोई बाँध है, न अन्य व्यवस्था। किसानों की स्थिति पानी बिच मीन प्यासी वाली है। बेरोजगार युवाओं में पलायन और अपहरण और फिरौती जैसे अपराध पनपने का एक कारण यह भी है।

इसके बाद एक स्थानीय युवा अवधेश यादव उर्फ पिंकू ने बताया कि पचनद डैम और फोरलेन के लिए यहाँ के स्थानीय नेता सुदामा दीक्षित और मनोज पांडेय से अनुनय विनय की पर उन्होंने एक बात कान न दी। इंदिरा जी हों या उमा भारती सबसे इस क्षेत्र में पर्यटन क्षेत्र बनाने की विनती की गईं पर कभी कोई सुनाई नहीं हुई। पचनदा का बीहड़ ‘लाइन सफारी’ के लिए सबसे मुफीद था, पर अखिलेश यादव उसे इटावा के समीप ले गए! कुल मिलाकर पचनदा आज भी सत्ता और प्रशासन की गहरी उपेक्षा का शिकार है। विश्व प्रसिद्ध यमुनापारी बकरी और भदावरी भैंस को लेकर कुछ नही किया गया। कार्यक्रम के अंत में मुख्य वक्ता के रूप में के.पी. सिंह जी ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा-‘जन संसद के सरोकार स्थानीय मुद्दों से बड़े हैं। शाह आलम ने मातृवेदी को गुमनामी में से खींचकर बाहर नहीं निकला, अपितु 1857 के चम्बल और पचनदा के वीरों को इतिहास और देश के फलक पर प्रतिष्ठित किया है। आज जब सम्पूर्ण समाज का धुर्वीकरण हो रहा है ऐसे में 1857 हमें इसलिए भी याद रखना चाहिए कि वो देश के सामूहिक मुद्दों को लेकर देश के सम्पूर्ण वर्ग द्वारा मिलकर लड़ा गया संग्राम था। इसके दस्तावेज इलाहाबाद, दिल्ली और लन्दन के अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं।‘

अंत में सभी का आभार सदन के स्पीकर अवधेश सिंह चौहान जी ने किया और पुनः अगले साल फरवरी माह में फिर दूसरी जनसंसद में आने का आव्हान कर कार्यक्रम के समापन की औपचारिक घोषणा की।