पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष करे सर्वहारा वर्ग

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आज भी पूॅजीवाद चाहे जितना विकसित हो गया है, परन्तु मार्क्सवाद से डरता है, उससे दुश्मनागत व्यवहार रखता है, अर्थात आज भी मार्क्सवाद प्रासंगिक बना हुआ है …

~ एम.एस. पाण्डेय

कार्ल मार्क्स की 200वीं और लेनिन की 147वीं जयन्ती के अवसर पर आजमगढ़ में कन्धरापुर व मन्दुरी के वामपंथी साथियों द्वारा ग्राम मिरिया-रेड़हा के एक निजी विद्यालय में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें आये हुए वक्ताओं ने कहा कि मार्क्स का जन्म जर्मनी देश के त्रियेर नगर (प्रशा के राइन प्रदेश) में तथा लेनिन का जन्मरूस देश के बोल्गा नामक कस्बे (सिंबिर्स्क नामक स्थान) में हुआ था। सम्भ्रान्त परिवार में पैदा होने के बावजूद मार्क्स व लेनिन बचपन से ही समाज के बहुसंख्यक श्रमिक हिस्से के शोषण उत्पीड़न से मुक्ति के बारे में चिन्तन मनन किया करते थे और इसका समाधान बताया करते थे। अपना पेशा चुनने के बारे में एक नौजवान के विचार नामक लेख में मार्क्स ने लिखा कि इतिहास उन व्यक्तियों को महानतम कहता है, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों की भलाई करके खुद महान बने हों, वही व्यक्ति अधिकाधिक सुखी कहलाएगा, जिसने अधिकाधिक लोगों को सुखी बनाया हो। एक बार छात्रों के क्रान्तिकारी प्रदर्शन में भाग लेने व नेतृत्व करते समय पुलिस ने लेनिन को गिरफ्तार कर लिया और जेल ले जाते समय पूछा- ऐ युवक! विद्रोह करने से क्या फायदा होगा, क्या तुम्हे अपने सामने खड़ी विशाल दीवार नहीं दिखायी देती। इसपर लेनिन ने जवाब दिया था कि बेशक, लेकिन यह दीवार जर्जर हो चुकी है, इसे एक जोरदार धक्का लगाने की जरूरत है, यह भरभराकर धराशायी हो जायेगी। कार्ल मार्क्स व लेनिन सामन्तवाद, पूॅजीवाद व साम्राज्यवाद के विरूद्ध जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहे और हर तरह के पूॅजीवाद-साम्राज्यवाद हिमायती एवं समर्थकों जैसे शान्तिवादी, संसदवादी, अराजकतावादी, सरकारी समाजवादियों व इनकी पूॅजीवादी रूझानों से लड़ते रहे। इस संदर्भ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘‘कम्युनिज्म के सिद्धान्त’’ (1848) तथा मार्क्स-एंगेल्स द्वारा तैयार व लिखा गया ‘‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’’ (1848) मेहनतकश वर्गो की मुक्ति का एक सबूत व कार्यपद्धति है। आज विज्ञान व तकनीक समेत अन्य उत्पादन शक्तियों का इतना ज्यादा सो भी विश्व व्यापी स्तर का विकास विस्तार हो गया है कि उससे नाना प्रकार की जनसमस्याओं का खात्मा किया जा सकता है, परन्तु पूॅजीवाद के निजी मालिकाने व निजी लाभ की प्रणाली के चलते मात्र पॅूजीपतियों साम्राज्यपतियों का विकास फैलाव हो रहा है, वहीं मजदूरों, किसानों व आम मेहनतकश जनता का तेजी से हा्रस हो रहा है, उसकी तरह तरह की सामाजिक, आर्थिक समस्यायें जैसे- मंहगाई, बेरोजगारी, छटनी से बेकारी, गरीबी, तंगहाली बढ़ती जा रही है। पूॅजीवादी विकास से पैदा होने वाले इसी परस्पर विरोध से मार्क्सवादी-समाजवाद पैदा हुआ था। आज जब यह अन्तरविरोध काफी तेजी से बढ़ रहा है, तो निश्चित रूप से आज मार्क्सवादी- समाजवाद की प्रासंगिकता बढ़ रही है और पूॅजीवाद- साम्राज्यवाद अप्रासांगिक व मरणासन्न साबित हो रहा है।

मार्क्सवाद- लेनिनवाद मजदूरों किसानों मेहनतकश वर्गो का हिमायती एवं पूॅजीवादी- साम्राज्यवाद का खुलेआम घोर विरोधी है। इसीलिए पूॅजीवाद-साम्राज्यवाद स्वयं अपने व अपने नाना प्रकार के समर्थक बृद्धिजीवियों द्वारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद को तोड़ने, संशोधन करने व उसमें कमियॉं बताने के साथ-साथ उसके विरूद्ध झूठा, गंदा, अनरगल प्रचार करता करवाता रहता है तथा मार्क्सवाद के वर्गीय सिद्धान्त को बदलकर पेश करवाता है। पॅूजीवाद व उसके दलाल सुधारवादी-संशोधनवादियों का आरोप है कि मार्क्सवादी समाजवाद जनतांत्रिक नहीं होता और यह भी कहता है कि समाजवादी देशों को छोड़कर सभी पूॅजीवादी-साम्राज्यवादी देशों में जनतांत्रिक व्यवस्था है। जबकि इन पूॅजीवादी देशों में राष्ट्र का आर्थिक व तकनीकी विकास करने के नाम पर और आर्थिक जगत में आयी उद्योगों की मंदी व अन्य आर्थिक संकटों को हल करने के नाम पर बैंक, उद्योग, व्यापार आदि तथा सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं में मजदूरों व अन्य कर्मचारियों की छंटनी या उनकी हमेशा के लिये छुट्टी कर दी जाती है, उनकी नई भर्तियों पर रोक लगा दी जाती है, या कम भर्ती की जाती है, उनके वेतन बृद्धि आदि पर रोक लगा दी जाती है, कई मजदूरों की जगह एक कम्प्यूटराइज मशीन लगा दी जाती है, ताकि माल उत्पादन में लगने वाली मजदूरी की लागत कम से कम हो जाय और उत्पादन लाभपरख हो जाय। हॉलाकि मार्क्स व लेनिन ने बताया भी है कि पूॅजीवाद- साम्राज्यवाद अपना संकट इसी तरह से हल करता है, किन्तु अन्ततः वह फिर इन्हीं संकटों में पुनः फंस जाता है। पूॅजीवाद इस सिद्धान्त का इस्तेमाल करके अपना संकट दूर तो करता है, किन्तु मार्क्सवाद-लेनिनवाद को अप्रासांगिक भी बताता है। ऐसे में आप देखेगें कि पूॅजीवाद का अपना संकट हल करने का तरीका उसके लिये तो लाभप्रद होता है, उसकी लाभखोरी व मुनाफाखोरी में बढ़ोत्तरी हो जाती है, किन्तु वहीं पर मजदूरों, किसानों व आम मेहनतकश वर्गो के रोजी-रोटी कमाने के अधिकार छिन जाते हैं, उनके जनतंत्र का हनन हो जाता है। इस प्रकार यह तरीका पूॅजीवाद-साम्राज्यवाद के लिये जनतांत्रिक है, किन्तु मजदूरों, किसानों व आम मेहनतकश जनता के लिये गैरजनतांत्रिक है। अब पूॅजीवादी सज्जन चिल्लाते रहें कि पूॅजीवाद में कम से कम बोलने की तो आजादी है, उसकी स्वतंत्र मीडिया जनतांत्रिक तरीके से अपनी बात दुनिया के सामने रखती है, किन्तु हकीकत इसके बिल्कुल उल्टे है कि लेखकों विद्वानों से लेकर मीडिया तक पूॅजी पैसे पर बिकाऊ बन चुके हैं। इसीलिये मार्क्सवादी समाजवाद में खुलेआम घोषणा करके पूॅजीवान वर्गो पर मजदूरों की अनन्य तानाशाही लगानी आवश्यक एवं अपरिहार्य हो जाती है।

इसी प्रकार चुनावी व संसदीय जनतंत्र के बारे में भी सुधारवादियों, संशोधनवादियों का कहना है कि मार्क्सवाद हिंसक व बर्बर है, जबकि चुनावी व संसदीय तरीके से समाजवाद लाया जा सकता है। जैसा कि सभी जानते हैं कि आज पूरी दुनिया में चुनावी व संसदीय प्रणाली के तहत कैसे-कैसे पैसे व अन्य ताकतों के बूते पर, झूठे वायदों पर और आजकल धर्मवादी, जातिवादी व इलाकावादी राजनीतिक गठबंधन व एकतायें बनाकर चुनावी वोट लिये जा रहे हैं। ऐसे में इन तरीकों से चुनी हुयी सरकारें किस हद तक जन-प्रतिनिधियों की सरकारें साबित हो सकती हैं। जो पूॅजीवादी सज्जन यह कहते हैं कि मार्क्सवाद पुराने पूॅजीवादी व्यवस्था में जब गरीबी, अशिक्षा, अज्ञानता व अभावग्रस्तता थी, तब पैदा हुआ था और आज पूॅजीवादी विकास में इतनी सम्पन्नता आ गयी है कि अब मार्क्सवाद अप्रसांगिक हो गया है। उन सज्जनों को मार्क्सवाद फिर से पढ़ना चाहिए व समाज पर लागू करके देखना चाहिए कि मार्क्सवाद केवल गरीबों की गरीबी दूर करने का सिद्धान्त नहीं है, बल्कि मजदूरों को उनकी राजसत्ता दिलाने व उन्हें शासक बनाने का सिद्धान्त है। इसीलिए आज भी पूॅजीवाद चाहे जितना विकसित हो गया है, परन्तु मार्क्सवाद से डरता है, उससे दुश्मनागत व्यवहार रखता है, अर्थात आज भी मार्क्सवाद प्रासंगिक बना हुआ है। पूॅजीवादी सज्जन यह भी कहते हैं कि मार्क्सवाद निजी मालिकाने व निजी लाभ का विरोधी है, जबकि निजी लाभ जब तक नहीं दिखायी देगा, तब तक कोई मेहनत से काम नहीं करेगा और जब तक मेहनत से काम नहीं करेगा, तब तक देश का विकास सम्भव नहीं है। हालॉकि ये सज्जन यह कत्तई नहीं मानते कि इसी निजी लाभ व निजी मालिकाने से जहॉं समाज के एक छोटे से हिस्से यानी पूॅजीपतियों-साम्राज्यपतियों में प्रकाशमय दौलतमन्दी फैलती है, वहीं पर दूसरे बहुसंख्यक मजदूरों-किसानों व आम मेहनतकश जनता का जीवन में अंधकारमय, अभावग्रस्थता, व अपराधिक मनोवृत्तियॉं बढ़ती हैं। इसी अन्तरविरोध को दबाने व झुठलाने के लिये पूॅजीवादी सज्जन मार्क्स के वर्गीय दृष्टिकोण को उदार बनाने की वकालत करते हैं।

इतना ही नहीं लेनिनवाद के बारे में भी संशोधनवादी, सुधारवादियों का कहना है कि लेनिन की व्याख्यानुसार अब वित्तीय-पूॅजी का युग नहीं है, अब तो सट्टाबाजारी पूॅजी जो नकली पूॅजी है, से सारी आर्थिक व्यवस्थायें संचालित हो रही हैं, इसलिए आज के युग में लेनिनवाद अप्रसांगिक हो गया है। जबकि ये सज्जन बखूबी जानते हैं कि उद्योग, बैंक, व्यापार, वाणिज्य तथा दूरसंचार सेवाओं सहित यातायात परिवहन में वित्तीय-पूॅजी लगी हुयी है, न कि सट्टाबाजारी पूॅजी। सट्टाबाजारी पूॅजी की जननी वित्तीय-पूॅजी ही है, हॉं यह अलग बात है कि पूॅजीवाद साम्राज्यवाद आज सट्टाबाजारी पूॅजी के माध्यम से भी लाभ, मुनाफा हासिल कर ले रहा है। लेनिन ने साम्राज्यवाद की व्याख्या मंे कहा है कि अब आर्थिक मंदी से उबरने के लिये उद्योगों की पूूॅजी और बैंकों की पूॅजी एक साथ संघबद्ध हो गयी है, जिससे कोई भी माल सामान बेचने के लिये यदि लोगों में क्रय-शक्ति नहीं भी है, तो उसे पैदा कर सकती है। अर्थात बैंक लोन दे देता है और उद्योग माल-सामान दे देता है। इसप्रकार बैंक की पूॅजी उद्योगों का माल बिकवाने में सहायक होती है और उद्योग के माल-सामान, बैंकों के लोन बिकवाने में सहायक हो जाते हैं। इसी को वित्तीय-पूॅजी कहते हैं। लेनिन ने यह भी कहा है कि इससे आगे आने वाले दिनों में साम्राज्यवाद पुनः आर्थिक संकट में फंसता है और संकट हल करने के लिये मुद्रास्फीति, मजदूरों की छंटनी, सहित नोटबंदी आदि उपाय लगाता है। इस बार-बार के संकटों से पॅूजीवाद-साम्राज्यवाद को मुक्ति नहीं मिलने वाली है, इसीलिए समाज की जरूरत आ पड़ी है कि मजदूर, किसान, सर्वहारा वर्ग इस निजी लाभ, निजी मालिकाने की व्यवस्था को खत्म करके मार्क्सवादी समाजवाद की स्थापना करे। वक्ताओं ने कहा कि जबसे साम्राज्यवाद के निर्देशानुसार हमारे देशमें1991 में देसी पूॅजीवान वर्गो द्वारा नई आर्थिक नीति, डंकल प्रस्ताव, निजीकरणवादी, वैश्वीरणवादी, उदारीकरणवादी नीतियॉं लागू की गयी, तबसे लेकर आज तक मंहगाई, बेरोजगारी व गरीबी के संकट बढ़ते जा रहे हैं। बैंकों के लोन न चुका पाने के चलते किसानों द्वारा अत्महत्यायें की जा रही हैं। इसलिए इन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिये हमें मार्क्सवाद-लेनिनवाद से लैस होकर सर्वहारा वर्ग की अगुवाई में पूॅजीवान वर्गो के विरूद्ध संघर्ष छेड़ना होगा। सभा को शिवकुमार, डा0 राधेश्याम प्रजापति, सुरेश, रामहर्ष, डा. बी.एन.गौड़, रामअवध, शिवप्रकाश यादव, राजेश कुमार व ज्ञानचन्द ने सम्बोधित किया। सभा की अध्यक्षता शिवबचन प्रजापति व संचालन रामकेवल ने किया।