भाग्य-विधाता

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भाग्य-विधाता
अबोध नहीं,
बज्र मूर्ख है
क्योंकि नहीं बताया गया
उसको कभी
उसके अधिकार और कर्तव्य व
स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व
और जनतंत्र के अर्थ,
न ही किया गया है
कोई भी सार्थक प्रयास
उसके विवेक की जागृति का,
और बनाने का उसे सक्षम,
आत्म-निर्भर व स्वाभिमानी
ताकि वह बन सके पात्र
किसी की दया तथा कृपा का
बड़ी आसानी से;
तभी तो आज भी
झूठे वादों से
खिलौनों से
नाटकों से
जाति-धर्म के नारों से
कागज के टुकड़ों से
बहलाया जा सकता है,
कृतज्ञ बनाया जा सकता है,
और झूठ को सत्य होने का
यकीन करा
लाया जा सकता है अपने पक्ष में;
सेवक को यह भी मालूम है
भाग्य-विधाता की याददाश्त
होती है बहुत कमजोर
वह भूल जाता है
अपने सेवक के कारनामें
बहुत जल्दी
सेवक के दिखाये सब्ज-बाग पर
कर यकीन इतराने और गाने लगता है
सेवक की प्रशंसा के गीत,
अधिकार और कृपा में
नहीं कर पाता विभेद;
अजीब विडम्बना है
भाग्य-विधाता
सेवक को मानता है
अपना भाग्य-विधाता,
सेवक भाग्य-विधाता को जानता है
अपना भाग्य-विधाता,
लेकिन भाग्य-विधाता मानता है
खुद को सेवक का सेवक
और सेवक को अपना ‘जनक’।

 

~ अशोक कुमार वर्मा