मोदी ‘‘बावनी’’

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माँ शारद को नमन कर, श्री गणेश सिरनाय।
रचूँ ‘‘बावनी’’ मोदकी, गौरी पद गुण गाय।।
मोदी गुण-सागर भरा, मज्जन चहूँ दृढ़ाय।
शुचि शुभ गुण भण्डार का, वर्णन करुँ सिहाय।।

जय मोदी शुचि ज्ञान विशारद। तव गुण गावत निज मुख शारद।।
मन में उपजे भाव अनेका। क्या गुण गँाउ एक ते एका।।
अति पवित्र मुद मंगलदायक। मनु प्रातः सुमिरन को लायक।।
सुमिरत तव गुण कटहि कलेशा। हो प्रसन्न मन विचरत शेसा।।
नाचत मस्तक भूमि ले भारा। निज फणि सहस करत विस्तारा।।
अवनी धन्य मनत निज धर्मा। तव पग-यात्रा सफल सुकर्मा।।
दसो दिशा वरणत निज मुख से। मौन भाव प्रकणत बहु सुख से ।।
सूरज विशद तेज निज देते। अनुदिन प्रखर बुद्धि उपजाते ।।
बहे समीर देत सितलाई। तव मुख शुचि वाणी सरसाई।।

उदित उदय जग-मंच पर, मोदी बाल पतंग।
विकसे निर्बल सन्त जन, मन पंकज खिल रंग।।
निविड़ जगत अज्ञान भग, तव विचार शुचि तेज।
पुलकित भरत वसुन्धरा, जन विराेिध निस्तेज।।

चन्दा निज गुण शीतल देई। तव तन सब विकार हर लेई।।
चमकई तव विवेक गुण कइस। दामिनि दमकइ घन मॅंह जइसे।।
प्रतिभ चहूँ दिशि ब्यापइ कइसे। सुरभित अनिल सुगति गति जइसे।।
अनुदिन बढ़इ विवेक तुम्हारा। शारद कृपा सऱइ अनवारा।।
रत्नाकर सम धीर अथाहा। अचल प्रतिष्ठ श्रवे गुण ग्राहा।।
जिमि समुद्र की बीच पंक्तियाँ। उठइ उत्तुंग निरन्तर गतियाँ।।
कहुँ विराम कर नाम न लेहीं। वैसे तव प्रतिभा नित सरहीं।।
हनुमत शौर्य तुमंिह नित देहीं। निर्बलता मनु तव हरि लेहीं।।
तव बुद्धी कोउ भेद न जाना। प्रकटत छिपत चलत किमि माना।।
शक्रासन निज मघवा सौंपा। एक छत्र राजउ नर भूपा।।
करइ विरोध जो नर महँ कोऊ। बाली सम वरदान जिताऊ।।
ओहि कर शौर्य तुमहिं प्रविशाई। अर्द्ध शौर्य बस मात्र रहाई।।

सकल सुमंगल दायक, नर मनि अमित प्रकाश।
दिव्य तेज तन तव स्रवै, अनुदिन बढ़त सुहास।।
सत प्रतीज्ञ तव यश अहो, बाढ़इ नित कर दून।
डरपैं शत्रु निज मनैं, मानें निज कर ऊँन।।
अमिय छटा शुचि देह से, बरसै विमल सुवारि।
पावें दरशन कर दृग, लूटे शुचि फल चारि।।

राम राज कर नीव तुँ डारे। गँाधी नेहरू स्वप्न सवाँरे।।
नहिं कोउ ऊँच न नीच दिखाहीं। तव प्रताप बल बुद्धि लखाहीं।।
प्रकृति सराहहिं तव गुण धर्मा। करहु सदा नित पुण्य सुकर्मा।।
भारत मँह प्रातः कस भयऊ। स्वर्णिम किरण सकल महि छयऊ।।
चहुँ दिशि बहइ बयारि अनूपा। हर नर तन अनुभव सतरूपा।।
तव प्रतिभा हर देशन छिटकी। सबकी बुद्धि तुहीं पर अटकी।।
तुम सब में करते अगुआई। भारत अग्र सरइ तँह जाई।।
तव बुद्धी पर सब बलिजाहीं। ‘नर’ नहिं ‘सुर’ यह कहहिं सिहाहीं।।
तव प्रतिभा शुचि छहरै कइसे। चन्द अमिय द्रव सरसै जइसे।।
भारत वही वही यह मेदिनि। नव प्रभात भा विगती यामिनि।।

हरसे पंकज जन सभी, विकसे मोदी भानु।
नव प्रभात की किरण से, पुलकित संत सुजानु।।
हरशित हुई वसुन्धरा, पा निज अंक सुबाल।
धन्य धन्य निज को कहे, ना मोदी सम लाल।।

दमकइ चहुँ दिशि तेज तुम्हारा। जिमि रवि उदय सकल तम छारा।।
बिहँसंइ भूप जो खाइ थपेड़ा। हँसइ चलनियों छिद्र करोड़ा।।
जिनकर नाम घोटाला गावै। ऊ सबसे पुनीत निज भावैं।।
राजनीति तव रोम रोम में। वाणी सरसइ भाव जोम में।।
दोश-कोश रजनीतिक विहँसै। सकुचि लजाइ भितर मन झँहसै।।
जन विरोधि मन डरपैं कइसे। विपिन शिकार शेर से जइसै।।
उगलैं शत्रू वचन अँंगारा। स्रवे वारि मधु बचन खङारा।।
गहन बुद्धि के थाह न पावै। बँवरि-बँवरि निज मन उछलावैं।।
राजनीति तव फहरइ कइसे। उड़ै तिरंगा नभ मँह जइसे।।

उमड़ रहा मन सिन्धु है, प्रवल ज्वार का वेग।
कितना आशीशूँ तुम्हे, हृदय-भाव-उद्वेग।।
मोदी तूँ शत ना जियो, जियो कोटि महशंक।
लगे आयु ‘सहदेव’ की, बजे विजय का डंक।।

~ पंडित सहदेव पाण्डेय ‘सांकृत्यायन’

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