सहारनपुर की घटना से सकते में है संघ परिवार

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संघ परिवार की सबसे बड़ी चिंता यही है कि सहारनपुर की हिंसा दलितों के खिलाफ अगड़ों की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है. संघ दलितों के खिलाफ हो रही घटनाओं से भी काफी चिंतित है. संघ को इस बात का डर सता रहा है कि दलितों के भीतर भरोसा बहाली और उन्हें अपने साथ जोड़ने की कवायद को इस तरह की घटनाओं के कारण झटका लग सकता है…

~ राजेश कुमार दूबे

सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों और ठाकुरों के बीच की लड़ाई ने इस कदर हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है, जिसकी आग में योगी सरकार के सबका साथ सबका विकास का नारा फुस्स होता दिख रहा है. बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि यहां दलित तबका उससे नाराज है. अभी हाल ही में हुए यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त अमित शाह ने सोशल इंजीनियरिंग का जो ताना-बाना बुना था, उसमें बीजेपी की परंपरागत अगड़ी जातियों के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ी जातियों की गोलबंदी की गई थी. इसके अलावा दलित तबके का भी बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ रहा था. तभी जाकर बीजेपी पहले लोकसभा चुनाव 2014 में और फिर विधानसभा चुनाव में इस कदर बड़ी जीत दर्ज करने में सफल रही थी. लेकिन, सहारनपुर की घटना के बाद दलित तबके का बीजेपी से मोहभंग हो सकता है. इस बात को बीजेपी के विरोधी भी समझते हैं. यूपी की सियासत में इस वक्त हाशिए पर जा चुकी मायावती फिर से खड़ा होने के मौके के तौर पर इसे देख रही हैं.

मायावती ने सहारनपुर पहुंचकर दलित तबके के साथ-साथ पिछड़े और ब्राह्मण समुदाय के लोगों को भी साधने की कोशिश की है. मायावती इस तरह के संदेश देकर यूपी के पिछड़ों को बताना चाहती हैं कि बीजेपी ने पिछड़ों और दलितों को साध कर सत्ता पाई लेकिन, सिंहासन पर अगड़ी राजपूत जाति से आने वाले योगी आदित्यनाथ को बैठा दिया. सहारनपुर के भीतर लडाई भी दलित बनाम ठाकुर ही है. लिहाजा मायावती ने इस पूरे मामले को योगी की जाति से जोड़कर इसका सियासी फायदा लेने की कोशिश की है. इसी बात से बीजेपी डरी हुई लग रही है. बीजेपी को लगता है कि इस तरह से संदेश जाने से 2019 की यूपी की लड़ाई में उसके लिए मुश्किलें हो सकती हैं.

दरअसल, मायावती इस वक्त सहारनपुर से ही अपने लिए एक नई उर्जा देख रही हैं. उनको यह लगने लगा है कि जब ‘चंद्रशेखर’ जैसे लोग भीम आर्मी के जरिए दलित आंदोलन को बड़ा कर सकते हैं तो एक बार फिर से वो अपनी बुनियाद को मजबूत क्यों नहीं कर सकती? लेकिन, अंदर खाने मायावती के भीतर एक बेचौनी भी साफ झलक रही है. डर है कि यूपी के भीतर उनके सफाए के बाद दलित राजनीति के केंद्र में ‘चंद्रशेखर’ जैसे नायक उनके स्पेस को न दखल कर लें. वरना मायावती सहारनपुर पहुंचने की इतनी जल्दबाजी नहीं करती. संघ परिवार की सबसे बड़ी चिंता यही है कि सहारनपुर की हिंसा दलितों के खिलाफ अगड़ों की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है.

एक तरफ संघ परिवार की तरफ से जहां अलग-अलग जगहों पर घरवापसी की मुहिम चलाई जा रही है वहीं दूसरी तरफ दलित परिवारों के हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने की खबरें भी उसी यूपी से आ रही हैं जहां संघ का सबसे बड़ा गढ़ है और यहां तक की अब सूबे का मुखिया भी हिंदुत्व के चेहरे योगी आदित्यनाथ हैं.

आरएसएस के करीबी सूत्रों के मुताबिक, संघ दलितों के खिलाफ हो रही घटनाओं से काफी चिंतित है. संघ को इस बात का डर सता रहा है कि दलितों के भीतर भरोसा बहाली और उन्हें अपने साथ जोड़ने की कवायद को इस तरह की घटनाओं के कारण झटका लग सकता है. यही वजह है कि संघ के मंडल स्तर के भी शाखाओं में जाने वाले स्वयंसेवकों को इस बात का निर्देश दिया जा रहा है कि वो अपने क्षेत्र में दलित समुदाय के लोगों से संपर्क में रहें और उनके भीतर की गलतफहमी को दूर करने की कोशिश भी करें.

इसके पहले रोहित बेमुल्ला की घटना और गुजरात के ऊना की घटना ने भी संघ को हिला कर रख दिया था. अब सहारनपुर की घटना के बाद संघ ज्यादा सतर्क हो गया है. संघ को डर है कि इस तरह की घटनाओं के चलते धर्म परिवर्तन की कोशिशों को बढ़ावा मिलेगा.

गौरतलब है कि संघ ने 2015 की अपनी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में हर गांव में एक कुंआ, एक मंदिर और एक श्मशान के फॉर्मूले को आगे बढ़ाने को लेकर प्रस्ताव पास किया था. संघ की पूरी कोशिश थी कि दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म कर उन्हें हिंदूत्व की डोर में बांधा जाए. लेकिन, इस तरह की घटनाएं उस डोर को तोड़ने का ही काम करेंगी.

संघ परिवार और बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन को फिर से दोहराने की है. इसी कोशिश के तहत यूपी जैसे संवेदनशील राज्य में संघ की सहमति के बाद बीजेपी ने भगवाधारी हिंदूत्ववादी योगी आदित्यनाथ को हाथों में सत्ता की कमान सौंप दी थी. सबको इस बात की उम्मीद थी कि योगी के चेहरे को सामने रखकर जात-पात की गुटबाजी से उपर उठकर हिंदुत्व के चेहरे के सहारे बीजेपी सबको साध लेगी. लेकिन, इस तरह की घटनाओं ने बीजेपी को सकते में डाल दिया है.