‘कमल’ के तालाब में ‘हाथी’

6 months ago Madanji 0

cercasi esperti trading online —-कृपांशु प्रकाश  
निकाय चुनाव ‘हाथी रिर्टन’ सवाल बहुतेरे हैं लेकिन यह जवाब उन राजनीतिज्ञ पंडितों के लिए जिनका आंकलन था कि ‘माया हैज गॉन’ लेकिन ऐसा नहीं। मायावती की खामोशी में और उनके बुरे दौर में उनका सालिड वोट एक बार फिर उनकी ओर मुड़ चला है। निकाय चुनाव तो खैर यही बता रहे हैं। बसपा के खामोश वोटर ने सपा-भाजपा-कांग्रेस के अन्दर हिचकोले ला दिया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अगर अब तक विपक्ष की भूमिका में कोई मजबूती के साथ खड़ा नजर आ रहा था तो वह समाजवादी पार्टी थी लेकिन स्थानीय चुनावों परिणामों ने सारे समीकरण बदल दिये हैं। वहीं भाजपा के लिए ‘हाथी’ का यह रूख इसलिए आवाक पूर्ण है क्योंकि बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मायावती के सालिड वोट का रूझान भाजपा की तरफ पाया गया लेकिन अबकी बार मायावती की वोट गठरी पुनः मायावती के पास आने के संकेत दे रहे हैं। और अगर यह सच है तो आगे आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत के आंकड़े बदलेंगे। क्योंकि निकाय चुनाव में अधिक सीटों के बावजूद बीते विधानसभा चुनाव की तुलना में भाजपा के मत प्रतिशत मंे काफी कमी आ गयी है। यानी वोटों के तालाब में ‘हाथी’ का प्रवेश ‘कमल’ को नुकसान जरूर पहुंचायेगा। वहीं कांग्रेस भी अब सोचने पर मजबूर हो गयी है की जिस यार के कन्धें पर कांग्रेस बन्दूक चलाना चाह रही थी वह यार अखिलेश यादव निकाय चुनाव में कोई खास ताकत नहीं दिखा पाये। तो ये यारी आखिर कब तक? क्या कांग्रेस अपना यार बदलेगी? या फिर अकेले…?

För Viagra 200 mg utan recept इन आंकड़ों के बीच अब की बार हुए निकाय चुनाव काफी खास रहे। खास इसलिए क्योंकि राजनीतिज्ञ दलों के भावी समीकरण इस चुनाव में हुए मतदान के ऊपर निर्भर होंगे, ऐसा अनुमान है। यह संकेत लोकतंत्र के लिए शुभ हैं। क्यों की लोकतंत्र में हर चुनाव की कीमत होनी चाहिए और इस बार काफी कीमत रही। राजनीति दलों ने अपने पार्टी सेम्बल पर अपने उम्मीदवार खड़े किये। यहाँ तक मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के लिए जोर शोर से प्रचार प्रसार किया। और उसका रिजल्ट भी सामने आया। इसमें कोई दो राय नहीं की इस चुनाव में भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने में उसके संगठन ने कोई कमी नहीं छोंड़ीं। भाजपा ने पोलिंगबूथ तक अपनी टीम को मजबूत किया। 

le iene servizio opzioni digitali वहीं विपक्ष में बैठे अखिलेश यादव से जो उम्मीद थी वह नहीं कर पाये। अपने पार्टी चुनाव सेम्बल पर उन्होंने टिकट तो जरूर दिया लेकिन अपने कार्यकत्ताओं के लिए वह आगे नहीं आये। टिकट बटवारें को भी सपा ने कोई गम्भीरता से नहीं लिया। निकाय चुनाव में सपा कार्यकत्तओं की स्थित वैसी ही थी जैस युद्ध में सेना की स्थित उसके राजा के बिना। और जब राजा घर बैठा हो तो सेना युद्ध कैसे लड़ेगी यह बात बताने की जरूरत नहीं है। इस चुनाव में सपा कार्यकत्ताओं ने अपने बल-बूतें दांव खेला और जो भी उसे मिला वह कार्यकर्ताओं की स्वयं की ताकत रही। इन चुनाव में सपा कार्यकत्ता काफी निराश नजर आये।क्योंकि उनके सामने स्वयं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मोर्चा संभाल रहे थे वहीं सपा अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ का मजाक बनाने में जुटे रहे। भाजपा के लिए सबसे अच्छी बात यह रही कि उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दिया। निकाय चुनाव के लिए घोषणा-पत्र के जरिये भी अपनी बात रखी। 

http://gsc-research.de/gsc/research/hv_berichte/detailansicht/index.html?tx_mfcgsc_unternehmen[uid]=89 निकाय चुनाव में यह साबित कर दिया की अभी भी अखिलेश यादव के पास चापलूसों की फौज है। अपनी जमीनी हकीकत को जाने बिना टिकट बंटवारा करते हैं। जिससे उनका कार्यकर्ता पहले ही हिम्मत तोड़ देता है। विधानसभा चुनाव की भाँति इस बार भी अखिलेश यादव ने अपनी पुरानी गलती दोहरा दी और जिसका खामियाजा कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ा। 

binäre optionen kostenlos testen वहीं बसपा प्रमुख ने भले ही अपनी पार्टी के लिए प्रचार-प्रसार न किया हो लेकिन सीट बटवारें में काफी समझदारी दिखायी जिससे निचले पायदान पर बैठी बसपा निकाय चुनाव में दूसरे नम्बर पर आ गयी और जिससे बसपा के कार्यकर्ताओं में भी नया उत्साह देखने को मिल रहा है। 

http://www.sme-ae.it/?bioske=stockpair-conto-demo&a89=89 इन सबके परे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पार्टियों को ठेंगा दिखाते हुए बहुतायत संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत ने यह साबित कर दिया है कि जनता को पार्टियों के प्रोपगेंडे की सहायता से अब बहुत समय तक भ्रमित नहीं किया जा सकता है। जनता के लिए व्यक्ति की छवि महत्वपूर्ण है। 

poweroption demo लोकतंत्र के इस उत्सव में एक बार फिर नगरीय मतदाता ज्यादा जागरूक निकला। शहरी मतदान का मत प्रतिशत नगरीय मतदान के मुकाबले मात्र आधे में सिमट गया। तो सवाल यह भी है कि  संविधान में दिये अधिकारों का प्रयोग जब आप नहीं करते हैं और उसके उपरान्त मुद्दों को उठाते हैं तो बेसक आप खुद कठघरें में खड़े नजर आते हैं। 

enter site लेकिन इस बार चुनाव आयोग की भी खामियां काफी देखने को मिली। जो वोट देने गये उनकी पर्ची ही नहीं मिली और अगर मिली तो उसके बदले कोई दूसरा वोट डाल चुका था। इसके अलावा वोटिंग मशीन की लगातार आ रही शिकायतें भी चर्चा का विषय रहीं। इन खामियों को सुधारना होगा, क्योंकि आजादी के बात क्षेत्रीय स्तर पर जिस तरह से राष्ट्रीय मीडिया ने लोकल मुद्दों को कवरेज देना शुरू कर दिया है। उससे यह साफ हो गया है कि लोकतंत्र और भी खूबसूरत और जंवा हो चला है। 

go to link अब सवाल ये भी है कि भाजपा की लगातार बढ़ती स्वीकार्यता क्या ‘नोटबंदी’ के बाद ‘जीएसटी’ जैसे नये कानूनों पर जनता ने अपनी सहमती की मोहर लगा दी है? जबकि यह आंकलन भी किया जा रहा है देश में अर्थव्यवस्था चौपट स्थित में है और मंहगाई व बेरोजगारी का दंश चरम पर है। तो उक्त घटनायें हमें नये सिरे से सोचने पर मजबूर करती हैं।