कुछ दिल की

भाग्य-विधाता

4 months ago Editor 0
भाग्य-विधाता अबोध नहीं, बज्र मूर्ख है क्योंकि नहीं बताया गया उसको कभी उसके अधिकार और कर्तव्य व स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व और जनतंत्र के अर्थ, न ही किया गया है कोई भी सार्थक प्रयास उसके विवेक की जागृति का, और बनाने का उसे सक्षम, आत्म-निर्भर व स्वाभिमानी ताकि वह बन सके पात्र किसी की दया तथा Read More

भारतीय अर्थव्यवस्था को नाज…

4 years ago राजेश कुमार 0
प्याज रे प्याज, तुझपे है भारतीय अर्थवस्था को नाज. रूपया तो लुढक गया पर तूने मुकाबला किया. डालर के मुकाबले रूपया 65 पर गिरा धड़ाम, पर तूने लगायी है 60 की छलांग प्याज रे प्याज तुझपे है भारतीय अर्थव्यवस्था को नाज… गर तू किया होता मुकाबला तो देश की इज्जत मिट्टी में मिल जाती केन्द्र Read More

कोई चेहरा

4 years ago डॉ. प्रतिमा शर्मा 0
यादों की झुरमुट से झाँकता कोई चेहरा न  जाने क्यों बहुत अपना लगता है , गुजरा वक्त न जाने क्यूँ एक सपना लगता है, कुछ तुमसे कहना और कुछ सुनना चाहती हूँ, वक्त की बेबसी में सब भुलाना पड़ता है, कहीं जाने से पहले मुझे बताना तुम्हारी आदत में शुमार था, फिर जाने से पहले Read More

गज़ल

4 years ago अशोक रावत 0
वो समय वो जमाना रहा ही नहीं, सच कहा तो किसी ने सुना ही नहीं. बात इतनी सी है क्या मिला अंत में, हम ने ये कब कहा, कुछ हुआ ही नहीं. एक रंगीन नक्शों की फाइल तो है, सिलसिला इस के आगे बढ़ा ही नहीं. खोट चाहत में था या कि तकदीर में, जिसको Read More

पराजय की त्रासदी

4 years ago गिरिजेश तिवारी 0
एक और दाँव हारा मैंने, एक और पराजय देख लिया, एक और आज रिश्ता टूटा, एक और आज बन्धन छूटा। एक और सहारा छूट गया, एक और आज भ्रम टूट गया, मेरी उम्मीद और ही थी, उसकी मनमानी जारी है, उसको बर्बाद देखने की मेरी कैसी लाचारी है! कोशिश की बहुत बचाने की, हर कदम Read More