कुछ दिल की

भाग्य-विधाता

6 months ago Editor 0
भाग्य-विधाता अबोध नहीं, बज्र मूर्ख है क्योंकि नहीं बताया गया उसको कभी उसके अधिकार और कर्तव्य व स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व और जनतंत्र के अर्थ, न ही किया गया है कोई भी सार्थक प्रयास उसके विवेक की जागृति का, और बनाने का उसे सक्षम, आत्म-निर्भर व स्वाभिमानी ताकि वह बन सके पात्र किसी की दया तथा