सिया का अंतर्द्वंद्व

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एक नारी को त्याग कर पवित्र हो गए।
आप मर्यादा पुरुष के चरित्र हो गए।।
वो धरती की पुत्री थी धरती में लीन हो गई।
अग्नि परीक्षा के दर्द को सह कर विलीन हो गई।
दोष क्या था? क्या सचमुच मैं अबला थी?
शिव के धनुष को उठाने वाली मैं ही सबला थी।
मैंने तो सब त्याग दिया आप की खातिर
क्या राजसी सुख क्या स्वर्ण, क्या महल
मेरे सुख तो आप थे बस एक कुटिया व जंगल।
क्या स्वर्ण मृग एक भरम भर था
या फिर नारी की नियति का करम भर था?
उस मृग छौने को मै पहचान न सकी
नियति के खेल को मै जान न सकी।
मेरे प्रभु, आप तो अंतर्यामी व उत्तम पुरुष तत्व ज्ञानी थे।
आपके भ्रम से मै अनजान रही सृष्टि के नियमों का
मुझे कोई भान नहीं! मेरी इस नियति में,
आपका मौन भी शामिल था?
सृष्टि के सर्वाधिक शक्ति पुरुष की अर्धांगिनी को राजपाट
व महल का लोभ कहाँ था
छूटा ये सब पर क्षोभ कहाँ था।
मेरे प्रभु मैने तो सब त्याग दिया था
मेरे पास सिर्फ़ सतीत्व व संबंधों की मर्यादा ही थी।
इनके आगे सोने की लंका भी धूल थी
पर इन सब में मेरी भी कोई भूल थी।
मेरे तत्व ज्ञानी ये पतिव्रता स्त्री
और मर्यादा पुरुष के संबंधों का सवाल है?
ये युगों-युगों तक कायम रहेगा अनवरत!

-संदीप स्नेह
पटना।

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