जनता के सवाल को राजनीतिक दल का सवाल बना देने वाले राम गोविंद चौधरी को दी श्रद्धांजलि

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आजमगढ़ के मंदुरी में एयरपोर्ट के नाम पर जब जमीन छीनी जा रही थी तो किसानों के साथ खड़े हो गए थे राम गोविंद चौधरी : संदीप पाण्डेय


लखनऊ/आज़मगढ़। स्व. राम गोविंद चौधरी जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि जनता के सवाल को राजनीतिक दल का सवाल बना दें! रामगोविंद जी से कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं रहा। पिछले चुनाव और आजमगढ़ के मंदुरी में एयरपोर्ट के नाम पर जब जमीन छीनी जा रही थी तो दारुलसफा में संदीप पाण्डेय जी द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में मुलाक़ात हुई! उस दौरान जब हम लोग एक पदयात्रा करने जा रहे थे कि पुलिस ने संदीप जी समेत पदयात्रियों को रोका और फिर एसटीएफ ने रास्ते से मुझे उठा लिया था।
एक-दो बार पवन भाई से बात हुई पर मिल न सकें। जो नेता नीतिगत आधार पर बात करते हैं उनसे मिलने-सीखने की आकांक्षा रहती है।
दारुलसफा की बैठक में राम गोविंद जी ने बेबाकी से यहीं से बात शुरू कि की वो व्यक्तिगत आधार पर आए हैं क्योंकि हो सकता है इस बात से उनकी पार्टी सहमत न हो। लेकिन किसानों का सवाल है इसलिए वह खिरिया बाग आंदोलन की किसानों की जमीन न छीने जाने की मांग समर्थन करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि इस हवाई पट्टी को एयरपोर्ट बनाने की प्रक्रिया उनकी ही सरकार में शुरू हो चुकी थी, पर किसान जमीन नहीं देना चाहते तो हम उनके साथ हैं।
इस मुद्दे पर जब आजमगढ़ के तत्कालीन जिलाधिकारी विशाल भारद्वाज ने हम लोगों से कहा कि आप जन प्रतिनिधि नहीं हैं कि आपकी बात माने तो हम लोगों ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव से मांग की कि वह इस सवाल को सदन में उठाएं।
अखिलेश यादव जी ने जहां तक याद आ रहा 23 फरवरी 2023 को इस सवाल को सदन में उठाया कि किसानों की जमीन न छीनी जाए।
यह राम गोविंद जी की वजह से ही संभव हुआ।
संदीप पाण्डेय बताते हैं कि इसी तरह समान शिक्षा प्रणाली लागू करने और सुधीर अग्रवाल के फैसले की सरकारी कर्मचारी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं के बाद इस सवाल को जब उन्होंने उठाया तो राम गोविंद जी ने इसका समर्थन करते हुए अपनी नाती-नतिनी या पोता-पोती मुझे याद नहीं आ रहा किसी एक का सरकारी स्कूल में एडमिशन करा दिया। और शायद उसके बाद वो मंत्री पद से हटा भी दिए गए थे।
आज के दौर में बहुत से सवाल हैं जिसको विपक्ष सत्ता में रहते हुए नहीं सुनता था। रामगोविंद जी जैसे नेता जनता और सत्ता के बीच पुल का काम करते थे।
शायद ऐसा इसलिए भी कि वह विरोध की राजनीति और प्रतिरोध की संस्कृति को समझते थे, सम्मान देते थे और जानते थे कि लोकतंत्र की यह बुनियाद है।
राम गोविंद जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि जनता के सवालों को उठाएं चाहे वह अपनी पार्टी की नीति के खिलाफ क्यों न हो। क्योंकि इसी प्रक्रिया में कोई भी राजनीतिक दल जनता के सवालों से संवाद करता है और खुद को भी परिपक्व करता है।

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