भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में श्रम की प्रतिष्ठा और प्रत्येक व्यवसाय की गरिमा पर हुआ मंथन।
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. हरित्मा चोपड़ा के मार्गदर्शन, उपप्राचार्या प्रो. ज्योति सिंह के सहयोग तथा विदुषी अरुन्धती भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र के नोडल अधिकारी एवं समन्वयक डॉ. प्रमोद कुमार सिंह के नेतृत्व में 14 अक्टूबर 2026 को श्रम, व्यवसाय और सम्मान – भारतीय ज्ञान परंपरा का दृष्टिकोण विषय पर अंतरराष्ट्रीय विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। यह आयोजन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड साइंसेज, अमेरिका तथा काउंसिल ऑफ इंडिक स्टडीज एंड रिसर्च, नई दिल्ली के सहयोग से सुसंपन्न हुआ। विषय की समसामयिक प्रासंगिकता एवं औचित्य का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि कार्यक्रम प्रारंभ होने से पूर्व ही सभी निर्धारित सीटें भर गई थीं, जो इस विषय के प्रति प्रतिभागियों की गहरी रुचि को दर्शाता है।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मैत्रेयी महाविद्यालय की प्राचार्या एवं विदुषी अरुन्धती भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र की निदेशिका प्रो. हरित्मा चोपड़ा के द्वारा प्रस्तुत स्वागत वक्तव्य से हुआ, जिसमें उन्होंने दैनिक जीवन में विभिन्न श्रमिकों और सेवा-कर्मियों के योगदान की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने घरेलू सहायकों तथा अन्य सेवा-कर्मियों के श्रम, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के कार्य का मूल्यांकन उसकी जाति, सामाजिक पृष्ठभूमि अथवा परंपरागत व्यवसाय के आधार पर नहीं, अपितु उसके कौशल और समाज में योगदान के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने विषय की प्रासंगिकता एवं सामाजिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए इस प्रकार के अकादमिक आयोजनों की आवश्यकता पर बल दिया तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन, अनुसंधान और समकालीन संदर्भों में उसके प्रसार की दिशा में विदुषी अरुंधती भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र द्वारा किए जा रहे प्रयासों की मुक्तकण्ठ से सराहना की।
कार्यक्रम की प्रथम वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामाजिक व्यवस्था अध्ययन केंद्र की सहायक आचार्या डॉ. आकृति भाटिया ने अपने उत्कृष्ट एवं विचारोत्तेजक व्याख्यान में श्रम और व्यवसायों को सामाजिक असमानताओं, जाति, वर्ग तथा लैंगिक संबंधों के व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विषय को भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। भगवद्गीता, कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा वैदिक कालीन चिंतन में कर्म, श्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के संदर्भ में उन्होंने श्रम की गरिमा, पारंपरिक कौशल तथा व्यावहारिक ज्ञान के महत्त्व को स्पष्ट किया। उन्होंने ऐप-आधारित सेवा-कर्मियों, निर्माण-श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी पर सामान बेचने वालों की समस्याओं का उल्लेख करते हुए सामाजिक सुरक्षा, कानूनी संरक्षण और सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियों की आवश्यकता बताई। साथ ही, महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम का प्रश्न उठाते हुए उन्होंने श्रम के प्रति समानता और सम्मान की शुरुआत परिवार से करने तथा प्रचलित सामाजिक धारणाओं पर पुनर्विचार करने का आह्वान किया। उनके व्याख्यान को प्रतिभागियों ने रुचिपूर्वक सुना। प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. आकृति भाटिया ने प्रतिभागियों द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के अत्यंत स्पष्ट, विस्तृत, तर्कपूर्ण एवं प्रभावशाली उत्तर दिए। उनके उत्तरों ने विषय के विभिन्न सामाजिक पक्षों को और अधिक गहराई से समझने में सहायता की तथा संवाद को सार्थक और ज्ञानवर्धक बनाया।
मुख्य अतिथि इंडोनेशिया स्थित विजया कुसुमा विश्वविद्यालय में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) की भारतीय अध्ययन पीठ की अध्यक्ष प्रो. कौशल पंवार ने भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में कर्म, श्रम और मानवीय गरिमा के संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि समाज में चिकित्सक, अभियंता, शिक्षक और प्रशासक जैसे व्यवसायों को अधिक प्रतिष्ठा देने की प्रवृत्ति के बीच किसान, बढ़ई, लोहार, सफाईकर्मी, घरेलू सहायक और पारंपरिक शिल्पकार जैसे श्रमिकों के योगदान को भी समान महत्त्व दिया जाना चाहिए। भगवद्गीता के कर्मयोग संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कर्म को केवल आजीविका का साधन न मानकर कर्तव्यनिष्ठा, उत्तरदायित्व और समाज के प्रति योगदान का माध्यम बताया। बनारसी रेशमी साड़ियों सहित पारंपरिक हस्तशिल्प के उदाहरणों से उन्होंने पीढ़ियों से संचित ज्ञान, कौशल और रचनात्मकता के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यवसाय की प्रतिष्ठा का आधार केवल आय, पद अथवा सामाजिक स्थिति नहीं, बल्कि उसमें निहित कौशल, गुणवत्ता, नैतिकता और समाजोपयोगिता होनी चाहिए। भारतीय परंपरा के लोककल्याणकारी आदर्शों का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक प्रकार के श्रम के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के अंत में केंद्र के नोडल अधिकारी एवं समन्वयक तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के डिप्टी डीन, स्टूडेंट्स वेलफेयर डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने धन्यवाद-ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सर्वप्रथम मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता प्रो. कौशल पंवार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए विदेश में भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी और संस्कृत, के प्रचार-प्रसार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में उनके योगदान की सराहना की। इसके पश्चात् उन्होंने प्रथम वक्ता डॉ. आकृति भाटिया के उत्कृष्ट एवं विचारोत्तेजक व्याख्यान की प्रशंसा की। उन्होंने प्राचार्या प्रो. हरितमा चोपड़ा के मार्गदर्शन और उपप्राचार्या प्रो. ज्योति सिंह के सहयोग के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। साथ ही, कार्यक्रम का कुशल संचालन करने वाली डॉ. मृदुस्मिता सिंह तथा केंद्र के सभी सहयोगियों को धन्यवाद दिया। अंत में, उन्होंने श्रम की गरिमा और प्रत्येक कार्य के सम्मान का संदेश देते हुए केंद्र की भावी गतिविधियों में सभी के निरंतर सहयोग की अपेक्षा व्यक्त की। गौरतलब है कि कार्यक्रम का कुशल संचालन मैत्रेयी महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की सहायक आचार्या डॉ. मृदुस्मिता सिंह ने किया। उन्होंने दोनों वक्ताओं के विचारों को विषय के केंद्रीय प्रश्नों से जोड़ते हुए चर्चा को प्रभावी दिशा प्रदान की। कार्यक्रम में तकनीकी सहयोग समाजशास्त्र विभाग के श्री पवन हर्षना तथा गणित विभाग की डॉ. नीलिमा ओहरी ने प्रदान किया। साथ ही विदुषी अरुंधती भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र की डॉ. मीनू कुमारी, डॉ. हेमलता रानी सहित केंद्र के सभी सदस्यों ने कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
