अदबी महफिल में देर रात तक गूंजे शेर-ओ-शायरी, जयंकर सिंह का हुआ अभिनंदन

0Shares

 


शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध, मुख्य अतिथि बोले- साहित्यिक आयोजन सामाजिक एकता को देते हैं मजबूती।

 

बहराइच। नानपारा नगर में आयोजित शाम-ए-गजल मुशायरे में शेर-ओ-शायरी की ऐसी महफिल सजी कि देर रात तक श्रोता अदबी रंग में डूबे रहे। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे शायरों ने अपने कलाम से खूब वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए जयंकर सिंह का वरिष्ठ साहित्यकार एम. रशीद ने बुके भेंटकर स्वागत और अभिनंदन किया। इस अवसर पर नानपारा नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन अब्दुल मोईद उर्फ राजू और पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष नसीबुन्निशा उर्फ मलूकन भी मौजूद रहीं।
मुख्य अतिथि जयंकर सिंह ने कहा कि साहित्य समाज को जोड़ने और लोगों के बीच आपसी सद्भाव बढ़ाने का सशक्त माध्यम है। मुशायरे और कवि सम्मेलन जैसे आयोजन सामाजिक दूरियां मिटाने के साथ समाज में सकारात्मक वातावरण तैयार करते हैं। उन्होंने ऐसे साहित्यिक आयोजनों को आगे भी अपना सहयोग देने का आश्वासन दिया।
मुशायरे के कन्वीनर मोहम्मद अदीब नानपारवी और लाल नानपारवी के संयोजन में आयोजित इस महफिल की निजामत कमर खैराबादी ने की। शुरुआत से ही शायरों के कलाम पर श्रोताओं की दाद मिलती रही। एम. रशीद बहराइची ने अपना कलाम पेश करते हुए कहा, ‘तोड़ के सारे रिश्ते नाते छोड़ के धरती अम्बर आऊं, मेरे अंदर तू आ जाए या मैं तेरे अंदर आऊं।’ जिया खैराबादी ने सुनाया, ‘माल व जर की हो अगर बात तो दे दूं हंस कर, अब तो जालिम की नजर में मेरी अंगनाई है।’


इकबाल यूसुफ लखनवी ने अपने शेर से महफिल में जज्बात का रंग भरा, ‘महसूस हुआ लहजे में बरकत नहीं आई, जब मेरे बुलाने से वो औरत नहीं आई।’ शगुफ्ता अंजुम लखनवी ने अपनी शायरी में दुआ और मोहब्बत का एहसास कुछ यूं बयां किया, ‘चाहती है ये शगुफ्ता तेरा दर रोशन हो, मेरा दिल है कि तेरे हक में दुआ चाहता है।’
कमर खैराबादी के शेर, ‘जितनी पीकर आप इतराते हैं महफिल में, इतनी तो अक्सर छलक जाती है मेरे जाम से’ पर श्रोताओं ने खूब दाद दी। लाल नानपारवी ने नफरत के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए कहा, ‘शोले भड़केंगे तो आ जाओगे तुम भी जद में, आग नफरत की लगाओगे तो जल जाओगे।’ घायल खैराबादी ने आम आदमी की मुश्किलों को शेर में ढालते हुए पढ़ा, ‘पूछो ना क्या बताऊं मैं रोटी की दौड़ में, पतलून यूं फटी है कोई सिल नहीं रहा।’


नजर बहराइची ने अपनी शायरी में उम्मीद का पैगाम देते हुए कहा, ‘तमाम शहर अंधेरों की बात करता है, मैं जुगनू की तरह जगमगाते रहता हूं।’ वहीं मेराज नानपारवी के शेर, ‘जिधर देखा उधर पोशाक की तंगी नजर आई, अदब से दूर इक लड़की बहुत नंगी नजर आई’ ने भी श्रोताओं का ध्यान खींचा।
मोहम्मद हसन नानपारवी ने ‘खाक फिर खाक है आखिर को उड़ा दी गई है, यानी होने की मेरे मुझको सजा दी गई है’ सुनाया तो उमर नानपारवी ने ‘अब तो करनी है हमें खुद ही हिफाजत अपनी, कौन है अपना मददगार खुदा खैर करे’ के जरिए खूब वाहवाही लूटी।


महफिल में सरपरस्त सौसन नानपारवी, जिया खैराबादी, मोहम्मद कासिम, फौजिया बहराइची और कमर खैराबादी समेत तमाम साहित्यप्रेमी मौजूद रहे। शाकिर नानपारवी, गुलाम खैराबादी, मोहम्मद नसीम, मेराज शिवपुरी, हसन नानपारवी, मेराज नानपारवी, आरिफ नानपारवी, शहनवाज बहराइची और मोहम्मद सलीम सहित अन्य शायरों ने भी अपने कलाम पेश किए। आयोजक मंडल ने अतिथियों और शायरों का स्वागत किया। देर रात तक चली इस अदबी महफिल का श्रोताओं ने तालियों और दाद के साथ आनंद लिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *