आज़मगढ़ में बेखौफ होकर भू-माफिया करा रहे बैनामा, कहाँ से आ रही है आय से अधिक सम्पत्ति?

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वाराणसी के भूमि संरक्षण अधिकारी कहीं भू-माफिया तो नहीं? तथ्यगोपन कर स्टाम्प चोरी का लग रहा है आरोप?

आज़मगढ़। योगी जी ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया था तब उन्होंने गरीबों की भूमि को भू-माफिया के चंगुल से मुक्त/बचाने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया था। जिसका कार्य जब तक सराहनीय था, तब तक आमजन का जीवन कुछ शान्तिपूर्ण व्यतीत हो रहा था। किन्तु सच्चाई यह है कि सरकार आज भी भू-माफिया रूपी बहुरूपिया दानव का अन्त करने में विफल रही है। जिसके परिणाम स्वरूप ये भू-माफिया रूपी बहुरूपिया रह-रहकर आज भी कालिया नाग की तरह फुंकार रहे हैं।
आज हम बात करेंगे एक ऐसे प्रजाति के अधिकारियों व कर्मचारियों की, जो भ्रष्टाचार के गर्भ से उत्पन्न होकर भू-माफियाओं के रूप में निर्विघ्न विचरण कर रहे हैं। वर्तमान में एक ऐसी ही घटना प्रकाश में आई है।
बात बीते 25 अगस्त की है, मेरे एक परिचित बन्धु का फोन आया कि ए.के.पाण्डेय (अरविन्द कुमार पाण्डेय) सर के गाँव कोठिया, रानी की सराय चलना है। सर के भाई करुणानिधि पाण्डेय से उनकी बिना बंटवारा वाली पैतृक जमीन कोई लिखवा लिया है। उसी का कागज़ देखना है और विधिक सलाह देनी है।

अधिकारी द्वय की आय व सम्पत्तियों की हो निष्पक्ष जाँच

वाराणसी के भूमि संरक्षण अधिकारी एवं आज़मगढ़ के मृदा इंस्पेक्टर के आय और नौकरी के दौरान अवैध तरिके से तथ्यगोपन कर अर्जित की गई सभी सम्पत्तियों की निष्पक्ष जाँच हो। ताकि यह तथ्य भी प्रकाश में आये कि अपनी सेवा के दौरान उपरोक्त अधिकारी द्वय ने अपने एवं अपने परिजनों आदि के नाम से जनपद आज़मगढ़ व इसके अलावा अन्य किन-किन जनपदों में कहाँ-कहाँ भूमि-भवन आदि क्रय करके वैधावैध सम्पत्ति अर्जित किया है?
क्योंकि करोड़ों की सम्पति क्रय करने के बाद करोड़ों की सम्पति क्रय करने के लिए तैयार रहना, स्वयं में गम्भीर विचारणीय विषय एवं जाँच का विषय है?

मौके पर पहुंचकर मैंने भूमि की नवैयत देखी और इसके बाद उक्त भूखण्ड के समीपस्थ स्थित एक ईंट के भट्ठा पर बैठकर दस्तावेज देख ही रहा था कि एक व्यक्ति आया और मिस्टर पाण्डेय सर से कहा कि सर, एक आदमी पुलिस की डायल-112 के साथ आये हैं और आपको बुला रहे हैं। उनके (ए.के. पाण्डेय) कहने पर मैं भी साथ चला गया। अपरिचित आगन्तुक ने अपना नाम जयहिन्द यादव बताया और कहा कि मैं कोटवा फार्म स्थित कृषि विभाग के कार्यालय में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हूँ। और यह जमीन मेरी है, मैंने इसका बैनामा लिया है। जब मैंने उनसे पूछा कि आप तो गवाह हैं, बैनामा तो किसी अशोक कुमार यादव जी ने लिया है, जो महुवारी, मेहनगर के निवासी हैं। तब जयहिन्द यादव जी ने कहा कि वह हमारे बड़े भाई हैं, वाराणसी में बीएसए हैं। मेरा प्रतिउत्तर था… आप तो जिला मुख्यालय के उत्तर दिशा में स्थित आराजी अजगरा, रौनापार के हैं? जबकि जिला मुख्यालय के दक्षिण दिशा में स्थित महुआरी, मेहनगर स्थित है? इस पर घबराये जयहिन्द यादव, मेरा हाथ पकड़कर किनारे अपने गाड़ी के पास ले जाते हैं और कहते हैं कि सर की भी जमीन हमें दिलवा दीजिए, जो कीमत कहियेगा? हम दे देंगे। मैंने पूछा कितने में लिए हैं? तो उत्तर मिला- डेढ़ करोड़ में? लेकिन बैनामा में सब सही नहीं दिखाया गया है।
मैंने कहा यह जमीन अरविन्द कुमार पाण्डेय जी को वापस कर दीजिए। जितना पैसा आपने उनके भाई को दिया है, उससे 5 लाख ज्यादा ले लीजिए। इसके बाद दोनों पक्ष आपस में बात करने की बात कहकर वापस चले गए। उल्लेखनीय है कि डायल-112 की पुलिस को सम्भवतः जयहिन्द यादव जी ने ही बुलाया था।
इसके बाद जनहित इंडिया की टीम ने वाराणसी में पदस्थ बीएसए साहब की जानकारी जुटाने में जुटी। जनहित इंडिया की टीम प्रारम्भ में बीएसए का अर्थ जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी समझ रही थी। लेकिन खोज में पता चला कि यहाँ बीएसए का मतलब भूमि संरक्षण अधिकारी है।

करुणानिधि पाण्डेय

कहीं नाजायज दबाव में तो नहीं करवाया गया बैनामा?

रानी की सराय थानान्तर्गत स्थित ग्राम-कोठिया के निवासी स्व. गीता प्रसाद पाण्डेय के दो पुत्र अरविन्द कुमार पाण्डेय व करुणानिधि पाण्डेय हैं। दोनों भाई वर्षों से कानपुर में एक साथ रहते हैं। करुणानिधि पाण्डेय व उनके बच्चों की देखभाल और परवरिश भी अरविन्द कुमार पाण्डेय के परिवार में हुआ है। अरविन्द कुमार पाण्डेय बताते हैं कि बीते कुछ माह पहले करुणानिधि पाण्डेय मानसिक असन्तुलन व अत्यधिक सुरा सेवन के चलते घर से अलग होकर अन्यत्र रहने लगे। जिसका लाभ उठाकर भू-माफिया व दलाल किस्म के लोग चुपके से उन्हें कानपुर से उठाकर आज़मगढ़ ले आये और दिनांक 21 अगस्त 2026 के बिना बंटवारे की भूमि का उनका आधा हिस्सा हाई-वे की ओर का बैनामा करवा लिये। जबकि उक्त भूखण्ड के लिए करुणानिधि पाण्डेय ने अपने बड़े भाई से थोड़ी-थोड़ी करके 10 लाख नगद और 50 लाख का चेक भी भी लिया है। इसलिए बैनामे की दाखिल खारिज से पहले इस बात की निष्पक्ष जाँच भी जरूरी है कि कहीं नाजायज दबाव में तो नहीं करवाया गया है बैनामा?

इस दौरान जनहित इंडिया की टीम को यह भी पता चला कि भूमि संरक्षण अधिकारी महोदय सरकार की ड्यूटी कम अपने और अपने परिजनों के नाम से भूमि संरक्षित करने की ड्यूटी पूरे मनोयोग से कर रहे हैं। इस कार्य को वह अपने विभागीय कर्मचारियों से मिलकर करते हैं। ताकि एक दूसरे के काली करतूतों को कोई उजागर न कर सकें? विश्वस्त सूत्रों की मानें तो तथाकथित बीएसए साहब (भूमि संरक्षण अधिकारी) ने कुछ दिन पहले अपने गाँव के समीपस्थ गाँव में 6 बीघा जमीन क्रय किया है। लखनऊ के रायबरेली रोड पर साउथ सिटी में एफ-28 नम्बर का फ्लैट भी है, जो सम्भवतः साहब या उनके किसी परिजन के नाम का हो सकता है? जनहित इंडिया को सूत्रों ने यह भी बताया है कि कोठियां के गाटा संख्या 141/0.2570 हेक्टेयर भूमि का आधा भाग तथाकथित बीएसए साहब ने लिखवाया है और शेष आधा इंस्पेक्टर साहब को चाहिए। इसके लिए उपरोक्त दोनों तथाकथित रिश्तेदारों ने पहल भी पिछले 04 सितम्बर को होटल कम्फर्ट में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन किया है और शेष जमीन की कीमत भी डेढ़ करोड़ लगा दिया है।

 अरविन्द कुमार पाण्डेय

यहाँ यह तथ्य भी अत्यन्त ही उल्लेखनीय है कि अरविन्द कुमार पाण्डेय बताते हैं कि मैंने उक्त बैनामा के पहले ही अपने भाई को 50 लाख का चेक और उसकी आवश्यकतानुसार 10 लाख नगद दिया था। इस भूमि के बैनामा में जानबूझकर कर तथ्य गोपन करते हुए स्टाम्प ड्यूटी की भी चोरी की खबर प्रकाश में आ रही है, क्योंकि यह बेहद क़ीमती जमीन वाराणसी-लुम्बीनी 4 लेन के राजमार्ग पर स्थित है। जिसकी चौहद्दी में उक्त मार्ग की हकीकत को छुपाया गया भी प्रतीत होता है?

स्टाम्प चोरी की भी हो जाँच तो निकलेगा रजिस्ट्री विभाग का बड़ा गड़बड़झाला

कोठिया गाँव के श्रीमान करुणानिधि पाण्डेय के हिस्से को नाजायज तरीके से बैनामा लेने वाले व उसकी गवाही करने वाले अधिकारी व तथाकथित रिश्तेदार द्वय द्वारा सोची समझी साजिश के तहत जानबूझकर बड़े पैमाने पर तथ्यगोपन की गई स्टाम्प चोरी की भी जाँच होनी चाहिए। क्योंकि एक अनुमान के मुताबिक उक्त क्रय की गई भूमि की वास्तविक मालियत लगभग 3,05,52,000 (तीन करोड़, पांच लाख, बावन हजार) है। जिसपर कुल स्टाम्प 21,38,640 (इक्कीस लाख, अड़तीस हजार, छ: सौ, चालीस) और सरकारी शुल्क रसीद 3,05,520 (तीन लाख, पांच हजार, पांच सौ, बीस) रुपये अदा किया जाना चाहिए था। किन्तु विलेख पत्र में मालियत 24,05,000 (चौबीस लाख, पांच हजार) दिखाकर स्टाम्प शुल्क 2,73,100 (दो लाख, तिहत्तर हजार, एक सौ) और सरकारी शुल्क रसीद 39,060 (उनतालीस हजार, साठ) रुपये ही अदा किया गया है। यदि उपरोक्त को अवलोकित किया जाय तो काफी हदतक स्टाम्प चोरी सिद्ध होती है।

इसलिए यहाँ सवाल और जाँच का विषय यह है कि साहब के पास इतना धन कहाँ से आ रहा है? क्या उनका सम्बन्ध किसी धन कुबेर से है? क्या ये लोग कोई बड़ा विभागीय घोटाला तो नहीं किये हैं? क्या इनकी आय से अधिक सम्पत्ति की जाँच होगी? क्या इनके द्वारा उक्त बैनामा में की गई स्टाम्प ड्यूटी की चोरी की जाँच होगी? या फिर भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगा रहे ऐसे भू-माफिया किस्म के लोगों को उनके धनबल के प्रभाव से मुक्ति मिल जायेगी? अब सिर्फ देखना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में न्याय मिलेगा? या सब ‘ढाक के तीन पात’ ही साबित होगा?

एम. सांकृत्यायन

नोट : जनहित इंडिया द्वारा प्रकाशित उपरोक्त आकड़ों में आंशिक त्रुटि सम्भव है।

 

 

 

 

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