तंत्र सोता रहा…!

0Shares

तंत्र सोता रहा…!

जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा,
दीवारों की दरारें खूब चीखती रहीं,
हमेशा शहर खामोश होता रहा।
किसी छत ने पहले ही कहा था-
“अब मुझमें दम नहीं है,”
किसी खंभे ने भी काँपकर पूछा था-
“क्या? मेरा भी कोई गम नहीं है?”
फाइलों के नीचे दबा, सवाल सोता रहा,
जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा।

हर बारिश में रिसती थी छत,
गर्मी में तपती दीवार, मरम्मत के नाम,
बनता रहा कागजी संसार।
निरीक्षण की मुहर लगती रही,
जिम्मेदारी टलती रही,
जब तक दीवार खड़ी थी,
सबको वह “इमारत” दिखाई दी,
गिरी तो अचानक सबने कहा-
“हमें तो पहले से आशंका थी।”
जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा।

-संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *