कराहते कुएं
पुराने जमाने में कुएँ गाँवों और शहरों की शान होते थे। वे केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और समृद्धि के प्रतीक थे। सभी की प्यास बुझाते, शीतलता पहुँचाते। उनके सिवा पीने के पानी का कोई और स्रोत नहीं था। अमीर हो या गरीब, हर कोई इसी पर आश्रित था। ये कुएँ वर्षा के जल को सहेज कर भूमिगत जल को बचाने में अपनी सबसे बड़ी भूमिका निभाते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, हमने ही अपनी इस अमूल्य धरोहर को भुला दिया।
जैसे-जैसे घर-घर में नल आए, मोटरें लगीं और बोरवेल की बोरिंग का चलन बढ़ा, वैसे-वैसे कुएँ उपेक्षित होने लगे। जिस कुएँ ने हमें सदियों तक मीठा और शीतल जल पिलाया, हमने उसी में कचरा डालना शुरू कर दिया, उसे मिट्टी से पाट कर उस पर मकान बना लिए। हमने अपने ही हाथों से अपने भविष्य का गला घोंट दिया।
आज उसी भूल का परिणाम हमारे सामने है।
बोरवेल एक के बाद एक फेल हो रहे हैं, भू-जल स्तर सैकड़ों फीट नीचे चला गया है और पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियाँ बढ़ रही हैं। क्योंकि जो कुएँ धरती के फेफड़े थे, जो बरसात के एक-एक बूंद को जमीन के गर्भ में उतारते थे, वही हमने बंद कर दिए।
याद कीजिए, एक कुआँ सिर्फ पानी का गड्ढा नहीं था। वह गाँव की चौपाल था, जहाँ पनिहारिनों की हँसी गूंजती थी, राहगीरों को विश्राम मिलता था और प्यासे पशु-पक्षियों को जीवन मिलता था। एक कुआँ बनवाना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता था।
समय आ गया है कि हम अपनी इस भूल को सुधारें। हमें अपने कुओं का जीर्णोद्धार करना होगा, उन्हें साफ-सुथरा रखना होगा। उनकी सिर्फ पूजा नहीं, रक्षा करनी होगी।
क्योंकि यह तय है –
कुआँ बचेगा, तभी जल बचेगा और जल बचेगा, तभी कल बचेगा।
-ममता साहू
कांकेर (छत्तीसगढ़)
लेखिका, कवयित्री एवं शिक्षिका।
