युग शांति…
धुंधली शिखा सी छा गयी, युग दीप खो रहा है।
तांडव से अनाचार के, अब तेज रो रहा है।।
भयभीत हो आतंक से, आकाश सो रहा है।
मातम भरी उदासी है, पर शोर हो रहा है।।
व्याप्त कोलाहल कलह का, हो रहा व्यवधान है।
हिंसा भड़क कर नाचती , संघर्ष का तूफान है।।
तृष्णा न युग की मिट रही, रक्त-धारा बह रही।
रोता सिसकता धर्म भी , इन्सानियत दह रही।।
विज्ञान का उजाला है, मन में अंधकार है।
कर्म ऐसे हो रहे हैं , युग भी शर्मसार है।।
दोहन से रुष्ट प्रकृति भी , उत्पात कर रही है।
भूकम्प सूखा तो कहीं , हिमपात कर रही है।।
हैं घर उजड़ते बहुत से , वीरान हो रहा है।
जग हर तरफ के युद्ध से, हैरान हो रहा है।।
गांधी यहाँ पर अहिंसा , क्या नाममात्र ही है ?
योगिन बनी अब शांति तू, भटकती रो रही है ?
दाता इधर इंसाफ क्या , इंसाफ खो चुका है ?
कुछ तो यहाँ पर ध्यान दो , अब धुंध हो चुका है।।
अन्याय-त्रस्त धरती तो, अंगार चाहती है।
मधु चेतना के क्रांति का, शृंगार चाहती है।।
‘कुन्दन’ समस्त जन में अब, सत प्यार चाहती है।
युग शांति के आलोक का , दीदार चाहती है।।
रचयिता- सुभाष चन्द्र तिवारी ‘कुन्दन ‘
