ई.वी.रामासामी ‘पेरियार’:सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की आवाज़ थे

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-रामाश्रय यादव

148 वें जन्म दिवस पर विशेष…

भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए जिन्होंने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की बात नहीं की,बल्कि समाज के भीतर मौजूद असमानता, जाति-भेद, छुआछूत, लैंगिक भेदभाव और अंधविश्वास को भी चुनौती दी।ई.वी. रामासामी,जिन्हें सम्मानपूर्वक पेरियार कहा जाता है,ऐसे ही प्रमुख समाज सुधारक थे।वे तर्कवाद, आत्मसम्मान, सामाजिक समानता और जाति-विरोधी आंदोलन के प्रखर समर्थक थे।भारत सरकार के प्रकाशन में भी उन्हें सामाजिक सुधारक और तर्कवादी के रूप में वर्णित किया गया है तथा उनके ‘Self-Respect Movement’और वैकोम सत्याग्रह में भूमिका का उल्लेख है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन ईरोड वेंकटप्पा रामासामी का जन्म 17 सितंबर 1879 को ईरोड में हुआ,जो उस समय मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था।उनका परिवार व्यापार से जुड़ा हुआ था।प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने पारिवारिक व्यापार में काम किया।आगे चलकर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में उनकी रुचि बढ़ती गई।युवा अवस्था में ही उन्होंने समाज में मौजूद धार्मिक और जातिगत असमानताओं को लेकर प्रश्न उठाने शुरू किए।उनका मानना था कि किसी व्यक्ति का सम्मान उसके जन्म,जाति या सामाजिक स्थिति से नहीं,बल्कि उसके मानवीय अस्तित्व और कर्म से निर्धारित होना चाहिए।
पेरियार कुछ समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे।लेकिन कांग्रेस के भीतर सामाजिक प्रतिनिधित्व और जाति-संबंधी प्रश्नों को लेकर उनके मतभेद बढ़ते गए।इसी दौर में 1924 के वैकोम सत्याग्रह ने उनके सार्वजनिक जीवन को महत्वपूर्ण पहचान दी।
केरल के वैकोम में मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर निम्न मानी जाने वाली जातियों के लोगों के आवागमन को लेकर संघर्ष चल रहा था।पेरियार ने इस आंदोलन में भाग लिया और गिरफ्तार भी हुए।उनके योगदान के कारण उन्हें ‘वैकोम वीरर’(वैकोम के वीर)कहा गया।वैकोम का संघर्ष केवल मंदिर में प्रवेश का प्रश्न नहीं था।यह सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार और छुआछूत के विरोध का भी प्रश्न था।
पेरियार ने 1925 में Self-Respect Movement अर्थात आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया।इसका मूल उद्देश्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था का विरोध करना था जिसमें मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊँचा या नीचा माना जाता था।आंदोलन ने मुख्य रूप से इन जातिगत,ऊँच-नीच का विरोध, छुआछूत का विरोध, महिलाओं की शिक्षा और अधिकार, अंतरजातीय विवाह, विधवा विवाह, सामाजिक समानता, तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अंधविश्वास का विरोध, शिक्षा तथा सरकारी अवसरों में सामाजिक प्रतिनिधित्व।
तमिलनाडु के शैक्षणिक स्रोतों में भी आत्मसम्मान आंदोलन के उद्देश्यों में सामाजिक समानता, अस्पृश्यता उन्मूलन और अंधविश्वास के विरोध को प्रमुख बताया गया है।
पेरियार के लिए ‘आत्मसम्मान’ का अर्थ केवल व्यक्तिगत गर्व नहीं था।उनके विचार में जिस समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के कारण अपमानित किया जाता है,वहाँ वास्तविक स्वतंत्रता और सम्मान संभव नहीं है।पेरियार के विचारों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जाति-विरोध था।वे जन्म आधारित सामाजिक पदानुक्रम को मानव समानता के विरुद्ध मानते थे।वे शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सामाजिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के समर्थक थे।उनका तर्क था कि यदि सदियों से कुछ समुदायों को शिक्षा और सत्ता के अवसरों से दूर रखा गया है,तो समान अवसर पैदा करने के लिए विशेष नीतियों की आवश्यकता होगी।उनके आंदोलन ने दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की बहस को व्यापक रूप दिया।उनका संघर्ष केवल किसी एक समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध था जिसमें जन्म के आधार पर अधिकार और सम्मान निर्धारित किए जाते थे।हालांकि उनकी भाषा और राजनीतिक रणनीति कई बार अत्यंत तीखी और विवादास्पद रही।
पेरियार ने महिलाओं की स्थिति को सामाजिक सुधार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। वे महिलाओं की शिक्षा,संपत्ति के अधिकार,विवाह में स्वतंत्रता और सामाजिक बराबरी के पक्षधर थे।आत्मसम्मान आंदोलन ने ऐसे विवाहों को प्रोत्साहित किया जिनमें अनावश्यक धार्मिक कर्मकांड और जातिगत बंधन न हों।बाद में इन्हें सामान्यतः ‘Self-Respect Marriages’कहा गया।इस दृष्टि से पेरियार का विचार था कि विवाह केवल सामाजिक संस्था है और इसमें महिला और पुरुष दोनों की समान गरिमा तथा स्वतंत्रता होनी चाहिए।
पेरियार स्वयं को तर्कवादी मानते थे।वे समाज में प्रचलित अंधविश्वासों और उन धार्मिक मान्यताओं की आलोचना करते थे जिन्हें वे सामाजिक असमानता को बनाए रखने वाला मानते थे।यहाँ पेरियार के विचारों को समझने में एक महत्वपूर्ण अंतर करना आवश्यक है।वे केवल धार्मिक कर्मकांड की आलोचना नहीं करते थे।वे ईश्वर,धार्मिक ग्रंथों और सामाजिक परंपराओं की प्रामाणिकता पर भी प्रश्न उठाते थे। इसी कारण उनके विचारों ने एक ओर तर्कवादी और सामाजिक न्याय आंदोलनों को प्रभावित किया,तो दूसरी ओर धार्मिक समूहों में तीखी प्रतिक्रिया भी पैदा की।उनकी शैली अक्सर उग्र और जानबूझकर चुनौती देने वाली थी।इसलिए पेरियार का मूल्यांकन करते समय उनके समर्थकों के साथ-साथ उनके आलोचकों की दृष्टि को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
पेरियार के सबसे चर्चित और विवादास्पद विचारों में रामायण की उनकी आलोचना शामिल है।उनका मानना था कि रामायण की कुछ व्याख्याएँ उत्तर भारतीय/आर्य और दक्षिण भारतीय/द्रविड़ समाज के बीच असमान सांस्कृतिक संबंध को मजबूत करती हैं। उन्होंने राम और रावण के चरित्रों को पारंपरिक धार्मिक दृष्टि से अलग तरीके से देखने का आग्रह किया।उन्होंने ‘Characters from the Ramayana’ (1930) और बाद में 1955 में रामायण पर अपने विचारों से संबंधित तमिल कृति प्रकाशित की।एनपीटीईएल के साहित्यिक अध्ययन में भी पेरियार की रामायण-व्याख्या को द्रविड़ आंदोलन के राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ी पुनर्व्याख्या के रूप में दर्ज किया गया है।1956 में उन्होंने राम की तस्वीरें जलाने का सार्वजनिक अभियान चलाया।यह कार्रवाई उनके लिए धार्मिक आस्था के विरुद्ध मात्र प्रदर्शन नहीं,बल्कि उनके अनुसार सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व के विरुद्ध राजनीतिक-सामाजिक विरोध का प्रतीक थी।इस घटना पर उस समय भी तीखी प्रतिक्रियाएँ हुईं।यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रामायण की आलोचना पेरियार के व्यक्तिगत विचारों और द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक राजनीति का हिस्सा थी। इसे सभी तमिल लोगों या सभी दक्षिण भारतीयों का विचार मानना सही नहीं होगा।
पेरियार और डॉ.बी.आर.अंबेडकर दोनों ने जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना की और सामाजिक समानता को महत्वपूर्ण माना।दोनों के बीच वैचारिक समानताएँ थीं, विशेषकर जाति व्यवस्था,सामाजिक प्रतिनिधित्व और वंचित समूहों के अधिकारों के प्रश्न पर।दोनों नेताओं की मुलाकातें भी हुईं।उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार 1954 में रंगून में विश्व बौद्ध सम्मेलन के अवसर पर पेरियार और आंबेडकर की मुलाकात हुई थी।
पेरियार का दृष्टिकोण मुख्यतः तर्कवाद,नास्तिकता और द्रविड़ सामाजिक पहचान पर आधारित था,जबकि अंबेडकर ने अंततःबौद्ध धर्म को अपनाया और अपने सामाजिक दर्शन में स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व को केंद्रीय स्थान दिया।इसलिए दोनों के बीच महत्वपूर्ण समानताएँ थी।अंबेडकर और पेरियार के संबंधों पर उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री यह भी दिखाती है कि दोनों के बीच सामाजिक प्रश्नों को लेकर संवाद और राजनीतिक संपर्क था।पेरियार ने आगे चलकर Justice Party के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।1944 में उन्होंने संगठन को Dravidar Kazhagam (द्रविड़ कड़गम) के रूप में पुनर्गठित किया।इसका केंद्र सामाजिक सुधार,गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व, जाति-विरोध और द्रविड़ पहचान जैसे प्रश्न थे।बाद में उनके आंदोलन से प्रभावित होकर सी.एन.अन्नादुरै सहित कई नेताओं ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया और DMK का गठन हुआ।इस प्रकार पेरियार ने स्वयं चुनावी राजनीति को अपना मुख्य माध्यम न बनाते हुए भी तमिलनाडु की राजनीति और सामाजिक विचारधारा पर गहरा प्रभाव डाला।
पेरियार ने हिंदी को अनिवार्य रूप से थोपे जाने के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया।उनका विरोध केवल भाषा सीखने के विरुद्ध नहीं था।वे इसे तमिल भाषा और दक्षिण भारतीय समाज पर राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रश्न से जोड़ते थे।1930 और 1940 के दशक में तथा बाद के वर्षों में भाषा का प्रश्न तमिल राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बना।पेरियार के आंदोलनों ने इस बहस को व्यापक सामाजिक आधार दिया।
पेरियार की विरासत 24 दिसंबर 1973 को पेरियार का निधन हुआ।लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी उनके विचार तमिलनाडु और भारत के सामाजिक विमर्श में बने रहे।उनकी विरासत को अलग-अलग दृष्टियों से देखा जाता है।उनके समर्थकों के लिए वे
जाति-विरोधी संघर्ष के प्रमुख नेता,सामाजिक न्याय के समर्थक,महिलाओं के अधिकारों के पक्षधर,तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रचारक,तथा आत्मसम्मान आंदोलन के संस्थापक थे।दूसरी ओर,उनके आलोचक उनके कुछ धार्मिक-विरोधी अभियानों,भाषा और पहचान की राजनीति तथा रामायण और हिंदू परंपराओं पर उनके आक्रामक वक्तव्यों को विवादास्पद मानते हैं।इसलिए पेरियार को समझने का सबसे उपयोगी तरीका उन्हें केवल किसी एक राजनीतिक या धार्मिक खांचे में रखने के बजाय 20 वीं सदी के दक्षिण भारत के व्यापक सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में देखना है।
ई.वी.रामासामी ‘पेरियार’ का मूल प्रश्न था-क्या मनुष्य का सम्मान उसके जन्म से तय होना चाहिए या उसके मानव होने से?उन्होंने जाति,छुआछूत,लैंगिक असमानता और अंधविश्वास के विरुद्ध अपनी पूरी सार्वजनिक जिंदगी में संघर्ष किया।उनके तरीके कई बार तीखे,विवादास्पद और उकसाने वाले रहे,लेकिन इसी कारण उन्होंने उन सामाजिक प्रश्नों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया जिन्हें लंबे समय तक दबा हुआ माना जाता था।पेरियार की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान ‘आत्मसम्मान’ के विचार से जुड़ी है ऐसा आत्मसम्मान जिसमें व्यक्ति अपने जन्म,जाति या सामाजिक स्थिति के कारण किसी दूसरे से छोटा न माना जाए।उनके जीवन और विचारों पर मतभेद आज भी मौजूद हैं। लेकिन भारत के सामाजिक सुधार,जाति-विरोधी आंदोलनों,महिला अधिकारों,तर्कवाद और दक्षिण भारतीय सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए पेरियार का अध्ययन महत्वपूर्ण है।
(लेखक:- सामाजिक विचारक है)

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